कभी कभी तो लगता है अपुन ही भगवान है, कहने वाला गणेश गायतोंडे आपके मोबाइल पर आज फिर से लौट रहा है। सेक्रेड गेम्स के दूसरे सीजन में इस बार गणेश के इतिहास के पन्ने खुलने वाले हैं और इसमें एंट्री हो रही है कुछ नए किरदारों की।
नवाजुद्दीन ने खोला सेक्रेड गेम्स की कामयाबी का राज, अनुराग कश्यप से ट्यूनिंग पर कही ये बड़ी बात
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सेक्रेड गेम्स के दूसरे सीजन में गणेश गायतोंडे का एक रॉ एजेंट से रिश्ता खुल रहा है। अंडरवर्ल्ड में चर्चित रहे छोटा राजन के करीब होता दिख रहा है गणेश गायतोंडे?
सच पूछें तो मैंने सेक्रड गेम्स उपन्यास पढ़ा नहीं है। तो मुझे ये भी अंदाजा नहीं है कि इसके लेखक विक्रम चंद्रा ने किस किरदार के लिए क्या भूमिका गढ़ी है। मैं छोटा राजन से कभी मिला नहीं तो उसके जैसा दिखने का कोई वह संदर्भ भी नहीं हैं। हां. आप किसी किरदार के बारे में पढ़ जरूर सकते हैं। मैं तो वैसे भी निर्देशक का अदाकार हूं, जैसा मेरे निर्देशक अनुराग कश्यप कहते जाते हैं, मैं वैसा ही करता जाता हूं।
लेकिन, शुरू के तीन एपीसोड में ये तो समझ आता है कि गणेश गायतोंडे का जीवन इस बार आसान नहीं है और शायद यही संघर्ष है जिसने गणेश के किरदार को दर्शकों के जेहन से चिपका दिया है?
सच पूछिए तो अभी तक मुझे ये पता नहीं चल सका है कि किसी किरदार की कौन सी बात दर्शकों के जेहन में यूं चिपक जाती है। इतने सारे किरदार किए मैंने बीते कुछ साल में लेकिन नहीं चिपकते हैं वे। अब गणेश गायतोंडे क्यूं चिपक गया, ये पता चल जाए तो मैं फिर हर किरदार के साथ वही करना चाहूंगा।
ये भी तो हो सकता है कि दर्शक जिसे ओटीटी पर पसंद कर लेते हैं उसे बड़े परदे पर नकार देते हैं?
नेटफ्लिक्स ने भारत में सिनेमा और वेबसीरीज का फर्क मिटाया है। सेक्रेड गेम्स इसमें बड़ा कारक रहा लेकिन इसका कोई श्रेय मैं नहीं लेना चाहता। यह श्रेय इसके निर्देशकों, इसके लेखकों और इसके निर्माताओं को मिलना चाहिए। हम तो बस मोहरे हैं। उनके हाथ लग गए। और, जो चाल चली गई वह सही पड़ी।
अनुराग कश्यप और नवाजुद्दीन सिद्दीकी में बतौर निर्देशक-अभिनेता जैसी ट्यूनिंग है, वैसी किसी और जोड़ी में आपको दिखती है क्या, जैसे मनमोहन देसाई-अमिताभ बच्चन या प्रकाश मेहरा-अमिताभ बच्चन?
मेरी और अनुराग की ट्यूनिंग बिमल रॉय और दिलीप कुमार जैसी ट्यूनिंग है। जिस जमाने में पारसी थिएटर का बोलबाला था, हर कलाकार चिल्लाकर अपने संवाद बोलता था। उस दौर में दिलीप कुमार ने बहुत धीमे बोलने का प्रयोग करना चाहा और बिमल रॉय ने करने दिया। जिन निर्देशकों के आपने नाम लिए उन्होंने कभी किरदारों के जेहन में जाने की कोशिश नहीं की। बिमल रॉय को पता होता था कि मेरा किरदार सोएगा तो क्या सोच रहा होगा और सुबह जागेगा तो क्या बोलेगा। तभी तो दिलीप कुमार बोल पाए, ‘महल में कुछ सुनाई दिया मुझे।’