फिल्म जगत में अब तक कई अलग-अलग शैलियों की फिल्में बनी है। एक्शन हो या रोमांस हर शैली को निर्देशकों ने बड़ी ही खूबसूरती के साथ बड़े परदे पर उतारा है। कई ऐसी फिल्में भी हैं जो डाकूओं पर आधारित हैं। हाथ में बन्दूक थामे, गोलियों से भरा बेल्ट अपनी कमर पर लगाए और माथे पर लंबा सा तिलक किए हुए ये है डाकुओं की पहचान। इस शैली पर अब तक कई फिल्में बन चुकी हैं। इन फिल्मों की बात ही बिलकुल अलग थी। बैंडिट क्वीन हो या फिर सोनचिरैया सभी फिल्मों ने दर्शकों का दिल खूब जीता।
पान सिंह तोमर से लेकर शोले तक, अब तक डाकुओं पर बन चुकी हैं ये फिल्में
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शोले
हेमा मालिनी, धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन स्टारर शोले एक ऐसी फिल्म थी, जिसके डायलॉग्स हर किसी की जुबान पर है। इस फिल्म का कितने आदमी थे या फिर 'पचास कोस दूर जब बच्चा रोता है तो मां कहती है सो जा नहीं तो गब्बर आ जाएगा' जैसे डायलॉग्स ने लोगों का खूब दिल जीता। फिल्म में अमजद खान ने गब्बर सिंह की भूमिका निभाई थी। गब्बर सिंह हिंदी सिनेमा का एक ऐसा किरदार जो ये बताता है कि डकैत पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म कितनी बुलंदियों को छू सकती है। इस फिल्म का निर्देशन रमेश सिप्पी ने किया था। बहुत ही कम लोग शायद ऐसे हों जिन्होंने यह फिल्म न देखी हो। बता दें कि गब्बर सिंह एक असली डकैत का नाम था जो चंबल घाटी के सबसे खरतनाक डकैतों में से एक था। इस डाकू के नाम पर राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने 50 हज़ार रुपये के इनाम की भी घोषणा की थी।
मदर इंडिया
जब भी कही और कभी भी फिल्म मदर इंडिया का जिक्र होता है तो आंखो के सामने सबसे पहले नरगिस दत्त का चेहरा आ जाता है। 'मदर इंडिया' में नरगिस दत्त के उस किरदार को भला कौन भूल सकता है जिसने अपने ही बेटे पर गोली चला दी थी। इस फिल्म में नरगिस दत्त के बेटे की भूमिका के रूप में सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार नजर आए थे। वैसे तो ये फिल्म एक मां के जीवन की कहानी को बयां करती है, लेकिन इस फिल्म में भी हालातों का शिकार होकर सुनील दत्त डाकू बनने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
गंगा जमुना
नितिन बोस के निर्देशन में बनी फिल्म गंगा जमुना को भला कौन भूल सकता है। 1961 में आई इस फिल्म में दिलीप कुमार और वैजयंती माला ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इस फिल्म को दर्शकों द्वारा काफी पसंद किया गया था। फिल्म में अपने हालात के सामने सीधे-साधे दिलीप कुमार का स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाता है और वो डाकुओं के गुट में शामिल हो जाते हैं। एक बार उस दलदल में फंसने के बाद उनका वहां से बाहर आना नामुमकिन हो जाता है और आखिरकार भागते हुए एक दिन उनका अंत हो जाता है।
मुझे जीने दो
'मुझे जीने दो' में सुनील दत्त, वहीदा रहमान, निरूपा रॉय और मुमताज जैसे दिग्गज कलाकारों ने काम किया था। मणि भट्टाचार्य के निर्देशन में बनी ये फिल्म उस दौर में बनी थी जब चंबल घाटी में डकैत की समस्या सबसे अधिक थी। 1963 में आई फिल्म 'मुझे जीने दो' आज भी सिल्वर स्क्रीन पर डकैतों के सबसे सटीक वर्णन में से एक माना जाता है।