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भाजपा में शामिल हुए हंसराज हंस हवा का रुख देखकर बदलते रहे पार्टी
Wed, 24 Apr 2019 01:20 PM IST
anand anand
बीबीसी हिंदी
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Published by: anand anand
Updated Wed, 24 Apr 2019 01:20 PM IST
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हंस राज हंस
- फोटो : सोशल मीडिया
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भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली की उत्तर-पश्चिमी सीट से दलित नेता उदित राज का टिकट काट दिया है और सूफ़ी गायक हंसराज हंस को मौका दिया है। उत्तर पश्चिम दिल्ली में हंसराज हंस के सामने कांग्रेस के राजेश लिलोठिया और आम आदमी पार्टी के गुगन सिंह से होगा। पंजाबी गायक को बीजेपी से टिकट दिया जाना वो भी दिल्ली में, इसने कई लोगों को हैरान किया है। लेकिन हंसराज हंस जालंधर के हैं और खुद वाल्मिकी समाज से आते हैं।
हंस राज हंस
- फोटो : सोशल मीडिया
इसके अलावा वो दलितों के नेता के रूप में खुद को पेश करते हैं। लेकिन मुख्य रूप से उनकी पहचान एक सूफ़ी गायक के रूप में रही है। ये अलग बात है कि राजनीति में भी वो हाथ पांव मारते रहे हैं। एक ज़माने में वो शिरोमणि अकाली दल में थे, फिर वो कांग्रेस में रहे और 2016 के अंत में भाजपा में शामिल हो गए। सियासत की शुरुआत उन्होंने 2002 में अकाली दल के लिए पंजाब के विधानसभा चुनावों में प्रचार से किया। इससे एक साल पहले ही अकाली-भाजपा राज्य सरकार ने उन्हें 'राज गायक' की उपाधि से नवाज़ा था।
हंस राज हंस
- फोटो : सोशल मीडिया
कांग्रेस से भाजपा तक का सफर
हालांकि बाद में वो कांग्रेस के नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ क़रीबी के चलते कांग्रेस में भी रहे। चुनाव लड़ने के प्रति उनका झुकाव पहले से रहा है। जालंधर से वो अकाली दल के टिकट पर 2009 में लोकसभा चुनाव लड़े। क़िस्मत ने साथ नहीं दिया और वो हार गए। लेकिन जब 2014 में उन्हें पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो उन्होंने जालंधर से पार्टी के लिए प्रचार करने से भी मना कर दिया। हालाँकि बठिंडा में वे अकाली दल की हरसिमरत कौर बादल की तारीफ़ों के सुर बाँधते रहे।
हालांकि बाद में वो कांग्रेस के नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ क़रीबी के चलते कांग्रेस में भी रहे। चुनाव लड़ने के प्रति उनका झुकाव पहले से रहा है। जालंधर से वो अकाली दल के टिकट पर 2009 में लोकसभा चुनाव लड़े। क़िस्मत ने साथ नहीं दिया और वो हार गए। लेकिन जब 2014 में उन्हें पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो उन्होंने जालंधर से पार्टी के लिए प्रचार करने से भी मना कर दिया। हालाँकि बठिंडा में वे अकाली दल की हरसिमरत कौर बादल की तारीफ़ों के सुर बाँधते रहे।
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हंस राज हंस
- फोटो : सोशल मीडिया
टिकट न मिलने पर उन्होंने राजनीति को 'गंदा खेल' बताते हुए अकाली दल छोड़ दिया। तब उनके भाजपा से और फिर आम आदमी पार्टी से जुड़ने की अटकलें भी लगाई गईं, लेकिन कांग्रेस से क़रीबी के चलते 2016 की शुरुआत में वो कांग्रेस में शामिल हो गए। लेकिन उनका ये राजनीतिक प्रयोग भी बहुत दिन तक नहीं टिका और कथित तौर पर राज्यसभा या विधानसभा चुनाव के वक्त कोई प्राथमिकता न मिलने के कारण उनकी नाराज़गी सामने आई। अब ना सिर्फ उन्होंने भाजपा का दामन पकड़ा है बल्कि उनका चुनाव लड़ने का शौक भी पूरा हो गया है, चाहे पंजाब छोड़ कर दिल्ली से ही सही।
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हंस राज हंस
- फोटो : सोशल मीडिया
विवादों का साथ
वैसे उन्हें गायकी में अपनी अलग पहचान के लिए जाना जाता है। हालांकि गायकी में भी वो विवादों से अलग नहीं रहे। साल 1992 में उनके गाए एक गीत को कट्टरपंथियों की प्रशंसा के तौर पर देखा गया था। हंस का तर्क था कि वो तो मुग़लों की ओर से सिखों पर किये गए अत्याचार की बात कर रहे हैं। लेकिन उनका मूल रूप से रुझान रुहानी संगीत की ओर रहा और वो डेरा राधा स्वामी में संगीत भी सिखाते रहे हैं।
इसके अलावा वो नकोदर में लाल बादशाह के डेरे के साथ भी जुड़े थे। हिंदुत्ववादी संगठनों ने हंस की ओर से पाकिस्तान की आवाम के साथ दोस्ती के संदेश की एक समय निंदा की थी। लेकिन अब जबकि वो बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ने वाले हैं देखना है कि उनका ये राजनीतिक प्रयोग कहां तक जाता है।
वैसे उन्हें गायकी में अपनी अलग पहचान के लिए जाना जाता है। हालांकि गायकी में भी वो विवादों से अलग नहीं रहे। साल 1992 में उनके गाए एक गीत को कट्टरपंथियों की प्रशंसा के तौर पर देखा गया था। हंस का तर्क था कि वो तो मुग़लों की ओर से सिखों पर किये गए अत्याचार की बात कर रहे हैं। लेकिन उनका मूल रूप से रुझान रुहानी संगीत की ओर रहा और वो डेरा राधा स्वामी में संगीत भी सिखाते रहे हैं।
इसके अलावा वो नकोदर में लाल बादशाह के डेरे के साथ भी जुड़े थे। हिंदुत्ववादी संगठनों ने हंस की ओर से पाकिस्तान की आवाम के साथ दोस्ती के संदेश की एक समय निंदा की थी। लेकिन अब जबकि वो बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ने वाले हैं देखना है कि उनका ये राजनीतिक प्रयोग कहां तक जाता है।