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किस्सा: जब नौशाद अली ने मोहम्मद रफी से सही उच्चारण करवाने के लिए बनारस से बुला लिए थे पंडित

एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: अमरीन हुसैन Updated Wed, 05 May 2021 07:17 AM IST
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Naushad Ali death anniversary unknown facts when he called pandits from Banaras to teach sanskrit to Mohammed Rafi for song
नौशाद अली - फोटो : Social media

बॉलीवुड के मशहूर संगीतकार नौशाद अली की आज पुण्यतिथि है। नौशाद फिल्मों की संख्या से ज्यादा संगीत को तरजीह देते थे। शायद इसीलिए उनका संगीत आज भी लोगों की जुबां पर है। उनका जन्म 25 दिसम्बर 1919 को लखनऊ में मुंशी वाहिद अली के घर में हुआ था। लखनऊ में ही उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई। शहर की संस्कृति और शास्त्रीय संगीत से जुड़े होने की वजह से उन्हें भी इसके प्रति लगाव हो गया। इसके बाद नौशाद ने भारतीय संगीत की तालीम उस्ताद गुरबत अली, उस्ताद यूसुफ अली और उस्ताद बब्बन से ली।

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नौशाद अली - फोटो : social media

वह 17 साल की उम्र में ही अपनी किस्मत आजमाने के लिए मुंबई कूच कर गए थे। उन्होंने हिंदुस्तानी संगीत को एक अलग मुकाम तक पहुंचाने का काम किया। हिंदी फिल्म जगत को अपनी संगीत कला से खुशनुमा कर दिया। संगीत के अलावा उन्होंने शेर-ओ-शायरी में भी खूब कलम चलाई। नौशाद को पहली बार 1940 में बनी 'प्रेम नगर' में स्वतंत्र रूप से संगीत देने का मौका मिला। इसके बाद 'रतन' फिल्म के गाने से उन्हें पहचान मिली। उन्होंने बॉलीवुड में 64 साल बाद तक अपने संगीत का जादू बिखेरा। लेकिन ध्यान देने वाली बात है कि इतने लंबे करियर में नौशाद ने केवल 67 फिल्मों में ही संगीत दिया।

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नौशाद अली, रफी - फोटो : social media

आज की पीढ़ी परफेक्शन के नाम पर सिर्फ आमिर खान को जानती हैं, लेकिन नौशाद भी बहुत बड़े परफेक्शनिस्ट थे। इससे जुड़ा एक किस्सा भी है। एक बार जब 'मन तड़पत हरी दर्शन को' गाने में मोहम्मद रफी कुछ संस्कृत शब्दों का उच्चारण ठीक से नहीं कर पा रहे थे, तो नौशाद ने बनारस से संस्कृत पंडितों को बुलावा भेज दिया था। उन्होंने सही उच्चारण करने में रफी की मदद की, तब कहीं जाकर नौशाद ने फाइनल रिकॉर्डिंग की मंजूरी दी थी। इसी का नतीजा था कि ये गाना आज भी दुनिया भर के मंदिरों में गाया और सुना जाता है।

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नौशाद अली - फोटो : Social media

नौशाद अली की शादी से जुड़ा भी एक किस्सा है। जो नौशाद साहब को हम इतने बड़े म्यूजिक कंपोजर के रूप में मानते हैं उनको शादी के लिए अपना परिचय एक टेलर के रूप में देना पड़ा था। दरअसल, उनके परिवार वाले हिंदी फिल्मों और संगीत के खिलाफ थे। उस दौर में ये बुरा और खराब काम माना जाता था। जिस समय नौशाद की शादी तय की गई, तब उनके ससुराल वालों से भी ये बात यही सोचकर छिपाई गई थी।

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नौशाद अली, लता मंगेशकर - फोटो : social media

इससे भी दिलचस्प बात तो ये है कि नौशाद अली की शादी में उनका ही कंपोज किया हुआ गाना बज रहा था, लेकिन किसी को मालूम नहीं था। इसका फायदा नौशाद अली ने उठाया भी। उन्होंने शादी में आये मेहमानों से पूछा कि गाने की धुन कैसी लगी तो सबने गाने की तारीफ की थी। फिल्म 'मुगल-ए-आजम' से भी नौशाद का एक किस्सा जुड़ा हुआ है। इसके  'ए मोहब्बत जिंदाबाद' को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने 100 संगीतकारों का इस्तेमाल किया था। वहीं, मशहूर गाना 'प्यार किया तो डरना क्या' को बेहतर बनाने के लिए नौशाद ने लता मंगेशकर से कहा था कि वो बाथरूम में खड़ी होकर गाना गाएं।

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