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दादा साहब फाल्के ने सबसे पहले दिया था महिलाओं को मौका, इस वजह से कहे जाते हैं 'सिनेमा के पितामह'
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: shrilata biswas
Updated Sat, 16 Feb 2019 07:30 AM IST
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धुंदिराज गोविंद फाल्के को हम दादा साहब फाल्के के नाम से जानते हैं। भारतीय सिनेमा में अहम योगदान के लिए आज भी हम उन्हें याद करते हैं। 16 फरवरी 1944 को 73 साल की उम्र में दादा साहब फाल्के का निधन हुआ था। आज उनकी पुण्यतिथि पर जानते हैं उनसे जुड़ी कुछ खास बातें।
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दादा साहब फाल्के का जन्म महाराष्ट्र के त्रयम्बकेश्वर में 30 अप्रैल, 1870 को हुआ था। बचपन से ही उनका रुझान कला की ओर था। दादा साहब ने 1885 में मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में एडमिशन लिया। यहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद वो बड़ौदा के कला भवन में पहुंचे, जहां उन्होंने मूर्तिशिल्प, इंजीनियरिंग, पेंटिंग और फोटोग्राफी सीखी।
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फाल्के ने अपना करियर बतौर फोटोग्राफर शुरू किया। उन्होंने मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा के साथ भी काम किया। यही नहीं एक जर्मन जादूगर का मेकअप भी फाल्के ही किया करते थे। साल 1909 में उन्होंने जर्मनी जाकर सिनेमा के बारे में जानकारी ली और यहीं से उनकी रुचि बढ़ने लगी।
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दादा साहब की जिंदगी में अहम मोड़ तब आया जब उन्होंने साल 1910 में 'लाइफ ऑफ क्राइस्ट' देखी। फिल्म देखने के बाद दादा साहब के मन में विचार आया कि उन्हें इसी दिशा में कार्य करना चाहिए। साल 1912 में उन्होंने पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाई जो एक मूक फिल्म थी और देश की पहली फिल्म भी। फिल्म को बनाने में कुल 15 हजार की लागत आई।
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बीबीसी के मुताबिक, दादा साहब फाल्के ने ही फिल्मों में महिलाओं को काम करने का मौका दिया। उससे पहले महिलाओं का रोल भी पुरुष करते थे। उनकी बनाई फिल्म भस्मासुर मोहिनी में दो औरतों दुर्गा और कमला ने काम किया था। दादा साहब फाल्के ने 25 सालों में कुल 100 से ज्यादा फिल्में कीं। .
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