{"_id":"607ec7668ebc3e8d384ba1e1","slug":"legendary-lyricist-shakeel-badayuni-death-anniversary-he-wrote-iconic-songs-for-several-hit-films","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"‘सिलसिला खत्म न होगा मेरे अफसाने का…’ वो महान गीतकार 51 साल बाद भी जिंदा है जिसका ‘करिश्मात-ए-तसव्वुर’","category":{"title":"Bollywood","title_hn":"बॉलीवुड","slug":"bollywood"}}
‘सिलसिला खत्म न होगा मेरे अफसाने का…’ वो महान गीतकार 51 साल बाद भी जिंदा है जिसका ‘करिश्मात-ए-तसव्वुर’
‘हश्र तक गर्मी-ए-हंगामा-ए-हस्ती है 'शकील’, सिलसिला खत्म न होगा मेरे अफसाने का…’ कानों में गूंजने वाले जिसकी कलम से निकले उस महान लिरिस्ट की आज पुण्यतिथि है। जब यूपी के ऐतिहासिक शहर बदायूं में शकील अहमद का जन्म हुआ था तब किसे पता था कि उनकी स्याही में इतनी तपिश होगी कि शहर को उनके नाम से पहचाना जाने लगेगा। और वे कलम की रवानगी में वक्त के साथ शकील बदायूंनी बन जाएंगे।
2 of 8
शकील बदायूंनी
वक्त के साथ न कला मरती है न ही कलाकार। सिर्फ एक जिक्र छेड़ देने भर से ही पूरा दौर दोहरा जाता है। कुछ ऐसा ही अफसाना है शकील बदायूंनी का भी। वे हिंदी फिल्म उद्योग के सबसे महान गीतकारों में से एक माने जाते हैं। उनके शब्दों दिल-ओ-दिमाग से निकले अल्फाज ने न जाने कितने नजमें गढ़ दिए।
3 of 8
shakeel badayuni
- फोटो : shakeel badayuni
अपने शुरुआती वर्षों के दौरान घर पर शैक्षिक माहौल ने शकील को फारसी, अरबी और उर्दू जैसी कई भाषाओं को सीखने में मदद की। और उन्हें कविताओं में रुझान हो गया। कविता के प्रति झुकाव को देखते हुए उन्होंने लीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बीए की डिग्री हासिल करने के दौरान मुशायरों में भाग लेना शुरू कर दिया। बस फिर क्या था जल्द ही उन्हें कविता में उभरती आवाज के रूप में पहचाना जाने लगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
4 of 8
शकील बदायुनी
उन दिनों शकील की मुलाकात प्रसिद्ध कवि जिगर मुरादाबादी से हो गई। और वे उनके नायक बन गए। 1946 में वह मुंबई पहुंचे। उस वक्त भारतीय फिल्म उद्योग ने विभाजन के दौरान कई नामी कलाकारों और गीतकारों को खो दिया था, क्योंकि वो पड़ोसी देश पाकिस्तान चले गए थे। ये वक्त शकील के लिए बेहतरीन अवसर साबित हुआ। एआर करदार यानी अकबर राशिद करदार और निर्देशक नौशाद ने मुशायरे में देखा। ये दोनों अपनी आगामी फिल्म डार (1947) के लिए एक नए गीतकार की तलाश में थे। नौशाद ने युवा शकील की कविता से प्रभावित होकर उन्हें फिल्म ऑफर कर दी। यहीं से गीत-संगीत की दुनिया में शकील की पेशेवर शुरुआत हुई। बाद में इनकी जोड़ी भी हिट साबित होने लगी।
विज्ञापन
5 of 8
शकील बदायूंनी
वे न केवल अद्भुत धुन थे, बल्कि ज्यादातर फिल्मों की व्यावसायिक सफलता के पीछे का कारण भी थे, जो उन्होंने साबित किया - आन (1952), बैजू बावरा (1952), मदर इंडिया (1957), मुगल-ए-आज़म (1960), कोहिनूर (1960), गंगा जमुना (1961) और मेरे महबूब (1963) जैसी फिल्मों में। शकील ने संगीत निर्देशक गुलाम मुहम्मद के साथ भी अच्छा तालमेल स्थापित किया और उनके लिए कई अविस्मरणीय गीत लिख डाले।
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।