छोटे पर्दे का शो 'खिचड़ी' काफी लोकप्रिय शो रहा हैं। इसी शो से प्रेरित होकर शो के मेकर्स ने साल 2010 में फिल्म 'खिचड़ी' का निर्माण किया था, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया। अब 13 साल के बाद 'खिचड़ी 2-मिशन पंथुकिस्तान' 17 नवंबर को रिलीज हो रही है। खिचड़ी ब्रांड का लोकप्रिय किरदार हंसा एक बार फिर दर्शकों को बड़े पर्दे पर हंसाने आ रहे है। हंसा की भूमिका भूमिका निभाने वाली सुप्रिया पाठक ने हाल ही में अमर उजाला से खास बातचीत की।
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खिचड़ी से लेकर फिल्म खिचड़ी 2 तक आपकी बड़ी लंबी यात्रा रही है. इस यात्रा से जुड़ी कुछ यादें शेयर करना चाहेंगी ?
खिचड़ी से जुडी से बहुत सारी यादे हैं। मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगी कि जीवन में जितनी भी चीजे ही सकती हैं, वह सब कुछ खिचड़ी में है, बहुत कुछ बदला। लेकिन एक चीज जो इतने अर्से से बरकरार रही है वह यह कि खिचड़ी का जो ह्यूमर है वह नहीं बदला। हम जिस दौर से गुजरे हैं और अभी भी जो हमें आस पास दौर दिख रहा है। उसमें फिल्म 'खिचड़ी 2' एक खुशी की फूलझड़ी की तरह है जो आपको दो घण्टे तनाव से मुक्त कर देगी। वह फिल्म 17 नवंबर को रिलीज हो रही है। यह दीवाली की खुशियों का एक्सटेंशन हैं।
आपके लिए दिवाली की खुशियों के क्या मायने है?
मेरे लिए दिवाली की खुशियों के मायने हैं, अंदर का दिया जलाना। आप के अंदर जो संतुष्टि है उसे बरकरार रखना जरूरी है। मैं हर साल दिवाली में एकांत में बैठकर खुद को समझती हूं कि जिंदगी कितनी खूबसूरत है। अगर आप उसे सकारात्मक दृष्टि से देखें, तो जिंदगी जीने का अपना एक अलग ही मजा और अनुभव है। जिंदगी में अच्छी और बुरी दोनों तरह की सिचुएशन आती है, हर सिचुएशन में जितना हो सके अपने आपको दिमागी तौर पर संयम से जीएं। वह सबसे बेहतर चीज है। यहीं एक ऐसी चीज है जो आपको आगे ले जाएगी।
घर पर परिवार के साथ किस तरह से दिवाली का त्यौहार मनाती हैं आप?
हम बचपन में जिस तरह से दिवाली मनाते थे, वैसी दिवाली जब शादी के बाद पंकज (कपूर) के घर आई, उसके बाद से नहीं मनाते है। हमारे सास ससुर राधास्वामी को मानने वाले थे। हम सब मिलकर अच्छा खाना खाते थे, दीये जलाते थे लेकिन लक्ष्मी पूजा नहीं होती नहीं होती थी। राधास्वामी की परम्परा के अनुसार दिवाली के दिन सतनाम का स्मरण करते थे। सास ससुर के जाने के बाद मैंने और पंकज ने उसी परम्परा का अनुसरण किया। जैसा हमारे सास ससुर करते आ रहे थे।
बचपन में दिवाली से जुड़ी कुछ खास यादें, अपने पिता बलदेव पाठक के साथ दिवाली कैसे मनाती थी आप?
जब मैं छोटी थी तब मेरे पिता जी कपड़े डिजाइन करते थे। उनकी एक दुकान थी। उस समय अकाउंट के लिए जो लाल किताब होती थी जिसे चौपड़ी कहते थे। पुराने साल की बंद होती थी और नए साल की शुरू होती थी। दुकान में एक पूजा होती थी। पंडित जी आते थे और सारी किताबों के ऊपर पहले कुमकुम से स्वास्तिक बनाते थे। और, फिर उसकी पूजा होती थी। दीवाली को लेकर यह मेरी सबसे मजबूत याददाश्त है।