EXCLUSIVE: ‘अमर उजाला’ से बोलीं विद्या बालन, ‘सामाजिक बदलाव ने बदली सिनेमा में महिलाओं की कहानियां’
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एक पुरुष प्रधान सिनेमा में जब एक अभिनेत्री ‘शकुंतला देवी’, ‘शेरनी’, ‘तुम्हारी सुलू’ या बेगम जान’ जैसे शीर्षक किरदार करती है तो उससे लगातार सफल फिल्में देने की उम्मीदें भी तो बढ़ती होंगी?
मैं इस तरह की कोई खास कोशिश नहीं कर रही हूं। पर हां इस तरह की फिल्में जब चलती हैं तो ज्यादा इस तरह की फिल्में बनेंगी और सभी को फायदा होगा। मैं इकलौती अभिनेत्री नहीं हूं जो महिला प्रधान फिल्में कर रही है। सिनेमा समाज का आइना होता है तो समाज में ये बदलाव हो रहा है। समाज भी पुरुष प्रधान से हटकर महिला प्रधान बन रहा हो ऐसा तो मैं नहीं कहूंगी लेकिन हां बराबरी का समाज तो बन रहा है। इसी वजह से हमारी कहानियां भी उभरकर सामने आने लगीं हैं।
नए निर्देशकों से साथ काम करने में आपको आज भी परेशानी नहीं होती। ‘परिणीता’ भी प्रदीप सरकार की पहली फिल्म थी। अब जब ये फिल्म देखती हैं तो कहीं कोई बेहतरी की गुंजाइश दिखती है?
मुझे उस फिल्म में कोई खामी नहीं लगती। वह मेरी पहली फिल्म थी तो मैं उसे लेकर ऑब्जेक्टिव हो नहीं सकती। इस फिल्म में बहुत सारे लोग पहली बार सिनेमा बना रहे थे। इतना ज्यादा उत्साह था सेट पर कि तब और कुछ था ही नहीं हमारी जिंदगी में। वह फिल्म हम सबके लिए हमेशा स्पेशल रहेगी।
अब तक 16 साल आपने बिताए हिंदी सिनेमा में। इस दौरान कभी आपको ऐसा लगा कि ये फिल्म अगर मुझे निर्देशित करने को मिले तो मैं बेहतर कर सकती हूं? निर्देशक बनने की कोई योजना?
नहीं, मुझे निर्देशक नहीं बनना है। मुझमें वह हुनर है ही नहीं और हिम्मत भी नहीं है। मैंने एक छोटी सी फिल्म प्रोड्यूस की है पर उसके अलावा प्रोड्यूसर बनने का भी शौक नहीं है। प्रोड्यूसर बनना बहुत हिम्मत वाली बात होती है। मैं अपने पति (सिद्धार्थ रॉय कपूर) को देखती हूं तो समझ आता है कि बाप रे, किस किसको हैंडल करना पड़ता है और कितना इंतजार करना पड़ता है हर चीज के लिए।
पिछले डेढ़ दो साल से आपने और आपके पति ने घर पर लंबा वक्त साथ में बिताया। क्या कुछ नए अनुभव रहे आप दोनों के इस दौरान?
खूब झाडू पोंछा किया हमने साथ में। हमारे घर पर जो सहायिका रहती थी। वह खाना पकाती थी क्योंकि हम दोनों में से किसी को खाना पकाना नहीं आता। वह खाना पकाती थी और हम दोनों झाड़ू पोछा करते थे। कभी सोचा नहीं था जीवन में कि ये अनुभव भी हम साझा करेंगे। यह यादगार रहेगा। साढ़े आठ साल हो गए हमारी शादी को लेकिन जितना वक्त हमने पिछले डेढ़ साल में साथ बिताया। वह कभी नहीं बिताया था। शुरू में तो मुझे लगा था कि बहुत झगड़े होंगे लेकिन नजर न लगे, हमारे बीच हुए नहीं।