आज सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा 68 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है, जिसमें सिनेमा जगत से जुड़ी कई जानी-मानी हस्तियों को अलग-अलग श्रेणियों के अनुसार विजेता घोषित किया गया है। इसी क्रम में बॉलीवुड के मशहूर लेखक, गीतकार मनोज मुंतशिर ने सर्वश्रेष्ठ गीतकार का अवॉर्ड अपने नाम कर लिया है। उत्तर प्रदेश के अमेठी गौरीगंज में जन्मे मनोज मुंतशिर आज बॉलीवुड का जाना-माना नाम हैं। उन्होंने कठिन संघर्ष के बाद अपनी काबिलियत के दम पर ये मुकाम हासिल किया है। चलिए गीतकार मनोज मुंतशिर के बारे में जानते हैं कुछ खास बातें।
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मनोज शुक्ला से ऐसे बने मनोज मुंतशिर
जब कोई मनोज मुंतशिर का नाम सुनता है तो उसे एक बारगी थोड़ी हैरानी होती है, क्योंकि मनोज के साथ मुंतशिर लगाना कुछ अलग लगता है। इस बारे में एक बार एक साक्षात्कार के दौरान मनोज मुंतशिर बताया था कि साल 1997 की सर्द रात में वह अपने घर से चाय की तलाश में एक टपरी पर पहुंचे। उस टपरी पर रेडियो बज रहे रेडियो पहली बार एक शब्द सुना “मुंतशिर”। उन्हें इस शब्द का मनोज के साथ जुड़ाव मुझे बेहद पसंद आया, और चाय की आखिरी चुसकी तक उन्होंने ठान लिया कि वह अपना नाम मनोज शुक्ला से मनोज मुंतशिर रखेंगे।
पिता को लगा कर लिया है धर्म परिवर्तन
अब जबकि मनोज यह ठान चुके थे कि वह अपने नाम के आगे शुक्ला की बजाय मुंतशिर लगाएंगे, तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि वह अपने पिता को इस बात के लिए कैसे राजी करें। पूरी रात सोचने के बाद मनोज ने एक तरकीब निकाली और घर की नेम प्लेट पर मनोज मुंतशिर लिखवा दिया। बस फिर क्या था..उनके घर में अफरा-तफरी का माहौल हो गया, नेम प्लेट देखकर उनके पिता गुस्सा हो गए, क्योंकि उन्हें लगा कि उनके बेटे ने धर्म परिवर्तन कर लिया है।
बचपन से था लिखने का शौक
मनोज मुंतशिर को बचपन से ही लिखने का शौक था। यही वजह थी कि वह कई कवियों और शायरों की किताबें भी पढ़ने में रुचि रखते थे। ताकि अपने लेखन को और बेहतर बना सकें। जब वह सातवीं या आठवीं कक्षा में थे तब उन्होंने दीवान-ए-ग़ालिब किताब पढ़ी, लेकिन उर्दू नहीं आने की वजह से उन्हें कुछ समझ नहीं आया और एक दिन मस्जिद के नीचे से मनोज मुंतशिर ने 2 रुपए की उर्दू की किताब खरीदी और जहां से उन्होंने उर्दू सीखना शुरू की।
सड़कों पर सोकर किया गुजारा
मायानगरी मुंबई में हर कोई अपने कई सपनों को लेकर आता है, लेकिन इस चकाचौंध भरी दुनिया में खुद चमकना बहुत मुश्किल होता है। ऐसा ही मनोज मुंतशिर का सफर भी रहा। जब मनोज स्नातक की पढ़ाई पूरी होने के बाद साल 1999 में मुंबई आए थे तो उनके पास सिर्फ 700 रुपये थे और यहां आने के बाद हर दिन काम की तलाश में जल्दी ही पैसे खर्च हो गए। मुंबई में सड़कों पर रात बिताकर गुजारा करने वाले मनोज मुंतशिर को साल 2005 में कौन बनेगा करोड़पति के लिए लिरिक्स लिखने का मौका मिला। हालांकि इससे पहले भी वह अनूप जलोट के लिए भजन लिख चुके थे, जिससे पहली बार उन्होंने 3000 रुपये कमाई की थी।
