फिल्म ‘गाइड’ का आज का बाइस्कोप शुरू करने से पहले एक बात और भी। पहली तो पिछले ‘बाइस्कोप’ से जुड़ी है जो मैंने लिखा था फिल्म ‘पाकीज़ा’ पर। इसे पढ़कर कुछेक लोगों ने ये प्रतिक्रिया दी है कि मीना कुमारी को उनके पति ने तीन तलाक दे दिया था, इसी वजह से वह अलग रहने लगीं। यह बात पूरी तरह से मनगढ़ंत है। सर्वोच्च न्यायालय के तीन तलाक वाले फैसले से पहले ऐसी बात कोई कभी सामने आई भी नहीं। मीना कुमारी को तीन तलाक देने की बात न कभी उनके घरवालों ने कही और न ही कमाल अमरोही के बेटे ताजदार अमरोही ने मानी। अब आते हैं विजय आनंद निर्देशित ‘गाइड’ पर। फिल्म की पहली स्क्रीनिंग 6 फरवरी 1965 को अमेरिका में मानी जाती है। ये काम शायद फिल्म को ऑस्कर पुरस्कारों में एंट्री दिलाने के लिए किया गया। फिल्म को विदेशी फिल्म श्रेणी में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका भी मिला पर अंतिम सूची में ये जगह न बना पाई। इसके बाद ये फिल्म भारत में अगले साल यानी 1966 में रिलीज हुई और 1967 के फिल्मफेयर पुरस्कारों में नौ नामांकन पाकर सात पुरस्कार जीतने में सफल रही। इस फिल्म को समय से बहुत आगे की फिल्म माना गया था और वह इसलिए कि इस फिल्म की हीरोइन विवाहिता होते हुए भी न सिर्फ गैर मर्द से प्रेम करती है बल्कि अपने पति को साफ साफ बता भी देती है, “मैं बेवफाई करूंगी मार्को तो खुले आम, काम का बहाना करके घने जंगल में चुपके से नहीं!”
Bioscope S2: आधी दुनिया घूमकर देव आनंद को मिली थी ‘गाइड’, लता से जीतकर इसलिए दुखी हो गए थे रफी
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ये उन दिनों की बात है जब सिनेमा इतना आगे नहीं निकला था। औरतों की आजादी की बातें भी इतनी न सुनी जाती थीं, लेकिन आर के नारायण के उपन्यास ‘द गाइड’ में ये बात थी जो नोबेल पुरस्कार विजेता पर्ल एस बक ने एक भारतीय लेखक का इतना समय से आगे का उपन्यास पढ़ा तो वह चौंक गईं। उन्हें पहली मर्तबा तो यकीन ही नहीं हुआ कि नेहरू के भारत में कोई ऐसी समय से आगे की कहानी भी लिख सकता है। इस उपन्यास के लिए नारायण को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका था और मिला भी था तो पंडित जवाहर लाल नेहरू के हाथों। देव आनंद और पर्ल एस बक ने मिलकर ये फिल्म बनाने का फैसला कैसे किया, ये जानने से पहले इनकी पहली मुलाकात का किस्सा भी जानना जरूरी है। ये है भी बड़ा दिलचस्प। बी के करंजिया उन दिनों फिल्मफेयर पत्रिका के संपादक हुआ करते थे और एक दिन करंजिया एक महिला के साथ देव आनंद के घर आ पहुंचे। इस महिला का परिचय जब देव आनंद से कराया गया तो देव आनंद बहुत खुश हुए कि इतनी बड़ी साहित्यकार उनसे मिलने आईं हैं। उनके साथ निर्देशक टैड डैनिएलेवेस्की भी थे। दोनों मिलकर भारतीय कलाकारों के साथ एक अंग्रेजी पिक्चर बनाना चाहते थे और एक भारतीय लेखक की किताब भी उन्होंने इसके लिए खरीद ली थी। देव आनंद को इस फिल्म में लीड रोल ऑफर हुआ लेकिन देव आनंद को ये रोल जमा नहीं। वह चाहते थे कि उन्हें लेकर अंग्रेजी फिल्म जब भी बने लेकिन बने उसी शान से जिस शान से वह हिंदी सिनेमा में काम करते हैं। बात बनी नहीं और ये बात यहीं खत्म हो गई।
लंदन में मंगाकर पढ़ी ‘द गाइड’
संयोग देखिए कि देव आनंद की अगली मुलाकात निर्देशक टैड डैनिएलेवेस्की फिर हुई। वह बर्लिन फिल्म फेस्टिवल आए थे अपनी फिल्म ‘नो एग्जिट’ लेकर और और देव आनंद वहां पहुंचे हुए थे अपनी फिल्म ‘हम दोनों’ लेकर। बर्लिन में देव आनंद की फिल्म की तारीफें भी खूब हुई। दुनिया भर के फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को लेकर खूब अफसाने लिखे। लेकिन, असली अफसाना बनना अभी बाकी था। टैड और देव आनंद की मुलाकात हुई और उन्होंने फिर हिंदी सिनेमा के तब के सुपरस्टार के सामने एक इंडो यूएस फिल्म बनाने का प्रस्ताव रख दिया। तब तक किसी ने आर के नारायण की किताब के बारे में देव आनंद को बता रखा था। बर्लिन से देव आनंद लंदन गए। वहां जाते ही उन्होंने आर के नारायण की लिखी ‘द गाइड’ तलाशनी शुरू की। बुकस्टोर के मालिक ने कहा कि किताब अभी तो नहीं है लेकिन उनके लिए वह ये किताब भारत से 24घंटे के भीतर मंगवा देगा। देव आनंद का अगला दिन लंदनबेरी हाउस में बहुत बेचैनी में बीता और जैसे ही ये किताब उन्हें मिली, उन्होंने एक बार में इसे पूरा पढ़ डाला। किताब खत्म करने के बाद देव आनंद ने जो पहला काम किया, वह था पर्ल एस बक को फोन करना। देव आनंद ने सीधा सवाल पूछा, ‘क्या आप एक भारतीय सितारे के साथ अब भी अंग्रेजी पिक्चर बनाने में दिलचस्पी रखती हैं? मेरे पास इसके लिए एक बहुत ही दिलचस्प किताब है, ‘द गाइड’। पर्ल का उत्तर था, ‘बिल्कुल। मैंने ये किताब पढ़ी हुई है। हमें मिलना चाहिए।’ देव आनंद लंदन से सीधे अमेरिका पहुंचे। ये उनकी पहली अमेरिका यात्रा थी।
हॉलीवुड से किया आर के नारायण को फोन
देव आनंद ने सोचा अब अमेरिका आ ही गए तो क्यों न हॉलीवुड भी घूम लिया जाए तो वह मैनहैटन से लॉस एंजिलिस पहुंचे और वहां के बेवरली हिल्स होटल में रुकने के बाद वहीं से उन्होंने मैसूर (अब मैसुरू) में रह रहे आर के नारायण को फोन किया। अपनी किताब ‘रोमांसिग विद लाइफ’ में देव आनंद लिखते हैं, “मेरी आवाज सुनकर वह रोमांचित हो गए थे। मैंने उनसे कहा कि आप और मैं, हम दोनों हॉलीवुड जा सकते हैं, एक शानदार तरीके से। बशर्ते आप मुझे इस किताब के फिल्ममेकिंग राइट्स दे दें। उनका उत्तर था, तुम मुझसे आकर मिलते क्यों नहीं?” हॉलीवुड से देव आनंद बैंगलौर (अब बेंगलुरू) आए और वहां से ड्राइव करते हुए मैसूर पहुंचे। सौदा पक्का हो गया। देव आनंद फिर वापस गए। पर्ल एस बक से मिले। फिल्म के अंग्रेजी संस्करण के लिए डील पक्की हुई और हिंदी संस्करण के लिए किताब को अनूदित किया गया। हिंदी में बनी ‘गाइड’ और अंग्रेजी में बनी ‘द गाइड’ दोनों अलग अलग फिल्में हैं। हिंदी फिल्म की कहानी को उस समय के भारतीय दर्शकों की संवेदनाओं के हिसाब से फिर से गढ़ा गया है। और, ये काम फिल्म के निर्देशक विजय आनंद ने बेहतरीन तरीके से किया। यहां ये भी उल्लेखनीय है कि उपन्यास ‘द गाइड’ के लेखक आर के नारायण को भारत में रिलीज हुई ‘गाइड’ बिल्कुल पसंद नहीं आई थी और इसके बारे में उन्होंने एक आलेख भी लिखा। हालांकि फिल्फेयर ने उन्हीं को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ कहानी का पुरस्कार दिया।
वहीदा रहमान पर वाद विवाद
सब कुछ ठीक हो गया तो फिल्म की कास्टिंग शुरू हुई। फिल्म के अंग्रेजी संस्करण का निर्देशन टैड डैनिएलेवेस्की ने किया और हिंदी संस्करण का निर्देशन करने का मौका मिला देव आनंद के छोटे भाई विजय आनंद को। हालांकि फिल्म के हिंदी संस्करण का निर्देशन पहले देव आनंद के बड़े भाई चेतन आनंद करने वाले थे। फिल्म में देव आनंद, वहीदा रहमान और किशोर साहू की कास्टिंग भी फाइनल हो चुकी थी। नवकेतन की और देव आनंद की ये पहली रंगीन फिल्म थी और बहुत बड़े बजट की फिल्म थी। चेतन आनंद की दिक्कत ये थी कि वह किसी की सुनते नहीं थी। टैड से उनकी जम नहीं पा रही थी। फिल्म की हीरोइन वहीदा रहमान को लेकर भी उनका कहना था कि वह अंग्रेजी ढंग से बोल नहीं पाती हैं। चेतन चाहते थे कि लीला नायडू इस फिल्म की हीरोइन बनें। लेकिन देव आनंद ने कहा कि फिल्म बनेगी तो रोजी मार्को के रोल में वहीदा रहमान के साथ ही बनेगी नहीं तो नहीं बनेगी। इसी बीच भारत सरकार की चिट्ठी चेतन आनंद के पास आ गई और जिसमें युद्ध फिल्म ‘हकीकत’ की शूटिंग की उन्हें इजाजत मिल गई थी। भाइयों ने आपस में तय किया और चेतन आनंद ने फिल्म छोड़ दी। चेतन आनंद के जाने के बाद राज खोसला का नाम भी चला लेकिन वहीदा रहमान उनके साथ काम करने में सहज नहीं थी। विजय आनंद ने इसके बाद निर्देशन का काम संभाला और इस फिल्म में उनका काम अब तक हिंदी सिनेमा के बेहतरीन निर्देशन में गिना जाता है। फिल्म के गानों का चित्रण सिनेमा के छात्रों को क्लासरूम में पढ़ाया जाता है। विजय आनंद ने फिल्म ‘गाइड’ के लिए सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखक और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीता। विजय आनंद ने यहां एक काम ये किया कि फिल्म के गाने ‘वहां कौन है तेरा..’ को बिल्कुल उसी शॉट डिवीजन के साथ फिल्माया जो उनके बड़े भाई चेतन आनंद ने तय किया था।