‘कौआ कान ले गया’ ये कहावत कई बार लगता है कि हिंदी सिनेमा के लिए ही बनी है। यहां की पूरी गणित प्रेस रिलीज के बहाने ‘लीक’ होने वाली खबरों से बनती है। सारे समीकरण नई फिल्मों का एलान होने, पुराने पर परदा डालने से ही बनते बिगड़ते रहते हैं। दो दिन पहले खबर फैली कि कोरोना संक्रमण काल के बाद सिनेमाहालों के खुलते ही यशराज फिल्म की बहुचर्चित फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ फिर से मराठा मंदिर में लौट आई है। कॉपी पेस्ट वालों ने इसे भी अपने अपने पोर्टल पर छाप लिया, बिना ये जांचे कि आखिर मराठा मंदिर कोई पहुंचा भी कि नहीं। चलिए, हम आपको ले चलते हैं मराठा मंदिर और मुंबई के कुछ दूसरे सिनेमाघरों तक और बताते हैं वहां का आंखों देखी हाल।
EXCLUSIVE: ‘डीडीएलजे’ के मराठा मंदिर में फिर से रिलीज होने की ये है सच्चाई, पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट
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देश में चारों तरफ हल्ला है कि अभिनेता शाहरुख खान की प्रतिष्ठित फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' मुंबई के मराठा मंदिर सिनेमाघर में फिर से रिलीज हो गई है। लेकिन, मौके पर सन्नाटा पसरा पड़ा है। मराठा मंदिर परिसर में तैनात सुरक्षाकर्मी संतोष इस सवाल से ही नाराज हो गए कि फिल्म देखने कोई आया कि नहीं। उनका डॉयलॉग था, 'कहां घुसे चले आ रहे हो आप? दिखाई नहीं देता, थिएटर बंद है।' संतोष अपनी जगह सही भी थे।
मामला थोड़ा शांत होने के बाद संतोष कहते हैं, 'सरकार ने तो ऐलान कर दिया कि खोल लो सिनेमाघर लेकिन शुरू करने से पहले सौ काम होते हैं। और फिल्म भी तो होनी चाहिए चलाने के लिए। 'डीडीएलजे' दिन भर थोड़े ही चलेगी। कोई नई फिल्म आएगी तो वह भी चलाएंगे।’ व्यापार की दृष्टि से संतोष की बात भी सही है लेकिन फिर 'डीडीएलजे' के मराठा मंदिर में दोबारा रिलीज होने की खबर फैलाने का क्या मतलब? अब इसका जवाब तो संतोष के हिसाब से मराठा मंदिर के मालिक ही देंगे।
हमारी जमीनी छानबीन का अगला पड़ाव मुंबई का संपन्न इलाका फोर्ट रहा। यहां स्थित स्टर्लिंग सिनेमा के बाहर ही कुर्सी डाले बैठे सुरक्षाकर्मी से जब पूछा गया कि 5 नवंबर से सिनेमाघरों को खोलने की अनुमति मिल गई है फिर भी सिनेमाघर बंद क्यों है? इस पर उस सुरक्षाकर्मी ने कहा कि सरकार ने बोल दिया है लेकिन सिनेमाघर को भी तो अपनी व्यवस्था देखनी पड़ेगी। 50 फीसदी लोगों को ही सिनेमा हॉल में फिल्म देखने की इजाजत है तो बाकी सीट तो ब्लॉक करनी पड़ेंगी न? यहां गार्ड का कहना था कि दीवाली से एक या दो दिन पहले ही ये थिएटर खुलने की संभावना है।
सिनेमाघरों में चलने वाली फिल्मों के ऊपर एक विस्तारित अर्थव्यवस्था निर्भर होती है। ऑटो टैक्सी वालों को भाड़ा मिलता है। आसपास की दुकानों की बिक्री बढ़ती है। जैसे कि स्टर्लिंग सिनेमा के ही सामने वाली सैंडविच की दुकान। दुकानदार से पूछ ही लिया कि अगर ये सामने वाला सिनेमाघर खुल जाएगा तो कितना उत्साह है फिल्म देखने का? दुकानदार ने बड़े ही सर्द लहजे में उत्तर दिया, 'ऐसे में कौन देख रहा है फिल्म? फिल्म भी ढंग की है नहीं और पब्लिक के पास पैसा किधर है? यहां सैंडविच में ही घाटा आ रहा है। बंधे हुए ग्राहक भी नहीं आ पा रहे।' यही व्यथा सिनेमाघरों के आसपास खोमचे लगाने वाले तमाम दूसरे लोगों की भी है।