‘बेटा, तुमसे ना हो पाएगा’ ये जुमला न जाने कितनी बार आम जीवन में इस्तेमाल होता है और न जाने कितने लोगों ने आपको भी इसी तीर से ताना मारा होगा। सोशल मीडिया पर मीम्स भी इसके खूब बने। ये संवाद है, निर्देशक अनुराग कश्यप की फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' का और इसे परदे पर अपनी अदाकारी से जीवंत किया जे पी सिंह के किरदार में अभिनेता सत्यकाम आनंद ने। सत्यकाम इन दिनों फिर चर्चा में हैं अपनी फिल्म ‘भक्षक’ के किरदार सोनू को केलकर। सत्यकाम और नंबर वन कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा बरसों के साथी हैं। दोनों की दोस्ती के बारे में कम लोग ही जाने हैं, लेकिन मुकेश का नाम लेते ही सत्यकाम अब भी भावुक हो जाते हैं, क्या है दोस्ती का ये जय-वीरू जैसा किस्सा, आइए जानते हैं..
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सत्यकाम आनंद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपके अभिनय सफर की शुरुआत कैसे हुई और कहां से हुई?
मैं आरा, बिहार का रहने वाला हूं। मेरे पिता शिव कुमार सहाय अध्यापक हैं। 12वी में मेरे अंक कम आए, इसलिए कॉलेज में दाखिला नहीं मिल रहा था। पिताजी ने ही मुझे थियेटर करने का सुझाव दिया ताकि थियेटर कोटे से कॉलेज में दाखिला हो जाए। लेकिन, जो बात पिताजी ने मेरी पढ़ाई जारी करने के लिए बताई, वह मेरा जीवन बनने लगी तो पिताजी ने कहा, नाटक नौटंकी छोड़ो और पढ़ाई पर ध्यान दो और इंजीनियर बनो। लेकिन, मुझे तो थियेटर से प्यार हो चुका था।
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सत्यकाम आनंद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
घरवालों को आपने किस तरह राजी किया?
हमारे घर में ऐसी गुंजाइश थी कि पिताजी से खुलकर बात कर सकते थे। उनका जवाब था कि जो मैं चाह रहा हूं, अगर वह करोगे तो पैसा दूंगा, अगर तुम्हें अपनी मर्जी से कुछ करना है तो तुम देखो कैसे क्या करना है। मैंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया लेकिन एक बच्चे से महीने के 15 रुपये मिलते थे। मुझे लगा ऐसे पैसे इकट्ठा नहीं हो पाएंगे। पिताजी जिनको ट्यूशन पढ़ाते थे, उन पर करीब 20 हजार रुपये का बकाया था पिताजी का। मैंने इधर फोकस किया। पिताजी के बकाये के 12 हजार रुपये अपनी अदाकारी के जरिये वसूल लाया। आधे पैसे उन्हें दिए, आधे मैंने रखे और 1997 में दिल्ली आ गया। अस्मिता थियेटर ग्रुप में शामिल हुआ और वहीं मुझे नाटक की विधिवत ट्रेनिंग मिली।
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सत्यकाम आनंद और संजय मिश्रा
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिर आगे..?
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में दाखिले की कोशिश की, वहां चयन नहीं हुआ तो मन बहुत दुखी हुआ। एक दो बार तो आत्महत्या का भी ख्याल आया, लेकिन संघर्ष से हार मानना मैंने सीखा नहीं। जीवन के उद्देश्य फिर से समझे। मुझे अपने बचपन का ख्याल आया और मैं निकल पड़ा बच्चों के बीच अभिनय की अलख जगाने। स्कूल न जाने वाले बच्चों को पढ़ाने-लिखना सिखाने का काम किया। इसी बीच मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नाटक 'समर यात्रा' में मौका मिला। यहीं मुकेश छाबड़ा से मुलाकात हुई। हम तभी के दोस्त हैं। ये बात 1998 की है। इस नाटक के लिए गोवा गया तो वहां सीमा मुरासकर से मुलाकात हुई। आज वह मेरी पत्नी हैं।
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सत्यकाम आनंद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
दोनों के घरवाले शादी के लिए राजी थे?
पहले नहीं राजी थे। सीमा के घर वालों को मेरे बिहारी होने पर एतराज था। तब बिहार में अपराध चरम सीमा पर था और बिहार की छवि उतनी अच्छी नहीं थी जितनी आज है। सीमा के घरवाले डरते थे कि बिहारी लड़का है, कहीं बेटी को काटकर न फेंक दे। मेरे घरवाले भी तैयार नहीं थे। सबको मानने में दो साल लग गए और मेरी शादी मुंबई में ही हुई। पत्नी ने कहा कि एक साल मुंबई में रहते हैं, उसके बाद जहां चलना होगा, वहां चलेंगे, लेकिन वह साल आज तक नहीं आया।