पूजा कुमार अमेरिका फिल्मों का चर्चित भारतीय चेहरा हैं। वह साउथ में फिल्में करती रही हैं और जल्द ही कमल हासन के साथ हिंदी में नजर आएंगी। पूजा की मां लखनऊ से हैं और पिता देहरादून से। वह हर साल भारत आती हैं। इन दिनों वह फिल्म 'विश्वरूपम-2' के सिलसिले में यहां हैं। इस फिल्म और अमेरिका में भारतीय फिल्मों की पहचान को लेकर पूजा कुमार से रवि बुले की विशेष बातचीत...
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हॉलीवुड के सामने बॉलीवुड कहां खा जाता है मात, पूजा कुमार ने किया बड़ा खुलासा
रवि बुले
Updated Fri, 20 Jul 2018 09:06 PM IST
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पूजा कुमार
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pooja kumar and kamal haasan
-आप अमेरिका में रहती हैं। वहीं की फिल्में करती हैं। कमल हासन की विश्वरूपम में कैसे आईं?
- उन्होंने मेरी कोई अमेरिकी फिल्म देखी और मैनेजर से कॉन्टेक्ट किया। अमेरिकी मैनेजर ने मुझसे पूछा कि क्या आप उन्हें जानती हैं, वह एक फिल्म में आपको लेना चाहते हैं। मैंने कहा बिल्कुल जानती हूं और उनके साथ काम करूंगी। फिर कमल सर से बात हुई तो उन्होंने बताया कि हम न्यूयॉर्क, लंदन और इंडिया में शूटिंग कर रहे हैं। मैंने कहा कि मुझे तमिल नहीं आती तो बोले कोई बात नहीं, हम फिल्म को दो भाषाओं तमिल और हिंदी में बना रहे हैं। आप सब समझ जाएंगी। इसके बाद एक मुलाकात में उन्होंने पांच मिनट मुझे रू-ब-रू देखा और सब फाइनल हो गया।
- उन्होंने मेरी कोई अमेरिकी फिल्म देखी और मैनेजर से कॉन्टेक्ट किया। अमेरिकी मैनेजर ने मुझसे पूछा कि क्या आप उन्हें जानती हैं, वह एक फिल्म में आपको लेना चाहते हैं। मैंने कहा बिल्कुल जानती हूं और उनके साथ काम करूंगी। फिर कमल सर से बात हुई तो उन्होंने बताया कि हम न्यूयॉर्क, लंदन और इंडिया में शूटिंग कर रहे हैं। मैंने कहा कि मुझे तमिल नहीं आती तो बोले कोई बात नहीं, हम फिल्म को दो भाषाओं तमिल और हिंदी में बना रहे हैं। आप सब समझ जाएंगी। इसके बाद एक मुलाकात में उन्होंने पांच मिनट मुझे रू-ब-रू देखा और सब फाइनल हो गया।
pooja kumar
-'विश्वरूपम-2' भारत में स्थित है। पिछली फिल्म से कहानी कैसे आगे बढ़ी है?
- पहले भाग में जो विलेन (राहुल बोस) था, वह अमेरिका से भाग कर भारत आ गया है। कमल सर और मैं उसके पीछे हैं। विलेन ने बम अलग-अलग शहरों में लगाए थे उनमें से एक भारत में अभी फटने वाला है। आप पहली फिल्म में देख चुके हैं मैं न्यूक्लियर साइंटिस्ट हूं। इंडिया में बम को पानी के अंदर छुपाया गया है। मैं उसे ढूंढने में कमल सर की मदद करके डिफ्यूज करती हूं। मैंने अंडरवाटर एक्शन सीन खुद किए क्योंकि स्कूबा डाइविंग जानती हूं।
-अमेरिका में रहते हुए आप इंडियन सिनेमा से कितना कनेक्ट रहती हैं?
- बहुत अधिक। पैदाइश भले अमेरिका में हुई परंतु डीएनए तो इंडियन है।
- पहले भाग में जो विलेन (राहुल बोस) था, वह अमेरिका से भाग कर भारत आ गया है। कमल सर और मैं उसके पीछे हैं। विलेन ने बम अलग-अलग शहरों में लगाए थे उनमें से एक भारत में अभी फटने वाला है। आप पहली फिल्म में देख चुके हैं मैं न्यूक्लियर साइंटिस्ट हूं। इंडिया में बम को पानी के अंदर छुपाया गया है। मैं उसे ढूंढने में कमल सर की मदद करके डिफ्यूज करती हूं। मैंने अंडरवाटर एक्शन सीन खुद किए क्योंकि स्कूबा डाइविंग जानती हूं।
-अमेरिका में रहते हुए आप इंडियन सिनेमा से कितना कनेक्ट रहती हैं?
- बहुत अधिक। पैदाइश भले अमेरिका में हुई परंतु डीएनए तो इंडियन है।
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pooja kumar
-वहां भारतीय और अमेरिकी दर्शकों द्वारा इंडियन फिल्मों को कैसे देखा जाता है?
- हिंदी की सितारों वाली फिल्में ज्यादातर अमेरिकी-भारतीय देखते हैं। अमेरिकी दर्शकों का एक वर्ग इंडियन फिल्मों में दिलचस्पी लेता है लेकिन उन्हें इंडिपेंडेंट सिनेमा की तलाश रहती है। उन लोगों को आज भी यह बात हैरान करती है कि आखिर कैसे इंडियन फिल्मों में कहानी के बीच में गाना शुरू हो जाता है। डांस होने लगता है।
-क्या वह इस नाच-गाने वाली पहेली को सुलझाना चाहते हैं?
- मुझे नहीं लगता कि वे इसे सुलझा पाएंगे क्योंकि दोनों की संस्कृतियों में फर्क है। यही बात देखिए कि हमारे यहां शादियां रंग-बिरंगी और संगीत से सजी होती हैं। जबकि वहां शादियां कम होती जा रही हैं। इतना जरूर है कि इंडिया में बन रही रीयलिस्टिक फिल्मों से धीरे-धीरे वे कनेक्ट हो रहे हैं। जैसे वहां 'लंचबॉक्स' बहुत पसंद की गई।
- हिंदी की सितारों वाली फिल्में ज्यादातर अमेरिकी-भारतीय देखते हैं। अमेरिकी दर्शकों का एक वर्ग इंडियन फिल्मों में दिलचस्पी लेता है लेकिन उन्हें इंडिपेंडेंट सिनेमा की तलाश रहती है। उन लोगों को आज भी यह बात हैरान करती है कि आखिर कैसे इंडियन फिल्मों में कहानी के बीच में गाना शुरू हो जाता है। डांस होने लगता है।
-क्या वह इस नाच-गाने वाली पहेली को सुलझाना चाहते हैं?
- मुझे नहीं लगता कि वे इसे सुलझा पाएंगे क्योंकि दोनों की संस्कृतियों में फर्क है। यही बात देखिए कि हमारे यहां शादियां रंग-बिरंगी और संगीत से सजी होती हैं। जबकि वहां शादियां कम होती जा रही हैं। इतना जरूर है कि इंडिया में बन रही रीयलिस्टिक फिल्मों से धीरे-धीरे वे कनेक्ट हो रहे हैं। जैसे वहां 'लंचबॉक्स' बहुत पसंद की गई।
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pooja kumar
-भारत में हर साल ऑस्कर पुरस्कार का सवाल खड़ा होता है। कई लोग मानते हैं कि ऑस्कर भारतीय फिल्मों को दुनिया में नई पहचान देगा।
- ऑस्कर को पहचान से नहीं जोड़ना है। हम लोगों को बस यह देखना है कि कहानियां रीयलिस्टिक हों, उन्हें देख कर कर आनंद आए। फिल्म बनाने का उद्देश्य यही होना चाहिए। यह लक्ष्य नहीं होना चाहिए कि ऑस्कर मिल जाए। हमारी फिल्मों में तर्क का अभाव है। देखते-देखते हीरो-हीरोइन यहां से वहां पहुंच जाते हैं। एक चीज करते-करते दूसरी करने लगते हैं। अगर हम कहानियों पर ध्यान देना शुरू करें और किरदार अच्छे से गढ़ें तो इससे हमारा सिनेमा आगे बढ़ेगा।
- ऑस्कर को पहचान से नहीं जोड़ना है। हम लोगों को बस यह देखना है कि कहानियां रीयलिस्टिक हों, उन्हें देख कर कर आनंद आए। फिल्म बनाने का उद्देश्य यही होना चाहिए। यह लक्ष्य नहीं होना चाहिए कि ऑस्कर मिल जाए। हमारी फिल्मों में तर्क का अभाव है। देखते-देखते हीरो-हीरोइन यहां से वहां पहुंच जाते हैं। एक चीज करते-करते दूसरी करने लगते हैं। अगर हम कहानियों पर ध्यान देना शुरू करें और किरदार अच्छे से गढ़ें तो इससे हमारा सिनेमा आगे बढ़ेगा।