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बाइस्कोप: इसलिए आज भी कायम है ‘धूम’ सीरीज का तिलिस्म, फैंस गाते हैं, ‘धूम मचा ले, धूम मचा ले, धूम!’

Sun, 20 Dec 2020 08:10 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sun, 20 Dec 2020 08:10 AM IST
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Dhoom 3 this day that year by pankaj shukla 20 December 2013 bioscope victor Acharya pritam
धूम 3 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

हिंदी की सबसे कामयाब फ्रेंचाइजी ‘धूम’ सीरीज की तीसरी फिल्म को रिलीज हुए रविवार को सात साल पूरे हो गए। 16 साल से दर्शकों के दिलो दिमाग पर छाई इस सीरीज की चौथी फिल्म का एलान यशराज फिल्म्स नए साल में करने की तैयारी में है। उससे पहले आइए कोशिश करते हैं इस फ्रेंचाइजी के लेखक विजय कृष्ण आचार्य और इसके संगीतकार प्रीतम से इन फिल्मों का तिलिस्म समझने की।

Dhoom 3 this day that year by pankaj shukla 20 December 2013 bioscope victor Acharya pritam
धूम - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

हिंदी सिनेमा में एक ही कहानी के कई संस्करण बनाने का प्रचलन जिस फिल्म से पहली बार दमदार तरीके से आगे बढ़ा, वह रही यशराज फिल्म्स की फ्रेंचाइजी ‘धूम’। दो जांबाज पुलिसवाले और एक खतरनाक अपराधी। फिल्म दर फिल्म ये विलेन बदलते रहे। पहले जॉन अब्राहम आए। फिर ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय। तीसरी बार इस फ्रेंचाइजी में विलेन बने आमिर खान और अब नंबर रणवीर सिंह का लग सकता है। धूम सीरीज का ये तिलिस्म अनूठा है, इसे जितना सुलझाने की कोशिश करो, ये उतना ही उलझता जाता है।

Dhoom 3 this day that year by pankaj shukla 20 December 2013 bioscope victor Acharya pritam
धूम 3 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

चलिए, फ्रेंचाइजी के करिश्मे को शुरू से पकड़ने की कोशिश करते हैं। इन तीनों फिल्म की एक कॉमन कड़ी रहे हैं पहली धूम और धूम 2 के लेखक व धूम 3 के निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य उर्फ विक्टर। इस सीरीज की सभी फिल्मों ने पर्दे पर हैरतअंगेज और नयनाभिराम दृश्यों की लड़ियां सजाईं। सीरीज की पिछली फिल्म यानी धूम 3 को रिलीज हुए सात साल पूरे हो रहे हैं और लोग अब भी इसकी चौथी कड़ी का इंतजार कर रहे हैं।

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विजय कृष्ण आचार्य - फोटो : instagram/vijaykrishnaacharyaofficial

आखिर क्या है इस फ्रेंचाइजी के तिलिस्म का राज? विक्टर समझाने की कोशिश करते हैं, “एक दर्शक के नाते और एक बड़े होते बच्चे के तौर पर मुझे चोरी-डकैती वाली फिल्म बहुत भाती थी। मुझे लगता है कि चोरी-डकैती वाली हर फिल्म में कोई न कोई सत्ता विरोधी बात अंतर्निहित होती है और धूम सीरीज भी इसी के हक में खड़ी होती है। अगर आप किसी भी ऐसी फिल्म पर नजर डालें जिसके किरदार नैतिक तौर पर स्याह चरित्र रखते हों तो वे किसी न किसी रूप में समाज के खिलाफ बगावत करते दिखेंगे। बागी जनता को हमेशा पसंद आते रहे हैं।”

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फिल्म- धूम - फोटो : अमर उजाल आर्काइव, मुंबई

हिंदी सिनेमा में ‘धूम’ सीरीज को ट्रेंड सेटर इसलिए भी माना जाता है क्योंकि इसका लेखन सामान्य अपराध फिल्मों से पूरी तरह इतर रहा। विक्टर कहते हैं, “एक लेखक के तौर पर लोग बस ऐसा कुछ लिखना चाहते हैं जिसमें दर्शकों को आनंद आए और उसे लोकप्रियता मिले। लेकिन, मेरा मानना ये है कि लेखक की भूमिका या उसका काम लोकप्रियता की तलाश करना नहीं होता। हमारी भूमिका वह काम करने की होती है जिसे हम करना चाहते हैं या करना पसंद करते हैं। दर्शकों की बदलती रुचि को देखते हुए कहानी का कोई अंत भी रचना पड़ता है, लेकिन ऐसी कहानियां सारे दर्शकों को खुश कर देंगी, ये जरूरी नहीं है।” 

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