कॉमेडी सर्कस और द कपिल शर्मा शो जैसे टीवी शोज के 6 सौ से ज्यादा एपीसोड्स लिख चुके राज शांडिल्य अब निर्देशक बन चुके हैं। उनकी पहली फिल्म ड्रीम गर्ल रिलीज के लिए तैयार है। झांसी से मुंबई तक के अपने सफर के बारे में बता रहे हैं राज शांडिल्य।
आयुष्मान नहीं कपिल थे 'ड्रीमगर्ल' की पहली पसंद, इंटरव्यू में निर्देशक ने बताया क्यों ठुकराई फिल्म
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ड्रीम गर्ल से पहले फिल्म चिल्लर पार्टी में भी एक किरदार था जो महिलाओं की आवाज में बोलता है। ड्रीम गर्ल की पूजा की प्रेरणा क्या वही है?
नहीं, मैंने चिल्लर पार्टी तो देखी ही नहीं है तो वहां से प्रेरणा का सवाल ही नहीं है। हां, फिल्म शोला और शबनम में गोविंदा का सीन और चाची 420 में कमल हासन को जरूर आप मेरा प्रेरणा स्रोत कह सकते हैं। मैंने अपने टीवी शोज में भी तमाम कलाकारों को महिला किरदार दिए हैं।
तो झांसी से अब तक का सफर कैसा रहा?
झांसी से आने के बाद काफी संघर्ष किया मैंने मुंबई में। आज जहां बैठकर हम बातें कर रहे हैं, कभी इसी इमारत के आसपास की गलियों के मैं चक्कर लगाया करता था। लेखन ने मेरी काफी मदद की। मैंने वन लाइनर लिखने शुरू किए और कॉमेडी शोज में ये हिट भी हुए। वहीं से कहानी लिखने का मन बना और कहानी लिखते-लिखते ही निर्देशन का ख्याल भी आया।
तो फिल्म ड्रीम गर्ल में कहानी वही रहेगी जैसी आपने पहले दिन सोची थी या अब ये कुछ और हो गई है?
ड्रीम गर्ल की कहानी मैंने अपने लेखक निर्माण के साथ मिलकर रची है। शुरू में जो हम लिख रहे थे उसमें काफी बदलाव फिल्म निर्माताओं से मिलने के बाद हुए। पहले ये फिल्म किसी दूसरी लाइन पर जा रही थी। फिर हमें बताया गया कि ये एक पारिवारिक फिल्म होनी चाहिए। उसके बाद हमने अपनी फिल्म की दिशा बदली।
कपिल शर्मा के साथ आपने इतना काम किया है तो इस फिल्म के हीरो के लिए आयुष्मान खुराना की जगह कपिल शर्मा क्यों नहीं?
मैंने यह बात अभी तक सार्वजनिक रूप से कही नहीं लेकिन आपने सवाल किया है तो बता देता हूं कि पहले यह कहानी मैंने कपिल शर्मा को ही सुनाई थी। हो सकता है कि कहानी चूंकि शुरूआती दौर में थी उन दिनों या फिर वह व्यस्त ज्यादा थे, लेकिन ड्रीम गर्ल की कहानी कपिल को समझ नहीं आई। उनका नाम मेरे जेहन में हमेशा रहता है। कुछ और कहानियों पर मैं काम कर रहा हूं, हो सकता है आगे चलकर उनके साथ भी कोई फिल्म बने।
झांसी से आए तो कई साल हो गए, घर कितना बचा है आपके भीतर मुंबई में?
मुझे झांसी की बहुत याद आती है। झांसी के तमाम लोग मेरे साथ काम भी करते हैं। बुंदेलखंड के लोग दूसरों की मदद में आगे रहते हैं। मैं भी बस यही चाहता हूं कि काबिल लोगों की मदद कर सकूं।