लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में...यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है...सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में...किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है...अब आप समझ तो गए ही होंगे कि हम किसकी बात कर रहे हैं। यहां हम बात कर रहे हैं उर्दू शायरी में चमकता और रोशन नाम राहत इंदौरी की। वही राहत इंदौरी जिनके मुशायरों की बादशाहत करीब तीन दशक तक कायम रही। मुशायरे की दुनिया में उनका नाम ही काफी होता था। लोग राहत इंदौरी का नाम सुनकर मुशायरों में खिंचे चले आते थे। आज राहत इंदौरी का जन्मदिन है। ऐसे में इस खास मौके पर आपको उनके बारे में खास बातें बताते हैं।
Rahat Indori Birth Anniversary: अब ना मैं हूं ना बाकी हैं जमाने मेरे, फिर भी मशहूर हैं शहरों में फसाने मेरे
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मध्यप्रदेश के इंदौर में जन्मे राहत इंदौरी के बिना अब यह शहर अधूरा सा लगता है। किसी जमाने में इस शहर में मजदूरी करने आए राहत साहब के पिता ने कभी यह सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन राहत साहब की पहचान इस शहर के नाम से होगी। आम से शब्दों में खास बात पेश का हुनर था राहत इंदौरी में। अपनी शायरी के माध्यम से उन्होंने हर खास बात को बेहद ही आम शब्दों में उकेरा है।
सरहदों पर बहुत तनाव है क्या,
जरा पता तो करो चुनाव है क्या,
खौफ बिखरा है दोनों सम्तों में,
तीसरी सम्त का दबाव है क्या।
गीत, गजल, नज्म और शायरी के कद्रदानों के घटते इस दौर में आज भी राहत साहब का नाम बड़े फक्र से लिया जाता है। पिछले 50 साल में मुशायरे की जान बन के राहत इंदौरी साहब ने मुल्क ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी शायरी का परचम लहराया। उर्दू साहित्य पढ़ने से अपना करियर शुरू कर मुशायरों में मकबूल हुए राहत इंदौरी साहब ने कई सफल फिल्मों के लिए गीत भी लिखे हैं। उन्होंने 'मुन्ना भाई एमबीबीएस', 'मिशन कश्मीर', 'इश्क', 'मर्डर' , 'बेगम जान' जैसी फिल्मों के लिए गाने लिखे हैं।
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नामचीन शायर होने के साथ-साथ वह काफी सादगी पसंद शख्सियत थे। अपनी शायरी के माध्यम से उन्होंने बदलते सामाजिक और सियासी दौर में आवाम को आइना दिखाने का भी काम किया। उन्होंने हर सामाजिक, सांस्कृतिक और तत्कालिक प्रासंगिक मुद्दों, मोहब्बत पर शायरी की। युवाओं की नब्ज थामने की कला राहत साहब बखूबी जानते थे। उनकी यह नज्म युवा काफी पसंद करते हैं-
किसने दस्तक दी ये दिल पर कौन है,
आप तो अंदर हैं बाहर कौन है।
सन् 1985 में राहत इंदौरी को अपने शोध 'उर्दू मुशायरा' के लिए पीएचडी की उपाधि से भी नवाजा गया। कई पुरस्कारों से नवाजे गए राहत साहब का रुत, मेरे बाद, चांद पागल है, नाराज नाम से शायरियों का संकलन हैं। वो 10 अगस्त 2020 को उनका निधन हो गया था। भले ही राहत साहब आज सभी के बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी हर नज्म सभी को बेहद पसंद है।
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