डेढ़ दशक से बॉलीवुड में सक्रिय रितेश देशमुख ने बीते कुछ वर्षों में दिशा बदली है। एक्टिंग के साथ फिल्म निर्माण भी शुरू किया मगर मातृभाषा मराठी में। 2019 में वह छत्रपति शिवाजी की बायोपिक के साथ हिंदी में भी बतौर निर्माता आएंगे। अभिनेता-निर्माता की दोहरी भूमिका निभाते हुए कैसे देखते हैं आज के सिनेमा को इस विषय पर रितेश देशमुख से रवि बुले की विशेष बातचीत...
'माऊली' रिलीज से पहले रितेश देशमुख ने खोले दिल के कई राज, बॉबी के साथ कह रहे हैं 'हाउसफुल 4'
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दो साल से चर्चा है कि आप छत्रपति शिवाजी की बायोपिक बना रहे हैं। फिलहाल क्या स्थिति है?
दो दिन पहले ही मैंने फिल्म का नरेशन लिया। मराठी के विख्यात साहित्यकार विश्वास पाटिल स्क्रिप्ट लिख रहे हैं। शिवाजी महाराज की कहानी किस रूप में दिखानी है अभी फाइनल नहीं है परंतु बहुत जल्दी अंतिम रूप देंगे। मार्च-अप्रैल में शूटिंग शुरू करेंगे। फिल्म को हम हिंदी-मराठी दोनों भाषाओं में बना रहे हैं।
मराठा इतिहास फिल्मकारों को लुभा रहा है। बाजीराव मस्तानी के बाद अजय देवगन शिवाजी के सेनापति तानाजी मालूसरे पर फिल्म बना रहे हैं। पानीपत के तीसरे युद्ध पर आशुतोष गोवारिकर की फिल्म है।
मराठा इतिहास रोचक है। आज की फिल्में कल की पाठ्यपुस्तकें हैं। ऐतिहासिक कहानियों को सही ढंग से डॉक्युमेंट करना जरूरी है। सामान्य ज्ञान की किताब में पूरी बात नहीं आतीं। शिवाजी ने अफजल खां को मारा किताब में आप डेढ़ पन्ने में पढ़ते हैं। जिनकी इतिहास में दिलचस्पी है और जिसने गहराई से पढ़ा है उसे ही इसके पीछे की कहानी पता होगी। बाकी को नहीं। सिनेमा उस कहानी या इतिहास को आम लोगों तक रोचक ढंग से पहुंचाता है।
लेकिन ऐतिहासिक फिल्मों में विवाद का खतरा हमेशा तैयार रहता है?
इतिहास में कुछ ऐसे तथ्य होते हैं जिन्हें किसी तरह बदला नहीं जा सकता। उनसे छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।
बैंजो 2016, बैंक चोर 2017 के बाद इस साल आपकी फिल्म नहीं आई। अगले साल क्या होगा?
तीन फिल्में रहेंगी। इंद्रकुमार की 'टोटल धमाल', फरहाद समजी की 'हाउसफुल 4' और मिलाप कोठारी की 'मरजावां'।
बॉलीवुड से दूर होते हुए आप मराठी में ध्यान दे रहे हैं?
पांच फिल्मों, बालक पालक, लय भारी, फास्टर फेणे और माऊलीद्ध के बाद लग रहा है कि स्क्रिप्ट निर्माता हूं। रीजनल सिनेमा में बहुत ताकत है। मुंबई तो हिंदी-मराठी दोनों फिल्मों का घर है। इसलिए मैं हिंदी से दूर नहीं हो सकता।
इसीलिए बॉलीवुड का असर आपकी नई मराठी फिल्म 'माऊली' पर है जिसमें आप सिंघम-दबंग की तर्ज पर पुलिसवाले हैं। फिल्मों में पुलिस बनकर हीरो सीटियां लूटता है पर क्या वजह कि लोग असली पुलिस को दोस्त नहीं मान पाते?
फिल्मों में हीरो आम आदमी की लड़ाई लड़ता है। रीयल लाइफ में जो भी जनता की सेवा में हैं। चाहे पुलिस प्रशासन में हों या राजनेता हों ज्यादातर की छवि नेगेटिव होती है। यह लोग जनता के सीधे संपर्क में होते हैं तो कई बार उन्हें लेकर लोगों के अनुभव अच्छे नहीं रहते जिससे नेगेटिव इंप्रेशन बनता है। दुनिया में अच्छे का प्रचार कम नकारात्मक बातों का प्रचार तेज होता है। पुलिस में 80 फीसदी अच्छे हैं मगर बुरों की बातें ज्यादा होती है।