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Sachin Khedekar Interview: ‘हम आज भी हिंदी में प्रेमचंद पर अटके हैं नए लेखक नाटक लिखते ही नहीं’

रोहिताश सिंह परमार, मुंबई Published by: anand anand Updated Sun, 04 Oct 2020 11:28 AM IST
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Sachin Khedekar interview with amar Ujala about his films theatre and languages in cinema
सचिन खेडेकर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

मराठी, हिंदी, तेलुगू, तमिल आदि फिल्मों और रंगमंच के कलाकार सचिन खेडेकर का मानना है कि अगर लेखन अच्छे से हुआ है तो सब ठीक होगा। नहीं तो अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार भी फिल्म को बचा नहीं सकते। अमर उजाला के लिए सचिन खेडेकर से एक खास बातचीत की रोहिताश सिंह परमार ने। 

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सचिन खेडेकर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

आपकी एक नई फिल्म ‘हलाहल’ की इन दिनों चर्चा है, इस बार किस तरह की चुनौतियां बतौर अभिनेता आपके सामने रहीं?

इस फिल्म में हमारे निर्देशक रणदीप झा हैं। उनकी उम्र तो बहुत कम है लेकिन, जिस तरह से उन्होंने फिल्म के दृश्य बनाए, वह वाकई काबिले तारीफ है। इसकी शूटिंग हमने दिल्ली, गाजियाबाद और अमरोहा में की है। कलाकार भी वहीं आसपास के लिए गए। उन सबके लिए तो बहुत आसान था क्योंकि वह वहीं पर पले बढ़े हैं। मेरे लिए थोड़ा मुश्किल था क्योंकि मैं तो शुरुआत से ही मुंबई में रहा हूं। लेकिन, सबने मेरी बड़ी मदद की। अभिनय एक मिली जुली कला है। जब तक सब लोग एक साथ नहीं आ जाते तब तक ठीक से कुछ नहीं होता।

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सचिन खेडेकर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

इधर, पिता और बेटी की कहानियों पर सिनेमा कुछ ज्यादा ही मेहरबान है, कोई खास वजह दिखती है आपको?

(हंसते हुए) मैं भी कुछ समय पहले यही सोच रहा था। आपने बात सही पकड़ी है लेकिन पिता और पुत्र की कहानियां भी बन रही हैं। मेरी एक मराठी फिल्म 'मुरांबा' रिलीज हुई है जो कि पिता और पुत्र की ही कहानी है। यहां एक पिता अपने बेटे के भीतर का डर निकाल रहा है। इस फिल्म पर फिर गुजराती में भी फिल्म बनी 'गोलकेरी' नाम से। हां, आज का दौर बेटियों का ही है। दरअसल, बेटे को बचपन से लेकर जवानी और उनका घर बसाने तक उनके माता पिता का साथ मिलता है। बेटी पहले अपने घर को रोशन करती है और बाद में वही रोशनी दूसरे के घर जाकर भी बिखेरती है इसलिए बेटियों का महत्व ज्यादा है।

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सचिन खेडेकर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

इसीलिए आपकी कहानियों में भावनाएं बहुत दिखती हैं, कैसे चुनते हैं कोई कहानी?

मेरा पहला ध्यान पटकथा पर जाता है। अगर पटकथा के दृश्य अच्छे नहीं हैं तो कितना भी बड़ा हो वह न्याय नहीं कर सकता। मेरी सोच कि जो चीज कागज पर नहीं उतरी है वह अभिनेता के दिमाग में भी नहीं उतरेगी। अच्छा अभिनेता होना ही काफी नहीं है। अमिताभ बच्चन हों या दिलीप कुमार, वे भी खराब पटकथा को नहीं बचा सकते। फिर जिस किरदार के बारे में बात की जा रही है, आपको उसके जैसा दिखना चाहिए। मैंने अलग-अलग भाषाओं की फिल्में जरूर की हैं लेकिन मैंने इस तरह का प्रयोग कभी नहीं किया कि मैं छोटा देखूं या फिर बड़ा दिखने की कोशिश करूं। जब मैंने सुभाष चंद्र बोस का किरदार किया, उसकी शूटिंग हमने तब तक शुरू नहीं की जब तक श्याम (बेनेगल) बाबू को मेरा मेरा लुक संतुष्ट नहीं कर पाया। 'संविधान' में मैंने डॉ भीमराव अंबेडकर की भी भूमिका निभाई तो जब तक खुद को शीशे में देखकर मुझे संतुष्टि न हो तो सिर्फ अभिनय से काम नहीं हो सकता।

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सचिन खेडेकर - फोटो : twitter: @SachinSKhedekar

टीवी शो 'संविधान' में बोलने की आजादी का जिक्र भी प्रमुखता से किया गया है, आजकल जो हो रहा है, उससे कितना कष्ट होता है आपको?

संविधान सभा में कोई तीन सौ सदस्य थे। सभी ने भाषा, सेना और हथियारों आदि के बिल पेश किए। सभी पर मतदान हुए। हर सदस्य का अपना एक एजेंडा था। लेकिन, सब एक बात पर एकमत थे और वह ये कि देश पहले, वोट बाद में। अब आजादी के बाद अपनी जो ये 60 से 70 साल की यात्रा रही है इसमें ये चीज ही बदल गई है। अब हो गया है कि मेरे लोग पहले और देश बाद में। हमें देश की प्रगति आगे रखनी चाहिए और बाकी चीजें बाद में। मेरे हिसाब से इंसान का सबसे बड़ा गुण संयम होता है जिसे लोग आजकल खो रहे हैं। 

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