निर्देशक हंसल मेहता के करियर की राह बदल देने वाली फिल्म 'शाहिद' हिंदी सिनेमा की ट्रेंडसेटर फिल्मों में शुमार है। हंसल मेहता को इसी फिल्म में सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। लेकिन, साल 2013 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई ये फिल्म अब तक किसी ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज नहीं हो सकी है। इस फिल्म के किसी ओटीटी प्लेटफार्म पर उपलब्ध न हो पाने पर फिल्म के निर्देशक हंसल मेहता ने निराशा जताई है।
Hansal Mehta: कहां है राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में चमकी ‘शाहिद’, हंसल मेहता ने यूं जताई सार्वजनिक नाराजगी
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हंसल मेहता निर्देशित फिल्म 'शाहिद' मानवाधिकार कार्यकर्ता शाहिद आजमी के जीवन पर आधारित थी, जिनकी साल 2010 में मुंबई में हत्या कर दी गई थी। इस फिल्म को दर्शकों के साथ ही समीक्षकों ने भी खूब सराहना की थी। यह फिल्म साल 2012 में टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सव में प्रदर्शित की गई। और, इस फिल्म के लिए जहां निर्देशक हंसल मेहता का सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। वहीं, इस फिल्म के लिए अभिनेता राजकुमार राव को भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।
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फिल्म के निर्देशक हंसल मेहता ने ट्विटर पर इस बात लेकर आश्चर्य जताया कि जिस फिल्म को खूब पसंद किया गया वह किसी ओटीटी प्लेटफार्म पर उपलब्ध नहीं है। हंसल मेहता ने कहा, 'फिल्म एक स्टूडियो के पास पड़ी है, जिसे इसकी कोई परवाह नहीं है। ऐसा लगता है कि हमने अल्पसंख्यकों पर प्रकाश डालने वाली कहानियों की परवाह करना बंद करना शुरू कर दिया है।'
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निर्देशक हंसल मेहता ने कहा, 'यह मेरे और उन लोगों के लिए निजी तौर पर दुख की बात है, जिन्होंने कई बाधाओं के बावजूद इसे बनाने में कड़ी मेहनत की। जब इस फिल्म की लोगों के खूब सराहना की, समीक्षकों ने फिल्म की प्रशंसा की। तो, ऐसी फिल्म को ओटीटी पर रिलीज करने में क्या दिक्कत हो सकती है।'
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फिल्म 'शाहिद' मानवाधिकार कार्यकर्ता शाहिद आजमी के जीवन पर आधारित थी। शाहिद आजमी को मुंबई पुलिस ने जब 1992 के बम धमाकों में कथित तौर पर आतंक फैलाने का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया जाता है। शाहिद को महसूस हुआ कि बेगुनाह होने के बावजूद जेल में बंद अकेला वही नहीं है। उनकी तरह जैसे सैकड़ों और भी हैं, जिन्हें पुलिस ने सिर्फ शक के आधार पर थर्ड डिग्री टॉर्चर देने के बाद जेल में बंद कर रखा है। यहीं रहकर शाहिद ने कानून की पढ़ाई पूरी की और बाहर आकर अल्पसंख्यक समुदाय के उन तमाम लोगों की मदद की, जिन्हें पुलिस ने सिर्फ शक के आधार पर बंद कर रखा था।
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