Rekha Birthday Special: रेखा कहती हैं, 'बंबई (अब मुंबई) उस वक्त जंगल जैसा था और मैं एकदम निहत्थी थी। यह मेरे जिंदगी का सबसे डरावना वक्त रहा। मैं दुनिया के सभी नए रास्तों से अनजान थी। लोग मेरी अज्ञानता का फायदा उठाने की कोशिश करते। मैं महसूस करती थी कि आखिर मैं यहां कर क्या रही हूं? मुझे तो स्कूल में होना चाहिए! आइसक्रीम खानी चाहिए, मजे करने चाहिए, अपने दोस्तों के साथ रहना चाहिए। आखिर मुझे काम करने के लिए बाध्य क्यों किया जा रहा है? आखिर मुझे उन सामान्य चीजों से क्यों वंचित किया जा रहा है जो अक्सर बच्चे मेरी उम्र पर करते हैं? हर रोज मैं रोती थी क्योंकि मुझे वह चीजें खानी पड़तीं जिन्हें मैं पसंद नहीं करती। विचित्र कपड़े पहनने पड़ते जो मुझे परेशान करते थे। तरह-तरह की पोशाकें और गहनों से मुझे बहुत एलर्जी होती। बालों पर किया गया स्प्रे नहाने के बाद भी नहीं उतरता था। मुझे एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो तक धक्के देकर, या फिर यूं कहें कि घसीट कर ले जाया जाता था। बहुत सी ऐसी चीज रहीं जो डरावनी थीं और मैंने मात्र 13 साल की उम्र में कीं।'
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किरदार : चंदा
फिल्म : सावन भादों (1970)
रेखा (Rekha) ने एक बाल कलाकार के रूप में ही पहली बार एक तेलुगू फिल्म में काम किया था। बाद में उन्होंने एक कन्नड़ फिल्म 'ऑपरेशन जैकपोट नल्ली सीआईडी 999' में मुख्य भूमिका भी निभाई। लेकिन हिंदी फिल्मों में उनकी शुरुआत मोहन सहगल के निर्देशन में बनी फिल्म 'सावन भादों से हुई। वैसे तो रेखा की शुरुआत हिंदी फिल्मों में वर्ष 1969 में बनी एक फिल्म 'अंजाना सफर' से होने वाली थी लेकिन यह फिल्म कुछ दृश्यों की वजह से सेंसर बोर्ड में अटकी रही और पूरे एक दशक बाद 'दो शिकारी' शीर्षक से 1979 में रिलीज हुई। 'सावन भादों' में रेखा ने गांव की एक लड़की चंदा का किरदार निभाया है। वह काफी बहादुर होती है इसलिए फिल्म के मुख्य अभिनेता नवीन निश्चल के किरदार विक्रम का दिल चंदा पर आ जाता है। रेखा हिंदी भाषी नहीं थीं इसलिए उन्होंने इस फिल्म के लिए थोड़ी बहुत हिंदी सीखी और इसी फिल्म से उन्हें हिंदी फिल्मों में पहचान मिल गई।
किरदार : रेखा रॉय
फिल्म : दो अनजाने (1976)
हिंदी में अपनी पहली फिल्म के बाद रेखा (Rekha) के पास ऑफर तो खूब आते थे लेकिन उन्हें किसी ऐसे ऑफर की तलाश थी जो उन्हें एक अभिनेत्री के तौर पर स्थापित कर सके, न कि एक प्रदर्शित होने वाली वस्तु के रूप में। लगातार अपनी भाषा, चाल ढाल और वजन पर काम करते हुए रेखा ने अपने ऊपर काफी हद तक उत्तर भारतीय लड़की का चोला ओढ़ लिया था। फिर उन्हें देखकर कहना मुश्किल था कि वह दक्षिण भारत के एक लड़की हैं। तब उन्हें मौका मिला अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म 'दो अनजाने' में काम करने का। दुलाल गुहा के निर्देशन में बनी यह फिल्म निहार रंजन गुप्ता के लिखे एक बंगाली उपन्यास रात्रिर यात्री पर आधारित रही। इसमें रेखा का किरदार एक लालची पत्नी का था। यह पहली फिल्म थी जिसमें रेखा को अपने अभिनय के जौहर दिखाने का मौका मिला।
किरदार : आरती चंद्रा
फिल्म : घर (1978)
मानिक चटर्जी के निर्देशन में बनी यह फिल्म रेखा के करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। इस फिल्म में रेखा ने एक नई दुल्हन का किरदार निभाया है जो अचानक से सामूहिक दुष्कर्म का शिकार होती है। इस फिल्म की पूरी कहानी रेखा के किरदार आरती के संघर्ष और उसके प्यार करने वाले पति के साथ जीवन निर्वहन करने में बीतती है। कहानी में आरती के पति का नाम विकास चंद्र है जिसका किरदार विनोद मेहरा ने निभाया है। इस फिल्म से पहले रेखा 50 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुकी थीं लेकिन इस फिल्म में जो उन्होंने किया, उसे कोई नहीं भुला सका। इसके लिए रेखा के काम को खूब सराहना मिली। इसी फिल्म के लिए रेखा को पहली बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामित किया गया।
किरदार : जोहराबाई
फिल्म : मुकद्दर का सिकंदर (1978)
‘घर’ में खिंची रेखा को अपनी अदाकारी से रेखा ने एक बार फिर से अमिताभ बच्चन के और लंबा किया फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ में। यहां उन्होंने एक वेश्या जोहरा का किरदार निभाया है। यह फिल्म उस साल की ही नहीं, बल्कि उस दशक की ही सबसे बड़ी हिट फिल्मों में शामिल हो गई। इसी के साथ रेखा भी हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी और सफल अभिनेत्रियों में गिनी जाने लगीं। एक वेश्या के किरदार में रेखा के अभिनय की समीक्षकों ने बहुत सराहना की। उनका यह किरदार दर्शकों को भी बहुत पसंद आया। अमिताभ बच्चन और रेखा के साथ इस फिल्म में राखी, विनोद खन्ना, अमजद खान, कादर खान, निरूपा रॉय, आदि कलाकारों ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं। प्रकाश मेहरा की इस फिल्म में शानदार अभिनय के लिए रेखा को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामित किया गया।