पत्रकार से फिल्मकार बने विवेक अग्निहोत्री की जड़ें ओशो की जमीन से जुड़ी हैं। करियर भी कुछ कुछ उनका ओशो के रास्ते पर ही चलता रहा है। पहले चॉकलेट, हेट स्टोरी जैसी फिल्में और फिर बुद्धा इन ट्रैफिक जाम, ताशकंद फाइल्स। विवेक इन दिनों विश्वभ्रमण पर हैं और अपनी अगली फिल्म द कश्मीर फाइल्स के लिए कश्मीर से विस्थापित लोगों से मिल रहे हैं। पेश हैं विवेक से अमर उजाला की खास बातचीत के कुछ अंश।
EXCLUSIVE: निर्देशक विवेक अग्निहोत्री बोले, कश्मीर में जो हुआ वह नरसंहार से कम नहीं
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किसी फिल्म के लिए रिसर्च को कितना जरूरी मानते हैं आप?
फिल्में हमारी अर्थ व्यवस्था का एक हिस्सा हैं। मतलब कि ये भी एक उत्पाद है जिसे लोग पैसे चुकाकर देखते हैं। हम एक ऐसे दौर में हैं जहां दिल्ली और मुंबई में बैठी पत्रकारों की एक ऐसी पौध जिसने हिंदुस्तान ठीक से देखा भी नहीं है, भारत के अमेरिका जैसा बन जाने की सोच में डूबी रहती है। भारत की चिंताएं अलग हैं। इसकी चुनौतियां अलग हैं। पिछले पांच साल में मैंने पांच-छह सौ जगहों पर वार्ताओं में हिस्सा लिया, लोगों से मिला। इससे पता चलता है कि लोग देखना क्या चाहते हैं। किसी उत्पाद को बाजार में लाने से पहले कंपनियां महीनों रिसर्च करती हैं। फिल्म के बारे में भी हमें जानना चाहिए कि दर्शक क्या चाहते हैं।
मतलब कि कश्मीर फाइल्स बनाने से पहले आप हजारों लोगों से मिल रहे हैं, लेकिन ताशकंद फाइल्स में तो ऐसी रिसर्च नहीं की थी आपने?
ताशकंद फाइल्स में हमारे पास लोग नहीं थे उतने। हम कुल जमा सात-आठ लोग थे। कुलदीप नैयर थे हमारी टीम में, सेवानिवृत्त एयर चीफ अर्जन सिंह थे। हम लोगों ने कुल 32 आरटीआई फाइल कीं लाल बहादुर शास्त्री के निधन को लेकर। लेकिन, कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली। हमारी व्यवस्था हमें सच जानने नहीं देती। संविधान भले सत्यमेव जयते के सिद्धांथ पर खड़ा हो लेकिन हमारी व्यवस्था इसमें बड़ी बाधा है। फिर हमने लोगों से अपील की और जिसके पास जो भी जानकारी थी, सब हम तक पहुंची।
और, अब कश्मीर फाइल्स? क्या जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने ने इस फिल्म के बीज बोए हैं?
नहीं, आर्टिकल 370 मेरी फिल्म का ट्रिगर प्वाइंट बिल्कुल नहीं है। कश्मीर फाइल्स का ट्रिगर प्वाइंट एक वीडियो है जो खूब वाइरल हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कुछ कश्मीरी पंडितों ने मुलाकात की थी। इस वीडियो में एक शख्स प्रधानमंत्री का हाथ चूमता दिखता है, उनका नाम है डॉ. सुरेंद्र कौल। उन्होंने मुझसे कश्मीर में हुए नरसंहार पर फिल्म बनाने को कहा। कश्मीर का इतिहास भारत के इतिहास जितना ही पुराना है।
द कश्मीर फाइल्स पर आपकी रिसर्च दो साल से चल रही है और फिल्म की शूटिंग आप कब शुरू करने का इऱादा रखते हैं?
कश्मीर में हुए नरसंहार की जांच के लिए किसी सरकार ने कोई न्यायाधिकरण बनाया नहीं है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लोगों ने अपने साथ हुई ज्यादतियां दर्ज कराई थीं, लेकिन कश्मीर में जो हुआ उसे दर्ज कराने की कहीं कोई व्यवस्था नहीं है। हम ये कर रहे हैं कि कश्मीर से लेकर दिल्ली, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और जर्मनी में जा बसे कश्मीर के लोगों से मिल रहे हैं और उनके इंटरव्यू रिकॉर्ड कर रहे हैं। हमारी मंशा ये सारे इंटरव्यू सरकार को सौंप देने की है। फिल्म ताशकंद फाइल्स की शूटिंग हम अगले साल फरवरी मार्च में शुरू कर देंगे।
और, इतिहास के कौन से मुद्दे हैं जो आपको परेशान करते रहते हैं?
हमारे देश के कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिनका कभी कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया। कश्मीर फाइल्स के बाद मैं ऑपरेशन ब्लू स्टार पर फिल्म बनाने की सोच रहा हूं। हमने अपने इतिहास से इस पूरे अध्याय को हटा ही दिया है। उस पर हम बात ही नहीं करते हैं। 1984 मैं दिल्ली में रहता था। इंडिया टुडे में पहली नौकरी लगी थी। मेरा मित्र हरविंदर सिंह भी मेरे साथ रहता था। उसके साथ इंदिरा गांधी की हत्या वाले दिन जो कुछ हुआ, उसके चलते वह देश ही छोड़ गया। मेरा मन अब ऐसी कहानियों को सिनेमा के जरिए कहने का है, जिन्हें लोग कहना नहीं चाहते।
अर्बन नक्सल से आपका तात्पर्य क्या रहा है?
देश के खिलाफ एक छद्म युद्ध चल रहा है। भारत की जनता हर समय किसी न किसी भ्रम में बनी रहे, ऐसा दुनिया की बड़ी ताकतें चाहती हैं। मैं खुद नक्सल रहा हूं। मैं जेल भी गया हूं। बसें चलाई हैं तो मुझे तस्वीर के दोनों पहलू पता हैं। फिल्म बुद्धा इन द ट्रैफिक जाम की रिसर्च के दौरान हमारे पास इतनी रिसर्च थी कि फिल्म में आ नहीं सकती थी। तो इसी शोध सामग्री ने अर्बन नक्सल किताब की शक्ल ले ली। यह शब्द प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस्तेमाल किया है। सरकार ने अदालत में स्वीकार किया है कि इन लोगों को फंडिंग मिलती है। बड़ी ताकत जो होती है वो छोटे देशों को हमेशा परेशान करके रखना चाहती है। अफगानिस्तान में बच्चों को ब्रेनवाश करके फिदायीन बना देते हैं। हमारे यहां नक्सल बना देते हैं और जो लोग गरीबों की लड़ाई लड़ने की बात करते हैं, कभी उनके घर जाकर देखिए। ये लोग जो युवाओं को सड़कों पर आंदोलन के लिए उकसाते हैं, ये सब पंचसितारा होटलों जैसे बंगलों में रहते हैं।
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