दुनिया बदल रही है, इसकी सोच भी उन लोगों को लेकर बदल रही है जो पुरुष और महिला की खड़ी रेखा के विभाजन से परे हैं। दुनिया इन्हें अब एलजीबीटीक्यू प्लस कम्युनिटी के नाम से जानती है। सामाजिक स्वीकार्यता इन समुदाय की इन दिनों दुनिया भर में तेजी से बढ़ी है। इंद्रधनुषी रंगों से इनकी विशिष्टता इन्हें समाज में सम्मान भी दिला रही है और एक बराबरी का ओहदा भी। और, इसी का जश्न मनाने के लिए हर साल जून का महीना प्राइड मंथ के रूप में मनाया जाता है। मुंबई फिल्म जगत में इस समुदाय का एक चर्चित चेहरा हैं नव्या सिंह। इस बार नव्या से बात हुई प्राइड मंथ, इसके उद्देश्य और इसकी प्रासंगिकता को लेकर...
Navya Singh Interview: बातें नहीं ट्रांस को बनाएं लीड हीरोइन, तब आएगा असली बदलाव, प्राइड मंथ सिर्फ एक छलावा है
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प्राइड मंथ बदलते समय के हिसाब से कितना जरूरी है और क्या वाक़ई इसका लाभ कम्युनिटी को हो रहा है?
मेरा मानना है कि प्राइड मंथ जैसा एहसास बस साल में महीने भर का नहीं होना चाहिए। समुदाय के हर शख्स को अपना हर दिन प्राइड डे की तरह ही मनाना चाहिए। सामाजिक तरीके से इस बात का जश्न मनाना हो कि हम किसी खास समुदाय से है तो ठीक है जून का महीना इसके लिए। इस महीने हम सब कहते हैं कि हम आजाद हैं, लेकिन क्या हम वाकई आजाद हैं। मुझे तो नहीं लगता। कहीं न कहीं हम अब भी गुलाम हैं। इस प्राइड मंथ से जुड़ने वाले ब्रांड्स को ही देख लीजिए, सब आते हैं इस महीने अपना नाम चमकाने और उसके बाद? अगर इन ब्रांड्स को वाकई हमारी परवाह है तो फिर इन्हें साल भर हमारे साथ जुड़ना चाहिए। साथ में जो काम करें उसकी वाजिब कीमत भी अदा करनी चाहिए।
साल के बाकी महीनों में कम्युनिटी के लिए कितनी आवाजें उठती हैं?
कुछ नहीं होता, साल के बाकी महीनों में। ये सिर्फ प्राइड मंथ के दौरान दिखने वाली हरियाली हैं। ये लोग अपना नाम चमकाने के लिए ब्रांड कोलैबरेशन करते हैं और उसके बाद गायब हो जाते हैं। इसके बाद पूरे साल कहीं किसी को फर्क नहीं पड़ता। इसी दोगली मानसिकता के मैं खिलाफ हूं। मुझे शर्म आती है लेकिन ये सच है कि दुनिया के तमाम बड़े ब्रांड्स इस महीने सिर्फ अपने प्रचार या अपनी टीआरपी के लिए हमारे साथ जुड़ते हैं और हमारा इस्तेमाल करते हैं।
एक ट्रांसजेंडर अब भी कौतुक का केंद्र क्यों होती है?
कहा तो यही जाता है कि ट्रांसजेंडर समुदाय शिव और शक्ति का स्वरूप होते हैं और जहां अर्धांग का जिक्र होगा तो कौतुक का विषय तो बनेगा ही। बात जब शारीरिक बनावट की आती है तो जब एक व्यक्ति काया परिवर्तन के दौर से गुजर रहा होता तो तो उसकी शारीरिक बनावट में आए बदलाव से लोगों को उत्सुकता होती है। लेकिन एक बार ये पूरा हो जाने के बाद एक सामान्य स्त्री और मेरी जैसी स्त्री में कहीं कोई फर्क नहीं होता, न सोच में न शरीर में।
ऐसे कौन से हीरो हैं जो कम्युनिटी की बात तो करते हैं पर उनके साथ फिल्मों में हीरो नहीं बनते?
ये बहुत सही सवाल किया आपने। हिंदी सिनेमा दिखावे का सिनेमा अधिक है। यहां बातें करने वाले भी बहुत हैं। समुदाय की बातें करेंगे। समुदाय की कहानियों पर फिल्में बनाकर पैसे कमाएंगे, अवार्ड बटोरेंगे लेकिन समुदाय के लिए आगे बढ़कर करेंगे कुछ नहीं। ट्रांसजेंडर के किरदार मे सामान्य कलाकार काम करते हैं, इस पर तो चर्चा खूब हो चुकी है। मैं तो इस इंतजार में हूं कि कब कोई हीरो आगे बढ़कर मेरे जैसी किसी युवती को अपनी हीरोइन बनाने का एलान करेगा। असली बदलाव इसके बाद ही सोचा जा सकता है। ये सोच का मामला है, लेकिन यहां सब कुछ खोखली बयानबाजी से आगे कुछ नहीं है।