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Raza Murad Exclusive: रजा मुराद की कहानी उन्हीं की जुबानी, बिहारी बाबू बिजी हुए तो इस फिल्म में मिला ब्रेक

Wed, 23 Nov 2022 07:45 AM IST
निधि पाल अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई Published by: निधि पाल Updated Wed, 23 Nov 2022 07:45 AM IST
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Raza Murad Exclusive Interview Birthday Special Raj Kapoor Amitabh Bachchan Shatrughan Hrishikesh Mukherjee
रजा मुराद - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

अभिनेता रजा मुराद का जब भी नाम याद आता है तो जेहन में एक बुलंद आवाज गूंजती है। रजा मुराद ने फिल्मों में जितने खतरनाक किरदार निभाए हैं, उससे कहीं ज्यादा वह नर्म दिल इंसान हैं और आज भी  मिट्टी से जुड़े हुए हैं। जब भी मौका मिलता है, वह अपने पैतृक शहर उत्तर प्रदेश के रामपुर जरूर जाते हैं। रजा मुराद अपने जमाने के मशहूर अभिनेता मुराद के बेटे हैं। मुराद ने अपने करियर में करीब 500 फिल्मों में काम किया और अभिनेता रजा मुराद अपने 51 साल के करियर में अब तक 548 फिल्मों में काम कर चुके हैं। 23 नवंबर 1950 को जन्मे रजा मुराद से ‘अमर उजाला’ ने उनके जन्मदिन के मौके पर ये खास बातचीत की। पढ़िए रजा मुराद की कहानी, उन्हीं की जुबानी...

Raza Murad Exclusive Interview Birthday Special Raj Kapoor Amitabh Bachchan Shatrughan Hrishikesh Mukherjee
रजा मुराद - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

जन्मस्थान रामपुर से अब भी अटूट रिश्ता 

अब अच्छी बात ये हो गई है कि मुंबई से बरेली की डायरेक्ट फ्लाइट हो गई है। बरेली से मेरा रामपुर बस 60 किलोमीटर दूर है। अभी पिछले महीने बरेली एक कार्यक्रम में गया था तो रामपुर चला गया। वहां सब मिलकर बहुत खुश हुए। अपने वतन से आपको दिली लगाव होता है जहां आप पले बढ़े हैं, वहां पर बचपन की बहुत सारी यादें जुड़ी होती हैं। वहां की एक एक गली, एक एक मोहल्ला और सारे बाजार मुझे अब भी याद हैं। वहां एक दिन भी रहता हूं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। अपने पुराने स्कूल भी मैं अक्सर जाता हूं। वहां का मशहूर हलवा मेरा पसंदीदा मिष्ठान्न है। वहां पैदल ही घूमता हूं, सब आते हैं, गले मिलते हैं, हाथ मिलाते हैं, सेल्फी लेते हैं। मैं किसी को मना नहीं करता हूं। मेरा अटूट रिश्ता है रामपुर से।

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रजा मुराद - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

सियासी दलों से इसलिए बनाई दूरी 

मुझे इंडस्ट्री में काम करते 51 साल हो गए और अब तक 548 फिल्में कर चुका हूं। हमारे पिता मुराद साहब 500 फिल्में कर चुके हैं। इस तरह से हम बाप बेटे ने 1000 से ज्यादा फिल्में कर ली। मुझे कई राजनीतिक पार्टियों से पार्टी ज्वाइन करने का ऑफर आता रहता है। लोग मुझे बहुत प्यार करते हैं। यही वजह है कि कभी राजनीति में नहीं गया। एक पार्टी में जाकर आप बाकी लोगों को अपने से दूर कर लेते हैं या वे ही आप से दूर हो जाते हैं। सभी पार्टियों में हमारे मित्र हैं तो, क्यों किसी एक के करीब आकर दूसरों से दूरी बना लें।

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अमिताभ बच्चन के साथ रजा मुराद - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

28 जुलाई 1971 को दिया पहला शॉट 

निर्माता निर्देशक बी आर इशारा की 1972 में रिलीज हुई अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी स्टारर फिल्म 'एक नजर' से मैंने करियर की शुरुआत की। बी आर इशारा को पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट के छात्रों से बहुत लगाव था। अपनी सुपरहिट फिल्म 'चेतना' भी उन्होंने इंस्टीट्यूट के छात्रों को लेकर ही बनाई थी। एफटीआई से पास होने के बाद मैं जब बी आर इशारा से मिलने गया तो उन्होंने कहा कि जब भी आपके लायक कोई रोल होगा तो बुलाऊंगा। फिल्म ‘एक नजर’ में वकील का जो किरदार मैने निभाया उसे पहले शत्रुघ्न सिन्हा करने वाले थे। लेकिन, तब तक शत्रुघ्न सिन्हा इतने व्यस्त हो चुके थे कि उनकी डेट्स में दिक्कत हो रही थी तो उनकी जहब बी आर इशारा ने मुझे बुलाया। मुझे आज भी याद है, 28 जुलाई 1971 को मैंने पहला शॉट दिया था।

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रजा मुराद - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

राज कपूर सिनेमा के दीवाने थे 

राज कपूर साहब बिजनेस के लिए फिल्में नहीं बनाते थे। उन्हें फिल्म बनाने की दीवानगी थी और यही वजह थी कि दर्शक उनकी फिल्में दीवानगी से देखते थे। वह अपनी फिल्मों में नए नए प्रयोग करते थे। नए सिंगर शैलेंद्र सिंह और नरेंद्र चंचल को 'बॉबी' में लिया, सुरेश वाडकर और सुधा मल्होत्रा को 'प्रेम रोग' में लिया। दूसरे मेकर स्टार्स के साथ काम करते थे और राज साहब जिसको मौका देते थे, वह अपने आप ही स्टार बन जाता था। 'मेरा नाम जोकर' की लंबाई ज्यादा हो गई थी तो फिल्म उतनी नहीं चल पाई। उसमे सब जाने माने चेहरे थे, तो उन्होंने सोचा कि अब एक नई कास्ट के साथ फिल्म बनानी चाहिए और उन्होंने ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया को लेकर 'बॉबी' बनाई। वह हमेशा फिल्म में सहायक कलाकारों में बड़े नाम रखते थे, जैसे 'बॉबी' में प्रेम नाथ, प्राण साहब और फरीदा जलाल को लिया। 'राम तेरी गंगा मैली' शुरू की तो उसमे भी सईद जाफरी, कुलभूषण खरबंदा और मुझे लिया।

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