मुंबई शहर में काम करने वाले लाखों लोग अगले दिन किसी सपने के सच होने की उम्मीद में यहां पूरा जीवन गुजार देते हैं। दिल्ली में अपनी पुश्तैनी ट्रैक्टर वर्कशॉप में काम न करके अभिनेता राहुल बग्गा ने भी आठ साल थिएटर करने के बाद मुंबई को अपनी कर्मभूमि बनाया। लेकिन, अब उन्हें लगता है कि इस शहर में उनका मन और नहीं लगने वाला। इसी के चलते राहुल बग्गा ने अब ये शहर छोड़ दिया है! क्यों, बता रहे हैं ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल को इस एक्सक्लूसिव बातचीत में।
EXCLUSIVE: ‘अमर उजाला’ से बोले राहुल बग्गा, ‘मैं मुंबई छोड़ आया हूं’, हुनर को सम्मान न मिलने से दुखी
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‘खो गई इंसानियत’
फोन की घंटी बजते ही राहुल फोन उठाते हैं तो मैं उनसे कोरोना काल की कुशल क्षेम पूछने के बाद यही पूछता हूं कि कहां हैं वह दिल्ली या मुंबई? राहुल बताते हैं, ‘मैं मुंबई छोड़ आया हूं। इस कोरोना काल ने मुझे सिखाया है कि इंसान की कीमत कुछ नहीं है। हमने अपने समाज को इतने खांचों में बांट दिया है कि इंसानियत कहीं खो सी गई है। लोग बस अपने जैसे लोग ढूंढते रहते हैं। दूसरे को उसके जैसा ही रहने देते हुए अपना बना लेने का हुनर हम कहीं खो चुके हैं। मेरा मन वैसे तो मुंबई से काफी अरसे से ऊब रहा था लेकिन अब मैंने सपनों का शहर कहे जाने वाले मुंबई को हमेशा के लिए ‘अलविदा’ कह दिया है।’
‘यशराज फिल्म्स से की शुरूआत’
दिल्ली में पढ़े बढ़े राहुल को अभिनय में रुचि नाटकों से जागी। दिल्ली में खूब नाटक करके मुंबई आए तो आते ही अमित शर्मा के साथ काम विज्ञापन फिल्मों में काम मिल गया। राहुल बग्गा ने अभिनय की शुरूआत यशराज फिल्म्स से की, टीवी सीरीज ‘पाउडर’ के साथ। ‘हां, उस सीरीज में महेंद्र रानाडे का किरदार मुझे संयोग से ही मिला। मैं तो वहां पंकज त्रिपाठी के भाई वाले किरदार की रीडिंग के लिए जाया करता था। लेकिन, आदित्य चोपड़ा ने मुझे देखा। उन्हें मुझमें कुछ तो पसंद आया होगा। उन्होंने निर्देशक अतुल सभरवाल से बात की और मुझे महेंद्र रानाडे का लीड किरदार मिल गया।’ राहुल की आवाज में खनक तो आती है, लेकिन अगले ही पल वह खो भी जाती है, ‘लेकिन, ‘पाउडर’ का प्रसारण समय ऐसा था कि उसका फायदा मुझे मिला नहीं। ये 11 साल पहले की बात है और तब लोगों को क्राइम सीरीज में इतनी दिलचस्पी भी नहीं थी।’
‘निर्माताओं के अहं की भेंट चढ़ी फिल्म’
लेकिन, ‘मस्तराम’ को तो आपके करियर का टर्निंग प्वाइंट बनना था? ‘सबको लगता है कि ऐसा ही होना चाहिए था। ‘मस्तराम’ के साथ रजनीकांत की जो फिल्म रिलीज हो रही थी, वह टली तो सारे सिंगल स्क्रीन थिएटर भी इसी फिल्म को मिल गए थे। लेकिन निर्माताओं के आपसी अहं के टकराव के चलते फिल्म का सही से प्रचार नहीं हुआ। लोगों को लगा कि ये कोई सस्ती सी फिल्म है। जबकि फिल्म का संदेश कुछ और ही था। हमने ये फिल्म सिर्फ 35 लाख में बनाई थी। बाद में इसी कहानी पर मुझे सात करोड़ में बनी सीरीज ‘मस्तराम’ भी ऑफर हुई लेकिन जिनसे दिल न लगे, उनके साथ मैं काम नहीं करना चाहता।’ राहुल कहते हैं।
‘अब और धक्के नहीं खाऊंगा’
अच्छा, अब तो ‘मुकेश जासूस’ की खूब तारीफ हो रही है तो अब क्या प्लान है? राहुल का जवाब हैरान करता है, ‘मैंने 21 साल अभिनय को दिए हैं। थिएटर किया। यशराज फिल्म्स के साथ काम किया। ‘सुल्तान’ में सलमान खान को हरियाणवी बोलने की ट्रेनिंग दी। तमाम अलग अलग तरह के रोल किए। खुद को तो समय ही नहीं दिया। घर तक बसाने का ख्याल नहीं आया इस दौरान। लेकिन, अब मैं मुंबई से ऊब चुका हूं। जब मैंने अपना हुनर दिखा दिया तो अब मुझे और नहीं भटकना। मैं लोगों की चापलूसी नहीं कर सकता। मैं नैनीताल में हूं। यहां खेती कर रहा हूं। और, अब इसी में खुश हूं। मुझे कोई बुलाएगा तो मैं चला जाऊंगा काम करने, लेकिन अब मैं काम के लिए धक्के नहीं खाऊंगा।’

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