फिल्म जगत में वैसे तो अनेक करिश्माई सितारे हैं किंतु रजनीकांत का स्थान उनमें सबसे अलग है क्योंकि आज भी उनके कई प्रशंसक उन्हें किसी देवता की तरह पूजते हैं। बॉक्स आफिस पर उनकी सफलता की गाथा और उनके नाम पर आए दिन नये चुटकुले गढ़े जाना उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है। सरकार ने बृहस्पतिवार को इस मशहूर अदाकार को सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से विभूषित करने की घोषणा की। सत्तर साल के अभिनेता को वास्तविक जीवन में कभी कृत्रिम तरीके से हुलिया नहीं बदलने और कम होते बालों को भी कभी नहीं छिपाकर सहजता से रहने के लिए जाना जाता है। पहले कुली और फिर बस कंडक्टर के रूप में काम करते हुए रजनी फिल्मों तक पहुंचे और साल दर साल ‘एंथिरन’ और ‘काला’ जैसी अनेक फिल्में करते हुए दक्षिण भारत के बड़े स्टार बन गये।
कभी कुली का काम करते थे रजनीकांत, आज दुनिया भर में बज रहा 'थलाइवा' का डंका
उनके साथ सबसे खास बात यह है कि भले ही लोगों ने उनकी फिल्म नहीं भी देखी हो, फिर भी उनके अंदाज, उनके व्यक्तित्व के कायल हैं। रजनीकांत की फिल्म के रिलीज होने के बाद पहले शो को देखने के लिए सिनेमाघरों के बाहर रात से ही दर्शकों की कतार लगने की तस्वीरें सभी ने देखी होंगी। उनके कुछ प्रशंसक उनके पोस्टरों को दूध में नहलाते तो कुछ उनके कटआउट पर फूलमालाएं लादते और मूर्ति बनाकर उनकी पूजा करते तक देखे जाते रहे हैं।
अपने चाहने वालों के बीच ‘थलाइवा’ के नाम से मशहूर रजनीकांत की किसी नयी फिल्म की घोषणा हो या फिर उनका जन्मदिन, उनके प्रशंसकों के लिए त्योहार सा होता है। जापान से लेकर श्रीलंका तक उनके चाहने वालों की फौज है। कई बार जब रजनीकांत की फिल्में समीक्षकों की ज्यादा वाहवाही नहीं भी लूट पातीं, तब भी उनका नाम बॉक्स ऑफिस पर फिल्म को सफलता दिलाने के लिए काफी होता है। पिछले करीब पांच दशकों से उनके नाम का डंका दक्षिण भारत में ही नहीं बल्कि बॉलीवुड में भी बज रहा है।
बेंगलुरू में एक मराठी परिवार में जन्मे रजनीकांत का मूल नाम शिवाजीराव गायकवाड़ है। वह अपने चार भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं। स्कूली दिनों से खेलों में रुचि रखने वाले रजनीकांत बेंगलुरू के रामकृष्ण मठ में नाटकों के मंचन में भाग लेते थे। 1956 में उनके पिता के सेवानिवृत्त होने के बाद पूरा परिवार बेंगलुरू के हनुमंत नगर में आकर बस गया। वहां रजनीकांत ने कुली के रूप में काम किया और फिर बेंगलोर परिवहन निगम की बसों में कंडक्टर के रूप में सेवाएं दीं। इसके बाद उन्होंने अपने साथी चालक और दोस्त राज बहादुर के प्रोत्साहित करने पर मद्रास फिल्म संस्थान से अभिनय का पाठ्यक्रम किया और फिल्मी दुनिया के इस महान कलाकार की अभिनय यात्रा शुरू हुई।
जाने माने तमिल फिल्म निर्देशक के. बालसचंद्र की सलाह पर रजनीकांत ने तमिल भाषा बोलना भी सीख लिया और उनकी 1975 में आई फिल्म ‘अपूर्व रंगांगल’ से फिल्मों में पदार्पण किया। रजनी को पहली वास्तविक सफलता इसके अगले साल आई बालचंद्र की एक और फिल्म ‘मुंडरू मुडिचू’ से मिली। शुरुआत में नकारात्मक किरदार अदा करने के बाद रजनीकांत ने ‘कविक्कुयिल’, ‘सहोदरारा सवाल’(कन्नड) और ‘चिलकम्मा चेप्पिंडी’ (तेलुगू) में सकारात्मक पात्रों का अभिनय किया। 1980 के आखिर तक वह दक्षिण भारत की सभी भाषाओं में काम कर चुके थे और तमिल सिनेमा में अपना नाम स्थापित कर चुके थे।