विनोद पांडे का हिंदी सिनेमा से पहला रिश्ता लंदन में बीबीसी के लिए दिग्गज कलाकारों के इंटरव्यू लेने से बना। तब वह सरकारी नौकरी भी करते थे। वह पहले ऐसे भारतीय फिल्ममेकर रहे जिन्होंने लंदन में अपनी खुद की विज्ञापन एजेंसी शुरू की। विनोद पांडे से मिलना, उनसे बातें करना, हिंदी सिनेमा के एक लंबे अंतराल को सिलसिलेवार तरीके से जानने का जरिया बना। 15 अगस्त 2020 को विनोद पांडे 80 साल के हो गए। वह अब भी रोज दफ्तर जाते हैं। फिल्मों की कहानियां लिखते हैं और फिल्में बनाते भी हैं। विनोद पांडे के साथ ये लंबी मुलाकात सिलसिलेवार तरीके से आगे बढ़ेगी। आज पेश है इसकी पहली किश्त...
निर्देशक विनोद पांडे हुए 80 के, EXCLUSIVE मुलाकात में सुनाए ‘एक बार फिर’ की मेकिंग के दिलचस्प किस्से
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विनोद जी, शुरू से शुरू करते हैं। सिनेमा में आपकी दिलचस्पी कैसे हुई?
मैं शुरुआत से ही फिल्मों में दिलचस्पी रखता था। इसके लिए मैंने लंदन में ही कुछ कोर्स भी किए। मैं एक फिल्म बनाने की कोशिश कर रहा था लेकिन कुछ भी ठीक से नहीं हो पा रहा था। बीबीसी से जुड़े रहने के कारण मैं बहुत से सितारों के साथ अच्छे रिश्ते बनाने में सक्षम था। राजकुमार साहब, राजेंद्र कुमार, दिलीप कुमार, यहां तक कि देव आनंद साहब भी मुझे बहुत पसंद करते थे। दिलीप साहब तो अपनी बहनों से भी कहते थे कि उसे जाकर मिलो। वह लड़का वहीं है। वही बताएगा कि क्या करना है। मैं भी अजीब ही खब्ती आदमी था उन दिनों।
और, फिर वो आपने दिलीप कुमार को फिल्म की कहानी जो सुनाई थी?
मुझे याद है जब दिलीप साहब आए हुए थे। उस समय मनोज कुमार और सायरा बानो की फिल्म 'पूरब और पश्चिम' बन रही थी। मैं लंदन में सिविल सर्विस में था। दिलीप साहब होटल में थे और उनकी पत्नी शूटिंग के लिए गई हुईं थीं। मैं अपने सरकारी ऑफिस से उन्हें फोन कर रहा हूं और फोन पर ही कहानी बता रहा हूं। वह बड़े ही धैर्य से सुन रहे हैं और कहते जा रहे हैं कि जमीन अच्छी है। वह मेरा मनोबल बढ़ा रहे थे। वह मेरे इस दीवानेपन पर भी खुश थे कि यह लगा रहता है, कुछ ना कुछ करता रहता है। ऐसा ही राज (राजकुमार) साहब का था। इतना सबकुछ होते हुए भी मैं कभी उन्हें सीधे अपनी फिल्म में लेने लायक नहीं बन सका।
फिर कैसे हिम्मत बनी एक दिन नौकरी छोड़ देने की?
सभी मुझे सलाह देने लगते थे कि अच्छी खासी नौकरी है तेरी। कहां फंसता जा रहा है तू। लेकिन मैं वाकई इस काम को करना चाह रहा था, इसलिए सबसे पहले मैंने अपनी सिविल सर्विस की नौकरी छोड़ी। फिर मैंने सबसे पहले हिंदी में एक डॉक्यूमेंट्री 'इंडिया इन लंदन' बनाई। मैं अपने बीबीसी के सहकर्मी के साथ पब में बैठा हुआ था और सोच रहा था कि मुझे मेरी सिविल सर्विस की नौकरी नहीं छोड़नी चाहिए थी। मेरा सहकर्मी कहता है कि तुम एक अच्छा काम करने जा रहे हो। और जब हम कोई अच्छा काम करने जाते हैं, तो उसमें कोई चोरी नहीं होती। तू अभी जवान है और तेरे अंदर इतने रचनात्मक विचार हैं। नौकरी का क्या है। वह तो फिर मिल जाएगी। छोड़ दे और मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी।
और, नौकरी छोड़ने की हिम्मत मिलने में बीबीसी ने भी मदद की?
बीबीसी में मैं लगातार काम कर रहा था लेकिन उनके असाइनमेंट बहुत कम हो गए थे। मैं उनके यहां फुल टाइम स्टाफ तो था नहीं। दूसरे कई कामों के साथ मैं खबरें भी पढ़ा करता था। इतने में भारत-पाकिस्तान का 1971 वाला युद्ध शुरू हो गया था। उस समय अचानक से काम बहुत बढ़ गया। दो लोग एक साथ बारी बारी से मिलकर खबरें पढ़ा करते। तो पैसा भी ज्यादा आने लग गया था। तभी मुझे और मेरे कैमरामैन को विज्ञापन फिल्में (कमर्शियल्स) बनाने का विचार आया।
तब समाचार पढ़ने में उस समय किस प्रकार भुगतान होता था? और कितने पैसे मिलते थे?
हमारा भुगतान प्रतिदिन के हिसाब से होता था। उस समय के लिए वह पैसा काफी अच्छा था। मुझे एक बुलेटिन पढ़ने के 10 से 12 पाउंड मिलते थे। फिर मैंने कमर्शियल्स में किस्मत आजमाई। हमने ब्रिटिश एयरवेज जैसी कंपनियों के कई कमर्शियल बनाए। इसके साथ ही हम लंदन में एक विज्ञापन एजेंसी चलाने लगे। शुरुआत में मेरी मंशा ये नहीं थी लेकिन जब हम लगातार विज्ञापन बनाते रहे तो ये करना पड़ा। इसी के साथ मीडिया एजेंसी भी बन गई। हमने अपनी कंपनियों के लिए स्पॉट खरीदने शुरू कर दिए। इससे हमें अच्छा पैसा मिलने लगा और कमाई अच्छी होने लगी।
सुना है तब आप इतने रईस हो गए थे कि आपने लंदन में एक तिमंजिला इमारत पूरी किराए पर ले ली थी?
फिल्ममेकिंग में आने से पहले मैं ठीक ठाक काम कर रहा था। लेकिन, पत्रकार होने के नाते मुझसे लोग खुलकर बात नहीं करते थे। मैं चाहता था फिल्में बनाना और लंदन में रहकर ये हो नहीं पा रहा था तो मैंने निर्णय ले लिया कि मैं अब भारत जाऊंगा। भारत आने के लिए मैंने एक रिपोर्ट तैयार की जोकि मैं हमेशा अपने विज्ञापन के लिए भी बनाया करता था। तभी एक सुबह हुआ यह कि मेरे बैंक मैनेजर ने मुझे बहुत ही सुबह फोन किया। तब तक मैं अपनी पहली पत्नी गीता से अलग हो चुका था। लंदन में मेरा ऑफिस तीसरी मंजिल पर था। वेस्टर्न बैंक के ठीक बगल में एक पतली सी बिल्डिंग थी जिसके तीन मंजिल मैंने ले रखे थे। ऑफिस में ही मैंने एक बैकरूम बना रखा था वहीं मैं रहता था। उस रोज सुबह सुबह जब मेरे फोन की घंटी बजी, तो मैं दौड़कर पहली मंजिल पर पहुंचा। मेरी सांस फूली हुई थी और मैंने जाते ही फोन उठा लिया।
और, फिर?
मैं थोड़ा घबराया हुआ था कि बैंक मैनेजर आखिर मुझे फोन कर क्यों रहा है। क्या मुझसे कोई गड़बड़ हो गई है? उसने मेरे मुझसे हाल चाल पूछे। मैंने कहा कि सब ठीक है। कैसे याद किया? वह बोला कि बस ऐसे ही। बहुत दिन हो गए, बात नहीं हुई थी। उसका विचार था कि मेरे पैसे बहुत इकट्ठे हो गए हैं। उसने मुझे निवेश करने के लिए रास्ता दिखाना चाहा। मैंने उसे बताया कि मैं कुछ चीजें कर रहा हूं और डरते डरते मैंने उसे बताया कि मैं फिल्म बनाने जा रहा हूं और इसके लिए भारत जा रहा हूं।