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इस गीतकार ने लिखे चार हजार से अधिक गीत, आठ मिनट में लिख देते थे गाना

Tue, 21 Jul 2020 05:10 AM IST
Mishra Mishra एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: Mishra Mishra Updated Tue, 21 Jul 2020 05:10 AM IST
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bollywood song writer Anand Bakshi Birthday Anniversary and Unknown Facts About His Life
मोहम्मद रफी और आनंद बख्शी - फोटो : Social Media

चार हजार गाने, 40 बार फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकन और करीब चार दशकों तक सिनेमा पर संगीत का जादू बिखेरने वाले जादूगर आनंद बख्शी ने जो कलम से लिखा वो संगीत की दुनिया में सुनहरा इतिहास बनकर दर्ज हो गया। शमशाद बेगम, अलका याग्निक, मन्ना डे और कुमार सानू जैसे गायक आते- जाते रहे लेकिन शब्दों को संगीत में पिरोने वाले बख्शी हमेशा मैदान में खड़े रहे। आनंद बख्शी का जन्म 21 जुलाई साल 1930 में मौजूदा पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में हुआ था। सेना में नौकरी करने वाले आनंद कैसे भारत के मशहूर गीतकार बने, चलिए उनके जन्मदिन पर आपको बताते हैं उनसे जुड़ी कुछ खास बातें।

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आनंद बख्शी

आनंद बख्शी के पिता रावलपिंडी में बैंक मैनेजर थे। किशोरावस्था में ही आनंद टेलीफोन ऑपरेटर बनकर सेना में शामिल हो गए थे। लेकिन बम्बई (मुंबई) और सिनेमा की दुनिया में आने की ख्वाहिश ने उन्हें इससे बांधे रखा। बंटवारा हुआ तो आनंद का परिवार शरणार्थी बनकर हिन्दुस्तान आ गया। जब मायानगरी में कुछ ना हुआ तो आनंद बख्शी ने फिर से सेना ज्वाइन कर ली और कुछ समय तक वहीं काम करते रहे।

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आनंद बख्शी

तीन वर्ष सेना में नौकरी करने के बाद उन्होंने तय किया कि उनकी जिंदगी का मकसद बंदूक चलाना नहीं गीत लिखना है। उन्हें पहली बार गीत लिखने का मौका 1957 में मिला लेकिन सफलता उनसे दामन चुराती रही। 1963 में अभिनेता और निर्देशक राज कपूर ने उन्हें अपनी फिल्म 'मेहंदी लगे मेरे हाथ' के लिए गीत लिखने का अवसर दिया। उसके बाद सफलता ने कभी आनंद बख्शी का साथ नहीं छोड़ा।

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आनंद बख्शी

आनंद बख्शी के करियर का शुरुआती माइलस्टोन बनी ‘आराधना’, ‘अमर प्रेम’ और ‘कटी पतंग’ जैसी फिल्में, जिनके कांधे चढ़कर राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार बने। आनंद बक्शी ने फिल्मकारों की कई पीढ़ियों के साथ काम किया। उनकी सबसे बड़ी खूबी ये थी कि समय के साथ उनके गीतों का लहजा बदलता रहा। आराधना, कटी पतंग, शोले, अमर अकबर एंथनी, हरे रामा हरे कृष्णा, कर्मा, खलनायक, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, ताल, गदर-एक प्रेमकथा जैसी फिल्मों के गीत उनकी कलम से लिखकर अमर हो गए। 

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आनंद बख्शी - फोटो : SELF

वर्ष 1965 में 'जब जब फूल खिले' प्रदर्शित हुई तो उन्हे उनके गाने 'परदेसियों से न अंखियां मिलाना' 'ये समां.. समां है ये प्यार का' ,' एक था गुल और एक थी बुलबुल' सुपरहिट रहे और गीतकार के रूप में उनकी पहचान बन गई। आनंद बख्शी वो नाम है जिसके बिना म्यूजिकल फिल्मों को शायद वो सफलता नहीं मिलती जिनको बनाने वाले गर्व करते हैं। इनका नाम उन गीतकारों में शुमार हैं, जिन्होंने साल दर साल एक से बढ़कर एक गीत फिल्म इंडस्ट्री को दिए हैं। एक साक्षात्कार में मशहूर संगीतकार लक्ष्मीकांत ने कहा था कि जहां दूसरे गीतकार गीत लिखने के लिए सात-आठ दिन ले लेते हैं वहीं आनंद बख्शी आठ मिनट में गाना लिख देते हैं। 30 मार्च, 2002 को 72 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। लेकिन उनके लिखे गाने आज भी आम आदमी की जिंदगी का हिस्सा हैं।

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