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Chhalaang Review: अबकी खेल के बहाने हंसल ने समझाया जीवन, ‘छलांग’ में भी सही पड़ी राजकुमार की गोटी
हिंदी सिनेमा के पहले आम आदमी के तौर पर मशहूर रहे अभिनेता अमोल पालेकर अगर इन दिनों के हैपनिंग निर्देशक हंसल मेहता को मिल जाएं या कथानक आधारित सिनेमा के पोस्टर ब्वॉय बन चुके राजकुमार राव को अगर बासु चटर्जी या ऋषिकेश मुखर्जी जैसे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला होता, तो क्या होता? ये सवाल अक्सर मेरे जेहन में तब तब उठे, जब मैंने राजकुमार राव और हंसल मेहता की फिल्में ‘शाहिद’, ‘सिटी लाइट्स’, ‘अलीगढ़’ और ‘ओमर्टा’ देखी। बीच में दोनों ने एक शानदार वेब सीरीज ‘बोस: डेड/अलाइव’ भी बनाई। हंसल मेहता का इन दिनों का डिजिटल हंगामा है स्टॉक एक्सचेंज के सबसे बडे स्कैम पर बनी वेब सीरीज ‘स्कैम 1992’। इसकी कामयाबी ने इसके हीरो प्रतीक गांधी को एक फिल्म भी दिला दी है। हंसल मेहता ने अपनी अगली फिल्म ‘छलांग’ हल्की फुल्की गुदगुदाती सी बनाई है, ऋषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी जैसी फिल्मों की हिंदी सिनेमा में वापसी की आस जगाती।
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छलांग
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘छलांग’ हिंदी सिनेमा में हंसल मेहता और राजकुमार राव की खींची मनोरंजन की नई लकीर है। अच्छा लगता है देखकर कि राजकुमार राव आखिरकार मसाला फिल्मों के मोह से बाहर आ रहे हैं और वह गलतियां दोहराने से बच रहे हैं, जो मनोज बाजपेयी ने बार बार ठोकरें खाकर भी करनी बंद नहीं कीं। ‘छलांग’ का चोला स्पोर्ट्स फिल्म का है, लेकिन इसकी आत्मा एक ऐसी कहानी की है जिससे एक आदमी की जिंदगी पलती है। इस बार ये पालना झज्जर का है। मोंटू यहां के स्कूल में पीटी टीचर है। परवाह उसे किसी दूसरे की तो क्या अपनी भी नहीं है। शुक्ला जी के साथ उसके दिन ‘मस्त’ कट रहे हैं। और, फिर रजनीगंधा सी महकती नीलिमा मैडम की स्कूल में एंट्री हो जाती हैं। कंप्यूटर वह पढ़ाती हैं, सिस्टम मोंटू का हैंग होने लगता है। और, आखिरकार मोंटू का अपना सिस्टम रीबूट करना ही होता है क्योंकि अब उनकी शहंशाही खतरे में है स्कूल में सीनियर पीटी टीचर के आ जाने से।
हंसल मेहता कमाल के निर्देशक हैं। शुरू के दिनों में उन्होंने मनोज बाजपेयी को एक ऐसी फिल्म में शाहरुख खान बनाने की कोशिश की थी, जिनके लिए अमोल पालेकर या फिर अब राजकुमार राव जैसे कलाकार बेहतर साबित होते। फिर लंबे समय तक उनका कंपास इधर उधर भटकता रहा। ‘शाहिद’ से हंसल मेहता ने अपने सफर की जो तरकीब पकड़ी है, उसमें अब जाकर फिल्म ‘छलांग’ से नया मोड़ आया है। ये हंसल मेहता के बतौर निर्देशक लगातार खुद को ही चुनौती देते रहने की निशानी है। हंसल और राजकुमार राव की जोड़ी कमाल की जोड़ी है। अच्छा ही हुआ दोनों ने अपने ऊपर लगते जा रहे सीरियस फिल्मों के ठप्पे को सैनिटाइजर डालकर इस फिल्म में धो डाला। फिल्म ‘छलांग’ समय की भी जरूरत है और दोनों के करियरनामे की भी। फिल्म ‘छलांग’ त्योहारी मौसम में देखने वाले का मूड एकदम दुरुस्त करने की अनुभूत औषधि है।
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छलांग
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘छलांग’ की असल धुरी हैं राजकुमार राव। उनकी ये नई छलांग उनके करियर को चार कदम आगे फिर ले आती है। पीटी टीचर के तौर पर मोंटू का किरदार करते समय भले कहीं कहीं आपको ‘स्त्री’ के हकलाने वाले लेडीज टेलर की याद आए, लेकिन बाकी जगह वह एकदम फर्स्ट क्लास हैं, विद डिस्टिंक्शन। 24 घंटे के अंतराल में राजकुमार की दो फिल्में रिलीज हुई हैं, और दोनों में राजकुमार अव्वल नंबर रहे। नुसरत भरुचा को राजकुमार राव का सीनियर कहो तो वह शरमा जाती हैं, लेकिन फिल्म ‘छलांग’ में वह साबित करती हैं कि करने को मिले तो वाकई वह राजकुमार की सीनियर बनकर दिखा सकती हैं। नीलिमा का ये किरदार हिंदी सिनेमा में अध्यापिकाओं का भी नया मापदंड है। सौरभ शुक्ला, सतीश कौशिक और इला अरुण के रूप में फिल्म को अदाकारी के जो त्रिदेव मिले हैं, उनसे फिल्म बिल्कुल आस पड़ोस में घटती दिखाई देती है। फिल्म की यही असल जीत है और इस पर सुहागा है जीशान अयूब की मौजूदगी, हालांकि फिल्म निर्देशक के फेवरेट यहां राजकुमार ही रहे हैं, शुरू से आखिर तक।
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छलांग
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हिंदी सिनेमा में देश के हाशिये पर पड़े खेलों पर बनी फिल्में तमाम हैं, मसलन ‘हिप हिप हुर्रे’, ‘बॉक्सर’, ‘जो जीता वही सिकंदर’, ‘चक दे इंडिया’, ‘खड़ूस’, ‘दंगल’ और ‘पंगा’। गौर से देखेंगे तो इन सारी फिल्मों में मुख्य धारा (क्रिकेट) से इतर के खेल को इसके निर्देशकों ने जीवन का एक ऐसा फलसफा सिखाने के लिए इस्तेमाल किया है जिसमें खेल सिर्फ एक माध्यम भर रह जाता है। फिल्म ‘छलांग’ की कामयाबी की वजह भी यही है। इसका चोला एक स्पोर्ट्स फिल्म का है, लेकिन इसकी आत्मा जिंदगी के सबक सिखाने में कामयाब रहती है। फिल्म के तकनीकी पक्ष में ईशित नारायण की सिनेमैटोग्राफी उल्लेखनीय है, संगीत फिल्म का बेहतर हो सकता था।
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