'जीरो' की रिलीज ने हिंदी सिनेमा की बरसों से चली आ रही रीतियों के तमाम जाले एकदम से साफ कर दिए हैं। यह जाले साफ करने में अभिनेता-निर्माता जॉन अब्राहम पिछले कई साल से लगे हैं। साल 2018 में सिर्फ दो अभिनेता ऐसे हैं जिनकी फिल्मों ने 300 करोड़ रुपए के आसपास कमाए। एक हैं आयुष्मान खुराना और दूसरे जॉन अब्राहम। दिलचस्प बात यह है कि आयुष्मान खुराना को जॉन ने ही बड़े परदे पर लांच किया। जॉन अब्राहम से अमर उजाला की मुलाकात के कुछ अंश।
15 साल बाद जॉन अब्राहम का बड़ा खुलासा, बोले- 'मैं जो कुछ हूं गलतियों की वजह से हूं'
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15 साल पहले जिस इंसान को मॉडल है दो तीन गाने कर फाइट कर लेगा लेकिन ऐक्टिंग नहीं कर पाएगा। ऐसा कहने वाली इंडस्ट्री आज उसकी डेट्स के लिए परेशान है। कैसे आया ये बदलाव?
सही कहा आपने। आपने जो बातें कहीं बिल्कुल सही हैं। मैं मार्केटिंग का आदमी हूं। मुझे शुरू में पता था कि वही बेचो जो लोग पसंद कर रहे हैं। मेरा चेहरा बिकाऊ था। मेरी फिटनेस के लोग कायल थे। तो मैंने वही बेचा। लेकिनए फिर धीरे धीरे ये सब करते हुए मैं परेशान होने लगा। लेकिन मेरे पास जो ऑफर्स आ रहे थे वह अब भी वैसे ही थे तो मैंने समझ बूझकर निर्माता बनने का फैसला लिया कि मैं वैसी फिल्में करूंगा जो मैं करना चाहता हूं।
तो आपने मानते हैं कि शुरू में आपसे गलतियां हुईं। फिल्मों के मामले में रिश्तों के मामले में?
जी हां और मैं गलतियां स्वीकार करने में गुरेज नहीं करता। फिल्मों में भी और रिश्तों में भी मैंने गलतियां की हैं। और मैं ये कह सकता हूं कि अब जो मैं हूं वह इन्हीं गलतियों की वजह से ही हूं। युवा पीढ़ी के लोग मुझसे मिलने आते हैं और सलाह मांगते हैं। मैं उनके बस इतना कहता हूं कि आप सब वही करना जो मैंने नहीं किया।
आयुष्मान खुराना साल 2018 के सबसे बड़े स्टार हैं। कैसे है उनसे अब आपका रिश्ता?
यह उन दिनों की बात है जब मेरे पास स्क्रिप्ट आई थी जाफना के नाम से। फिर इसी पर मद्रास कैफे के नाम से फिल्म बनी। उसी समय मेरे पास शुजीत यह 'विकी डोनर' की स्क्रिप्ट लेकर आए। आयुष्मान को मैंने टीवी पर देखा वीजे के रूप में। मुझे लगा कि चंडीगढ़-दिल्ली का यह लड़का ये रोल सही कर लेगा। 'शुभ मंगल सावधान', 'बधाई हो' ये एक नया जॉनर बना 'विकी डोनर' के बाद। आयुष्मान से गाहे बेगाहे बात मुलाकात होती रहती है। एक स्क्रिप्ट हमने सुनाई है आयुष्मान को। उसे अच्छी भी लगी है। खुशखबरी जल्दी आनी चाहिए।
'मद्रास कैफे' की बात हम कर रहे थे। भारत में पॉलिटिकल थ्रिलर बनाना बहुत मुश्किल है। सेंसर और सियासत को देखते हुए। राजीव गांधी हत्याकांड पर ही फिल्म क्यों बनाई अपनी इमेज बदलने के लिए?
मैं ना सो रहा था। मेरे चेहरे में एक बूंद गिरी। आंख खुली तो देखा कि मां परदे खोल रही हैं और रो रही हैं। मैंने पूछा कि क्या हुआ तो उन्होंने बताया कि राजीव गांधी की हत्या हो गई है। फिर मैंने टेलीविजन पर देखा। मैगजीन के कवर पर देखा। राजीव गांधी का चेहरा और लोटो के जूते मेरे जेहन में कैद हो गए। अब भी मैं इस बारे में बात करता हूं तो झुरझुरी सी होती है। इस फिल्म के लिए हमने जैन कमीशन की पूरी 300 पन्नों की रिपोर्ट पढ़ी। लोग बोलते थे कि ये क्या बना रहे हो? फिर इम्तियाज अली. कबीर खान. निखिल आडवाणी सबने तारीफ की तो मुझे लगा कि मैंने कुछ गलत नहीं किया। क्या है हम एक्टर्स लोग भिखारी हैं। तारीफ के भूखे। कहीं से मिलती है तो आमदनी समझकर जेब में तुरंत रख लेते हैं।