25 साल की लगातार मेहनत ने पंकज त्रिपाठी को सिनेमा में वह मुकाम दिलाया है, जिसे देखकर गांवों के युवा अब प्रेरणा पाते हैं। पंकज त्रिपाठी से अमर उजाला के लिए ये एक्सक्लूसिव मुलाकात की पंकज शुक्ल ने। प्रस्तुत हैं कुछ महत्वपूर्ण अंश। इंटरव्यू के आखिर में इस इंटरव्यू का वीडियो जरूर देखिएगा।
EXCLUSIVE: एबीवीपी के नेता भी रह चुके हैं पंकज त्रिपाठी, बोले- 'राजनीति जमी नहीं इसलिए अभिनय में आ गया'
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आपने 11वीं तक किसानी की, फिर पटना में होटल में नौकरी की, फिर दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पढ़ाई की और अब ‘मिर्जापुर 2’ जैसी सीरीज में आपको एक साथ 200 देशों में देखा जाएगा। कैसी है ये अनुभूति?
उस अनुभूति को मेरे लिए शब्दों में बताना तो कठिन है लेकिन मैं इसे इस तरीके से देखता हूं कि मेरी ये यात्रा ग्रामीण भारत में बैठे हर बच्चे की यात्रा है। वह यह सपना देख सकता है कि बिना किसी गॉडफादर के सिर्फ अपनी मेहनत के बूते एक लड़का गांव से आकर भी कामयाबी पा सकता है। मेरी यात्रा हर उस बच्चे के लिए उदाहरण है, जो इस बातचीत को पढ़ रहा है।
और, उस बच्चे को ये जानना कितना जरूरी है कि पंकज त्रिपाठी आज जो हैं उसके पीछे कितने साल की मेहनत है?
बिल्कुल, 16 साल मुंबई के और उससे पहले नौ साल रंगमंच के। 25 साल की ये मेरी यात्रा है। लेकिन आज की पीढ़ी में सबको सब कुछ तुरंत चाहिए। ये चाहते हैं कि अभिनय का कोई तीन महीने का कैप्सूल आ जाए तो वो कोर्स कर लें। अभिनय कभी कैप्सूल कोर्स नहीं हो सकता।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के प्रशिक्षण से आपको मुंबई फिल्म जगत में कितनी मदद मिली?
एनएसडी के प्रशिक्षण से बतौर अभिनेता मेरा विकास तो हुआ लेकिन मुंबई में काम दिलाने में इसने मेरी कोई मदद नहीं की। यहां कोई एनएसडी से पढ़कर आए, फिल्म इंस्टीट्यूट से पढ़कर आए या फिर कोई तीन महीने का कोर्स करके आ जाए, हमारे समय में तो सबको एक ही तराजू में तौल दिया जाता था। मेरे तमाम वरिष्ठ साथी इसीलिए मुंबई छोड़कर चले भी गए। उनको बुरा लगता था कि यहां आराम नगर (मुंबई में संघर्षशील कलाकारों का अड्डा) में उनको लाइन में लगकर ऑडीशन देना पड़ रहा है और कोई 20 साल का लड़का निकल कर बोल देता है कि आप फिट नहीं हैं।
आपके मन में कभी सरकारी नौकरी करने का ख्वाब आया था?
मेरे घर में बहुत जुनून था सरकारी नौकरी का। मेरे बाबूजी चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं। तब कहीं एलडीसी यानी लोअर डिवीजन क्लर्क बन जाए या यूडीसी बन जाए तो वही बड़ी बात होती थी। यह बाबूजी की चाहत थी। मुझमें में ये चाहत नहीं थी। मैं थोड़ा अनुशासन तोड़ने वाला आदमी था।