'सोनचिड़िया' से पहले डाकुओं पर बनीं ये 7 फिल्में, एक को तो ऑस्कर नॉमिनेशन भी मिला
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मदर इंडिया (1957)
भारत की उन फिल्मों में से एक जिन्हें अकादमी अवॉर्ड्स का नॉमिनेशन मिला था, मदर इंडिया एक सुपरहिट फिल्म साबित हुई थी। महबूब खान की इस फिल्म को सिनेमा जगत का एक महाकाव्य माना जाता है। फिल्म के आखिर में सुनील दत्त खुद डाकुओं के काफिले में शामिल हो जाते हैं, जिसके कारण उनकी मां उन्हें मार देती हैं। इस फिल्म में डाकुओं को कम समय के लिए दर्शाया गया था, पर यह उन दिनों की पहली फिल्मों में से एक थी, जिन्होंने डाकुओं को बड़े पर्दे पर उतारा था।
जिस देश में गंगा बहती है (1961)
हिंदी सिनेमा के शोमैन कहे जाने वाले राज कपूर इस फिल्म में एक बाजा बजाने वाले बने थे जो गलती से डाकुओं की बस्ती में पहुंच जाता है, पर उन डाकुओं का सरदार जिसका किरदार प्राण ने निभाया था, उसे पसंद नहीं करता लेकिन आखिर तक आते-आते राज कपूर का किरदार सभी का हृदय परिवर्तन कर ही देता है। फिल्म में प्राण राका का किरदार निभाकर डाकुओं और उनकी जिंदगी को काफी अच्छी तरह से दर्शाया है। इस फिल्म को राधू करमाकर ने डायरेक्ट किया था, जो 1961 में रिलीज हुई थी।
गंगा जमुना (1961)
फिल्म में मुख्य भूमिका निभा रहे थे दिलीप कुमार जिसका नाम गंगा था, फिल्म की कहानी के अनुसार वो एक डाकू बन जाता है। पर उनका छोटा भाई जमुना बड़ा होकर पुलिस वाला बनता है, अपने भाई को सरेंडर करने को कहता है, जिसके बाद मुठभेड़ में गंगा मारा जाता है। पर जमुना को बाद में पता चलता है कि वह अपने भाई गंगा की वजह से ही पुलिसवाला बना था। देखा जाए तो यह फिल्म एक डाकू की दरियादिली को दर्शाती है। फिल्म को डायरेक्ट नितिन बोस और प्रोड्यूस दिलीप कुमार ने किया था।
मेरा गांव मेरा देश (1971)
अक्सर फिल्मों में डाकुओं का नाम काफी खौफनाक रखा जाता है, जिसका उदाहरण इस फिल्म में मिलता है। इस फिल्म में विनोद खन्ना एक डाकू का किरदार निभा रहे थे, जिसका नाम जब्बार सिंह था। उनके अलावा फिल्म में धर्मेंद्र थे, जो एक हीरो की भूमिका निभा रहे थे। फिल्म बॉलीवुड की है तो आखिर में डाकू और हीरो की लड़ाई तो लाजमी थी। फिल्म को राज खोसला ने डायरेक्ट किया था और यह फिल्म 1971 में रिलीज हुई थी।