हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता और निर्देशक सतीश कौशिक को याद करने के लिए लखनऊ में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहां प्रसिद्ध पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने भी शिरकत की। उन्होंने सतीश के साथ बिताए दिनों की यादें साझा कीं। जावेद ने अपने दोस्त को याद करते हुए कहा कि सतीश ने अपने निधन से ठीक एक दिन पहले मुंबई में हमारे घर पर होली मनाई थी। मैं उनके बहुत करीब था और वह मेरे लिए एक छोटे भाई की तरह थे।
Javed Akhtar: 'सतीश के पास जबर्दस्त सेंस ऑफ ह्यूमर था', एक्टर के साथ बिताए दिनों की यादों में डूबे जावेद अख्तर
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जावेद अख्तर ने सतीश और अपनी मुलाकात के दिनों को याद करते हुए कहा कि जब मैं उनसे मिला तो वह फिल्म 'मासूम' में सहायक निर्देशक थे। मैंने उन्हें पहले एक बहुत प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंदुलकर के 'गिद्ध' नाटक में देखा था। मैंने सतीश को देखा और पूछा कि वह कौन हैं, तब मुझे बताया गया कि वह एक कारखाने का कर्मचारी हैं, जो नाटक भी करते हैं। बाद में मुझे पता चला कि मुझे गलत जानकारी दी गई थी, क्योंकि जिस व्यक्ति से मैंने सतीश के बारे में पूछा था, वह उनका सबसे अच्छा दोस्त था, जिसे लगा था कि सतीश को काम करने का बेहतर अवसर मिलेगा, इसलिए उन्होंने मुझसे झूठ कहा था।
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जावेद अख्तर ने कहा कि सतीश एक असाधारण व्यक्ति थे। मैं इंडस्ट्री में उनके जैसी शख्सियत से कभी नहीं मिला। उनके बारे में कुछ बहुत अच्छा था। वह जिससे भी मिले, उन्हें अपना बना लिया। आप देख सकते हैं कि उनके निधन के बाद उन्हें कितना प्यार मिला। कई लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी और फिर मुंबई में एक ऐसा कार्यक्रम हुआ, जिसमें पूरा बॉलीवुड एक छत के नीचे आ गया। यह उनकी जबर्दस्त सद्भावना थी।
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जावेद अख्तर ने कहा कि सतीश एक सीधे-सादेआदमी थे और बहुत होशियार थे। वह सब के आर पार देख सकते थे। वह किसी व्यक्ति के मकसद, दृष्टिकोण और भावनाओं को समझ सकते थे। उनमें भरपूर ज्ञान था। अगर कोई उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता था तो फिर भी वह उस व्यक्ति को सम्मान देते थे। वह हमेशा समझौता करते थे। उनके पास क्षमा और उदारता की समझ थी।
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सतीश के व्यक्तित्व के बारे में बात करते हुए जावेद ने कहा कि सतीश हमेशा मुस्कुराते थे और उनमें जबर्दस्त सेंस ऑफ ह्यूमर था, लेकिन उसके पीछे एक बहुत ही गंभीर और संवेदनशील व्यक्ति था। मुझे इस बात का दुख है कि सतीश की कहानी पूरी नहीं हो पाई। उन्होंने एक निर्माता और निर्देशक के रूप में अभी-अभी उड़ान भरी थी और उन्हें लखनऊ में बड़ा समर्थन मिला। अगर, वह दो-तीन साल और बने रहते तो मुझे यकीन है कि उनकी कंपनी 150-200 करोड़ रुपये तक पहुंच गई होती।
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