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देवानंद से उर्मिला मातोंडकर तक वो सितारे, कुछ राजनीति में हिट तो कुछ फ्लॉप
Wed, 24 Apr 2019 01:19 PM IST
anand anand
बीबीसी हिंदी
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Published by: anand anand
Updated Wed, 24 Apr 2019 01:19 PM IST
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Devanand, Urmila Matondkar
- फोटो : amar ujala
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40 साल पहले…14 सितम्बर, 1979 का दिन था। उस वक़्त के बंबई में ताजमहल होटल में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस हुई। वो इंदिरा गांधी की लगाई इमरजेंसी के बाद वाला दौर था जब जनता पार्टी का प्रयोग भी विफल हो चुका था। दोनों पक्षों से नाराज़ कुछ लोगों ने मिलकर नए राजनीतिक दल 'नेशनल पार्टी' बनाने की घोषणा की। इस पार्टी के अध्यक्ष थे देव आनंद।
सुनील दत्त
- फोटो : file photo
इंदिरा गांधी की हत्या और राजनीति में सितारे
80 के दशक में ही एक ऐसी राजनीतिक घटना हुई, जिसने फ़िल्मी दुनिया को भी प्रभावित किया। वो थी अक्टूबर, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या। दिसंबर 1984 में चुनाव होने थे। राजीव गांधी ने अपने दोस्त और सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और सुनील दत्त से चुनाव लड़ने के लिए कहा।
सुनील दत्त 1984 में चुनाव जीत गए और सांसद बनने के बाद 2005 में मरते दम तक कांग्रेस में ही रहे, भले ही पार्टी से उनका मन मुटाव भी हुआ। जब सुनील दत्त ने चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया तो दिसंबर 1984 में घर में एक तरफ़ बेटी नम्रता दत्त और कुमार गौरव की शादी की तैयारियां चल रही थीं तो दूसरी ओर चुनाव अभियान की।
सुनील दत्त उन चंद हिंदी फ़िल्मी सितारों में से थे जो केंद्र में मंत्री भी बने और बतौर राजनेता उनकी बहुत इज़्ज़त थी। 2004 में पांचवी बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले सुनील दत्त को खेल और युवा कल्याण मंत्री बनाया गया।
80 के दशक में ही एक ऐसी राजनीतिक घटना हुई, जिसने फ़िल्मी दुनिया को भी प्रभावित किया। वो थी अक्टूबर, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या। दिसंबर 1984 में चुनाव होने थे। राजीव गांधी ने अपने दोस्त और सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और सुनील दत्त से चुनाव लड़ने के लिए कहा।
सुनील दत्त 1984 में चुनाव जीत गए और सांसद बनने के बाद 2005 में मरते दम तक कांग्रेस में ही रहे, भले ही पार्टी से उनका मन मुटाव भी हुआ। जब सुनील दत्त ने चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया तो दिसंबर 1984 में घर में एक तरफ़ बेटी नम्रता दत्त और कुमार गौरव की शादी की तैयारियां चल रही थीं तो दूसरी ओर चुनाव अभियान की।
सुनील दत्त उन चंद हिंदी फ़िल्मी सितारों में से थे जो केंद्र में मंत्री भी बने और बतौर राजनेता उनकी बहुत इज़्ज़त थी। 2004 में पांचवी बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले सुनील दत्त को खेल और युवा कल्याण मंत्री बनाया गया।
Rajesh Khanna
- फोटो : twitter
जब चुनाव प्रचार में अमिताभ बच्चन को 'नचनिया' कहा गया
1984 में सुपरस्टार अमिताभ बच्चन का इलाहाबाद से हेमवती नंदन बहुगुणा से चुनाव लड़ना उस समय की सबसे बड़ी ख़बर थी। वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई अपनी किताब 'नेता अभिनेता' में लिखते हैं, "बहुगुणा क़द्दावर नेता थे। वो चुनाव प्रचार में अमिताभ को 'नौसिखिया', और 'नचनिया' बोलते थे। ये जया बच्चन ही थीं जिन्होंने अमिताभ के प्रचार अभियान में जान फूंकी और चुनाव जितवाया।"
लेकिन राजनीति ने ऐसी करवट ली कि बोफ़ोर्स घोटाले में नाम आने के बाद सांसद अमिताभ का राजनीति से मोह भंग हो गया और उन्होंने राजनीति छोड़ दी। साथ ही उनकी गांधी परिवार से दूरी भी बढ़ने लगी। उसके बाद से अमिताभ बच्चन ने कभी सक्रिय राजनीति में हिस्सा नहीं लिया।
राजेश खन्ना और आडवाणी में कांटे की टक्कर
अमिताभ बच्चन अकेले सुपरस्टार नहीं थी जिन्होंने राजनीति में किस्मत आज़माई। 1991 के चुनाव के समय अमिताभ फ़िल्मों और राजनीति दोनों से दूर हो चुके थे। ये लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए अहम था। उस समय राजीव गांधी ने राजेश खन्ना से नई दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए आग्रह किया। ये महज़ संयोग था कि कभी राजेश खन्ना और अमिताभ एक तरह से प्रतिदंद्वी ही थे और बच्चन के बाद कांग्रेस से राजेश खन्ना चुनाव लड़ रहे थे।
1991 के चुनाव में राजेश खन्ना आडवाणी से सिर्फ़ 1,589 वोटों से हारे थे। 1991 की वो फ़ोटो ख़ासी चर्चित है जिसमें राजीव और सोनिया गांधी दिल्ली में निर्माण भवन चुनावी स्टेशन पर राजेश खन्ना को वोट डालने के लिए खड़े हैं। उनके पीछे राजेश खन्ना भी हैं। राशिद किदवई अपनी किताब में लिखते हैं कि सार्वजनिक जीवन की ये राजीव गांधी की आख़िरी तस्वीर थी । इसके कुछ घंटों बाद एक आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की मौत हो गई और 21 मई को राजेश खन्ना के साथ उनकी ये तस्वीर छपी।
1984 में सुपरस्टार अमिताभ बच्चन का इलाहाबाद से हेमवती नंदन बहुगुणा से चुनाव लड़ना उस समय की सबसे बड़ी ख़बर थी। वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई अपनी किताब 'नेता अभिनेता' में लिखते हैं, "बहुगुणा क़द्दावर नेता थे। वो चुनाव प्रचार में अमिताभ को 'नौसिखिया', और 'नचनिया' बोलते थे। ये जया बच्चन ही थीं जिन्होंने अमिताभ के प्रचार अभियान में जान फूंकी और चुनाव जितवाया।"
लेकिन राजनीति ने ऐसी करवट ली कि बोफ़ोर्स घोटाले में नाम आने के बाद सांसद अमिताभ का राजनीति से मोह भंग हो गया और उन्होंने राजनीति छोड़ दी। साथ ही उनकी गांधी परिवार से दूरी भी बढ़ने लगी। उसके बाद से अमिताभ बच्चन ने कभी सक्रिय राजनीति में हिस्सा नहीं लिया।
राजेश खन्ना और आडवाणी में कांटे की टक्कर
अमिताभ बच्चन अकेले सुपरस्टार नहीं थी जिन्होंने राजनीति में किस्मत आज़माई। 1991 के चुनाव के समय अमिताभ फ़िल्मों और राजनीति दोनों से दूर हो चुके थे। ये लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए अहम था। उस समय राजीव गांधी ने राजेश खन्ना से नई दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए आग्रह किया। ये महज़ संयोग था कि कभी राजेश खन्ना और अमिताभ एक तरह से प्रतिदंद्वी ही थे और बच्चन के बाद कांग्रेस से राजेश खन्ना चुनाव लड़ रहे थे।
1991 के चुनाव में राजेश खन्ना आडवाणी से सिर्फ़ 1,589 वोटों से हारे थे। 1991 की वो फ़ोटो ख़ासी चर्चित है जिसमें राजीव और सोनिया गांधी दिल्ली में निर्माण भवन चुनावी स्टेशन पर राजेश खन्ना को वोट डालने के लिए खड़े हैं। उनके पीछे राजेश खन्ना भी हैं। राशिद किदवई अपनी किताब में लिखते हैं कि सार्वजनिक जीवन की ये राजीव गांधी की आख़िरी तस्वीर थी । इसके कुछ घंटों बाद एक आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की मौत हो गई और 21 मई को राजेश खन्ना के साथ उनकी ये तस्वीर छपी।
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विनोद खन्ना
- फोटो : file photo
भाजपा से कांग्रेस तक पहुंचे शत्रुघ्न सिन्हा
जब 1992 में उपचुनाव हुआ तो राजेश खन्ना फिर नई दिल्ली से लड़े। उन्होंने अपने दोस्त और भाजपा में शामिल हो चुके शत्रुघ्न सिन्हा को हराया। शत्रुघ्न सिन्हा उन शुरुआती हिंदी कलाकारों में से थे जिन्होंने कांग्रेस के बजाय किसी विपक्षी दल के ज़रिए राजनीति में कदम रखा। इमरजेंसी के दौरान वो जेपी से प्रभावित थे। लेकिन 90 के दशक में उन्होंने भाजपा का दामन थामा।
राजेश खन्ना से वो लोकसभा चुनाव हार गए लेकिन आडवाणी-वाजपयी के वो काफ़ी करीब थे। शत्रुघ्न शायद पहले हिंदी फ़िल्मी सितारे थे जो केंद्रीय मंत्री बने (2003-04) और कई बार सांसद भी। हालांकि मोदी शासन के बाद से शत्रु्घ्न अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़े हुए थे। ये समय का चक्र ही है कि कभी इमरजेंसी का विरोध करने वाले शत्रुघ्न 2019 में कांग्रेस में शामिल हो गए।
विनोद खन्ना: फ़िल्में, संन्यास और संसद
ये भी अजब इत्तेफ़ाक़ है कि हिंदी फ़िल्मों में 70-80 के दशक में साथ काम करने वाले कई सितारे राजनीति में आए। अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा के बाद तो विनोद खन्ना को राजनीति ख़ूब भाई।
80 के दशक में तो वे फ़िल्मों से संन्यास लेकर ओशो के पास चले गए थे।
लेकिन पंजाबी परिवार से आने वाले विनोद खन्ना ने 1998 में गुरदासपुर, पंजाब से एक बाहरी होने के बावजूद लोकसभा चुनाव लड़ा। 2009 का चुनाव छोड़ दिया जाए तो अपनी मौत तक वे वहां से सांसद रहे और विदेश राज्य मंत्री भी बने। उनके रहते इलाक़े में कई ब्रिज बने और उन्हें 'सरदार ऑफ ब्रिज' भी कहा जाने लगा।
जब 1992 में उपचुनाव हुआ तो राजेश खन्ना फिर नई दिल्ली से लड़े। उन्होंने अपने दोस्त और भाजपा में शामिल हो चुके शत्रुघ्न सिन्हा को हराया। शत्रुघ्न सिन्हा उन शुरुआती हिंदी कलाकारों में से थे जिन्होंने कांग्रेस के बजाय किसी विपक्षी दल के ज़रिए राजनीति में कदम रखा। इमरजेंसी के दौरान वो जेपी से प्रभावित थे। लेकिन 90 के दशक में उन्होंने भाजपा का दामन थामा।
राजेश खन्ना से वो लोकसभा चुनाव हार गए लेकिन आडवाणी-वाजपयी के वो काफ़ी करीब थे। शत्रुघ्न शायद पहले हिंदी फ़िल्मी सितारे थे जो केंद्रीय मंत्री बने (2003-04) और कई बार सांसद भी। हालांकि मोदी शासन के बाद से शत्रु्घ्न अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़े हुए थे। ये समय का चक्र ही है कि कभी इमरजेंसी का विरोध करने वाले शत्रुघ्न 2019 में कांग्रेस में शामिल हो गए।
विनोद खन्ना: फ़िल्में, संन्यास और संसद
ये भी अजब इत्तेफ़ाक़ है कि हिंदी फ़िल्मों में 70-80 के दशक में साथ काम करने वाले कई सितारे राजनीति में आए। अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा के बाद तो विनोद खन्ना को राजनीति ख़ूब भाई।
80 के दशक में तो वे फ़िल्मों से संन्यास लेकर ओशो के पास चले गए थे।
लेकिन पंजाबी परिवार से आने वाले विनोद खन्ना ने 1998 में गुरदासपुर, पंजाब से एक बाहरी होने के बावजूद लोकसभा चुनाव लड़ा। 2009 का चुनाव छोड़ दिया जाए तो अपनी मौत तक वे वहां से सांसद रहे और विदेश राज्य मंत्री भी बने। उनके रहते इलाक़े में कई ब्रिज बने और उन्हें 'सरदार ऑफ ब्रिज' भी कहा जाने लगा।
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धर्मेंद्र ने किया हेमा मालिनी के लिए प्रचार
- फोटो : Hema Malini Twitter
राजनीति में 'ड्रीम गर्ल'
जब विनोद खन्ना 1999 में भाजपा से चुनाव लड़ रहे थे तो उन्होंने हेमा मालिनी से उनके लिए प्रचार करने के लिए कहा। हेमा का राजनीति से कोई नाता नहीं था। उन्होंने शुरुआती उलझन के बाद विनोद खन्ना के लिए प्रचार किया और यहीं से उनका अपना राजनीतिक सफ़र भी शुरु हुआ। हेमा मालिनी जल्द ही भाजपा में शामिल हुईं और राज्य सभा सदस्य रहीं।
2014 लोकसभा चुनावों में मथुरा से उन्होंने जाट नेता जयंत सिंह को तीन लाख से ज़्यादा वोटों से हरा दिया था। लेकिन उनका कार्यकाल विवादों भरा रहा है। कभी वृंदावन की वृद्ध विधवाओं पर बयान को लेकर तो कभी उनकी कार से हुई दुर्घटना में मारी गई बच्ची पर बयान को लेकर।
भीड़ में बोलने से डरने वाली जया बनीं नेता
महिला राजनेताओं की बात करें तो फ़िल्मी दुनिया से जया प्रदा ने भी अलग जगह बनाई। हिंदी और तेलुगू फ़िल्मों में जया प्रदा ख़ूब हिट थीं। पांच फ़िल्मों में जया के हीरो रह चुके एनटीआर के कहने पर वे 1994 में तेलुगू देशम पार्टी में शामिल हो गईं। हालांकि जल्द ही वे पाला बदल चंद्रबाबू नायडू से जा मिलीं। राजनीति का अनुभव न होने के कारण शुरू-शुरू में उनकी ख़ूब आलोचना भी होती थी। लेकिन धीरे-धीरे वो पार्टी की बड़ी प्रचारक बन गईं। 1996 में जया प्रदा राज्य सभा पहुंची। उनके करियर में बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया।
"मुझे मालूम है कि रामपुर वाले बेटी को खाली हाथ नहीं भेजते... भीड़ में बोलने से डरने वाली जया प्रदा के तेवर रामपुर में बदल चुके थे। दक्षिण से आई जया प्रदा ने 2004 और 2009 में उत्तर प्रदेश के रामपुर से लगातार दो बार लोकसभा चुनाव जीत सबको हैरत में डाल दिया। समाजवादी पार्टी में आज़म खान से उनकी हमेशा खटकती रही जिसके बाद वो सपा से अलग हो गईं। 2019 में जया ने भाजपा का दामन थामा है और रामपुर से ही चुनाव लड़ा।
जब विनोद खन्ना 1999 में भाजपा से चुनाव लड़ रहे थे तो उन्होंने हेमा मालिनी से उनके लिए प्रचार करने के लिए कहा। हेमा का राजनीति से कोई नाता नहीं था। उन्होंने शुरुआती उलझन के बाद विनोद खन्ना के लिए प्रचार किया और यहीं से उनका अपना राजनीतिक सफ़र भी शुरु हुआ। हेमा मालिनी जल्द ही भाजपा में शामिल हुईं और राज्य सभा सदस्य रहीं।
2014 लोकसभा चुनावों में मथुरा से उन्होंने जाट नेता जयंत सिंह को तीन लाख से ज़्यादा वोटों से हरा दिया था। लेकिन उनका कार्यकाल विवादों भरा रहा है। कभी वृंदावन की वृद्ध विधवाओं पर बयान को लेकर तो कभी उनकी कार से हुई दुर्घटना में मारी गई बच्ची पर बयान को लेकर।
भीड़ में बोलने से डरने वाली जया बनीं नेता
महिला राजनेताओं की बात करें तो फ़िल्मी दुनिया से जया प्रदा ने भी अलग जगह बनाई। हिंदी और तेलुगू फ़िल्मों में जया प्रदा ख़ूब हिट थीं। पांच फ़िल्मों में जया के हीरो रह चुके एनटीआर के कहने पर वे 1994 में तेलुगू देशम पार्टी में शामिल हो गईं। हालांकि जल्द ही वे पाला बदल चंद्रबाबू नायडू से जा मिलीं। राजनीति का अनुभव न होने के कारण शुरू-शुरू में उनकी ख़ूब आलोचना भी होती थी। लेकिन धीरे-धीरे वो पार्टी की बड़ी प्रचारक बन गईं। 1996 में जया प्रदा राज्य सभा पहुंची। उनके करियर में बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया।
"मुझे मालूम है कि रामपुर वाले बेटी को खाली हाथ नहीं भेजते... भीड़ में बोलने से डरने वाली जया प्रदा के तेवर रामपुर में बदल चुके थे। दक्षिण से आई जया प्रदा ने 2004 और 2009 में उत्तर प्रदेश के रामपुर से लगातार दो बार लोकसभा चुनाव जीत सबको हैरत में डाल दिया। समाजवादी पार्टी में आज़म खान से उनकी हमेशा खटकती रही जिसके बाद वो सपा से अलग हो गईं। 2019 में जया ने भाजपा का दामन थामा है और रामपुर से ही चुनाव लड़ा।