कॉलेज के समय से ही करीना कपूर से प्रेरित रहीं अभिनेत्री राधिका मदान किसी की नकल नहीं करना चाहतीं। दिल्ली की सारी चटोरी गलियों की खाक छान चुकी राधिका बिल्कुल देसी अंदाज में जीती हैं और हर त्योहार का खुलकर लुत्फ उठाती हैं।
अमर उजाला से मुलाकात में बोलीं राधिका मदान, 'मेरे सपनों को साकार करने में मेरे पिता ने बहुत मदद की'
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देश में त्योहार का मतलब होता है तरह तरह के व्यंजन, पकवानों के मामले में आप कितनी देसी हैं?
मैं दिल से बहुत ही देसी हूं। आप मुझसे पूछ सकते हैं कि कि दिल्ली में सबसे अच्छे छोले-भटूरे कहां मिलते हैं, सबसे अच्छी सेवपुरी कहां मिलती है? मुझे सब पता है। छोले-भटूरे खाने के लिए ही तो मैं दिल्ली में कहीं तक भी जा सकती हूं। चाय अच्छी कहां मिलेगी या फिर बेहतरीन मैगी कहां मिलती है, ये सब मैंने घूमते फिरते ही जाना है।
अभिनय की शुरुआत में हर कलाकार के मन में किसी न किसी कलाकार की छवि रहती है, आप किसकी प्रशंसक रही हैं?
मैं करीना कपूर की बहुत बड़ी फैन हूं लेकिन मैं अगर आगे चलकर कितना भी अच्छा कर लूंगी फिर भी लोग मेरी तुलना करीना के साथ ही करेंगे। प्रेरित होना अच्छी बात है। लेकिन किसी कलाकार की नकल करना मुझे बिल्कुल सही नहीं लगता। सीखने के मामले में मैं बहुत अच्छी छात्रा हूं पर मुझे कॉपी करना पसंद नहीं है।
फिल्म अंग्रेजी मीडियम में आप इरफान की बेटी बनी हैं, उनकी कलाकारी से आपने क्या-क्या सीखा?
इरफान अपने आप में अभिनय का एक स्कूल हैं। वह अब भी किसी किरदार को उतनी ही गहराई से पढ़ते हैं, जैसे कोई नया कलाकार पढ़ता है। वह नोट्स बनाते हैं और कोई बड़ा सीन होने पर नए कलाकार के जितना ही डरते हैं। मैं यह जानकर बड़ी हैरान थी कि 50 से 60 फिल्में करने के बाद इरफान खान को डर लगता है। यही कारण है कि उनके हर किरदार में एक नयापन दिखता है। उनको देखकर ही बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
फिल्म 'पटाखा' रिलीज होने से पहले और उसके बाद आपके दोस्तों और रिश्तेदारों का नजरिया आपके प्रति कितना बदला?
मैंने पहले 'मर्द को दर्द नहीं होता' साइन की थी लेकिन रिलीज पहले 'पटाखा' हुई। लोगों का नजरिया तो मेरे प्रति तभी बदल गया था जब मैंने टीवी में काम करना शुरू किया। लेकिन मैंने एक बात समझी कि टीवी में प्रसिद्धि जितनी जल्दी मिलती है, उतनी ही जल्दी चली भी जाती है।