उस रात उन्होंने शनि ग्रह के छल्ले को देखा था। आसमान में करोड़ों किलोमीटर दूर उन्हें यह नजारा दिखा था। चांद भी दिखा था। उस टेलीस्कोप से जो चंबल के बीहड़ों में बसे छोटे से-कस्बे धौलपुर में उन्होंने लगाया था। उन रातों को याद करते हुए अभिनेता रणवीर शौरी बताते हैं कि किस तरह इन सबके बीच गुरू ग्रह भी दिख रहा था लेकिन वे सिर्फ उन नारंगी छल्लों को याद कर रहे थे। वे याद करते हैं कि किस तरह उन्होंने बीहड़ के बीच उस कस्बे में बिताई कुछ रातों को आसमान में अनंत की ओर देखा था। धौलपुर में लोग अपनी फिल्म 'सोनचिरैया' की शूटिंग के लिए डेरा जमाए हुए थे।
ऐसे शुरू किया था सुशांत सिंह राजपूत ने अभिनेता बनने का सफर, आसान नहीं थी डगर
अतीत को कई तरह से देखा जा सकता है। 34 साल के इस एक्टर के अतीत को, जो अपने पीछे कोई नोट छोड़कर नहीं गए लेकिन उन्होंने अपने पीछे कुछ शब्द छोड़ दिए थे। कुछ आकृतियां, कुछ विचार छोड़े थे और इनमें से ज्यादातर उन चीजों के बारे में थे, जो उन्होंने अंतरिक्ष में देखे थे। स्पेस की उनकी यह यात्रा उनकी उन अधूरी-सी कविताओं में पिरोई हुई थी, जिन्हें वो अपने 'ख्यालात' कहा करते थे। वह साइंस में डूबे रहने वाले शख्स थे। वे आधे कवि भी थे। उनके बारे में समझना हो तो उनकी पढ़ी हुई चीजों से कुछ सुराग मिल सकता है। उन्होंने जो देखा उसे देखकर ही आप उनके बारे में कुछ समझ सकेंगे। सुशांत को पता था कि शनि ग्रह के छल्ले धूमकेतुओं के टुकड़े, छोटे तारों या इसके सशक्त गुरुत्वाकर्षण से चकनाचूर चांदों के टुकड़े हैं। ये बर्फ, पत्थर और धूल हैं। सुशांत ने फिलीप रोथ को पढ़ा था, वाल्डो इमर्सन को भी, वह ईई कमिंग्स को कोट किया करते थे। वह रात में अनंत की ओर देखा करते थे। वह कहा करते थे कि तारे किस तरह अंतरंग होकर एक दूसरे को गले लगा रहे हैं। उन्हें पीटर प्रिंसिपल नाम के कॉन्सेप्ट के बारे में पता था। उनके पास 200 किलो का भारी-भरकम टेलीस्कोप था। उन्होंने आसमान की मैपिंग की थी। उन्हें याद्दाश्त चले जाने के बारे में पता था।
वह ब्लैक होल और चांद के गड्ढों को बारे में जानते थे। उन्हें 'डार्क साइड ऑफ मून' के बारे में भी पता था और जब भी वह आसमां में उन तारों को देखते थे जो समय की यात्रा कर रहे होते थे। उन्हें नीत्शे के बारे में भी पता था। नीत्शे कहा करते थे अगर आप लंबे वक्त तक शून्य को घूरते हैं तो वह भी आपको घूरने लगता है। शायद वो सितारों की भीड़ में खुद को अकेला, अलग-थलग खड़े पाते थे। शायद सुशांत स्पूतनिक हैं। वो सेटेलाइट जिसे छोड़े जाने के तीन महीने के बाद हर 96 मिनट पर पृथ्वी का चक्कर लगाना था, जो टूट कर बिखर गया था। वह अंतरिक्ष में विलीन हो गया था। शायद स्पूतनिक वो प्रेमी था जो ब्लैक होल में खो गया। बगैर पृथ्वी का चक्कर लगाए वह सीधे अनंत में विलीन हो गया। इसके पीछे न कोई सिद्धांत काम कर रहा था और न कोई भौतिकी और न ही कोई रसायनशास्त्र।
सुशांत एक ऐसे शख्स थे, जो हमारे सामने थोड़ा खुले भी थे और थोड़ा बंद भी। उनमें कई चीजों का मेल दिखता था। यह एक ऐसे आदमी की कहानी थी, जिसने हमने तवज्जो नहीं दिया। खुदकुशी के बाद कई लोगों ने उनके बारे में कई चीजें लिखीं। किसी ने खुदकुशी के तरीके के बारे में लिखा, तो कुछ ने इसकी वजह बताई। उसकी मौत की साजिश के बारे में बातें हुईं। पुलिस की पूछताछ और डॉक्टरों पर बयानों को लेकर चर्चा हुई। उनकी खुदकुशी को लेकर कई लॉबियाँ खड़ी हो गईं। भाई-भतीजावाद की भर्त्सना की गई। बिहार के मुजफ्फरपुर में बॉलीवुड के एक्टर्स और डायरेक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई। एफआईआर में आरोप लगाया गया कि सुशांत को कुछ लोगों ने खुदकुशी के कगार पर पहुंचा दिया था। कुछ ने कहा कि पहले उन्हें प्रेम में फंसाया गया और फिर धोखा दे दिया गया। एक मीडिया संस्थान ने तो ये थ्योरी दे दी कि उनकी मौत का नाता उनके ट्विटर प्रोफाइल में लगी वैन गॉग की पेंटिंग से है, एक महान डच चित्रकार जिसने खुद को गोली मार ली थी। इन सबमें डिप्रेशन की कहानी गायब थी। और शायद यही खुदकुशी की इस दुखद कहानी का सबसे अहम पहलू था।
बॉलीवुड के लिए वह पूरी तरह से बाहरी थे। दर्शक उन्हें जानते थे, सेलेब्रेट करते थे। अपनी पहली फिल्म 'काई पो चे'में उन्होंने एक ऐसे युवा शख्स का रोल किया जो क्रिकेट का दीवाना है और जो एक युवा मुस्लिम लड़के को कोचिंग देता है ताकि वह आगे खेल सके। यह एक ऐसी भूमिका थी, जिसे आप भुला नहीं सकते। उस क्षण को तो आप अपने जेहन से कभी झटक ही नहीं पाएंगे जब वह खिड़की से रेंगते हुए बाहर निकलते हैं और बस की छत पर चढ़ जाते हैं। उनमें छोटे शहर के उस लड़के की झलक मिलती है जो अपनी आकांक्षाओं और जुनून के बीच डुबकियां लगाता रहता है। यह मां-बाप की महत्वाकांक्षाओं और आजादी के आकर्षण के बीच कश्मकश की कहानी है। आप लोगों को जिंदगी के उस हिस्से के बारे में बखूबी पता होगा। बिहार ऐसी ही जगह है, जहां छोटी उम्र के बच्चों के दिमाग में सपने रोप दिए जाते हैं। इंजीनियर, डॉक्टर, सिविल सर्वेंट बनने से लेकर शादी करने और सैटल होने तक सपने। यहां आपको हर दीवार पर आपको कोचिंग सेंटर के विज्ञापन चिपके मिलेंगे। सुशांत सिंह राजपूत ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए एंट्रेस एग्जाम दिया था और इसमें पूरे देश भर में सातवीं पोजिशन पर आए थे। एक्टिंग के फील्ड में उतरने से पहले वे मैकेनिकल इंजीनयरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। एक्टिंग के लिए उन्होंने इंजीनियरिंग दी थी।
सुशांत सिंह का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के मलडीहा में 1986 में हुआ था। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे। सभी बहनें, सिर्फ एक भाई। अपनी मां के बेहद करीब। वह शांत रहने वाला बच्चे थे। 2003 में मां की मौत का उस पर गहरा असर रहा। वह हमेशा एकांतप्रिय रहा। सुशांत के परिवार की नजदीकी रंजीता ओझा कहती हैं कि वह अपनी मां के बहुत करीब थे। मां की याद उन्हें बहुत सताती थी। हंसराज स्कूल में दाखिले के लिए वे दिल्ली के मुखर्जी नगर आ गए थे, अपनी बहन के साथ रहने। बहन यहीं रहकर सिविल सर्विसेज की तैयारी करती थीं।
सुशांत ने डेल्ही कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिया था। वह हमेशा मुस्कुराते रहते। रंजीता को उनकी यही मुस्कुराहट हमेशा याद आती है। या तो वे पार्क में अकले घूमते या फिर अपनी पढ़ने की मेज पर होते। वह मेज भी कुछ अलग थी। उस पर मिनिएचर एंटिक कारों के मॉडल रखे थे। साथ में उनकी असेंबल की हुई छोटी मशीनें भी थीं। उस छोटी-सी उम्र में किशोर होते हुए सुशांत रेने देकार्ते और सार्त्र के बारे में बात किया करते थे। सुशांत की बहन ने दर्शनशास्त्र में ग्रेजुएशन किया था। रंजीता कहती हैं, वे काफी समझदार थे। भाई-भतीजावाद कोई नई बात नहीं है। जो लोग नामी हैं उनके घरों में बच्चों से भी नाम कमाने की उम्मीद की जाती है। दिवंगत ऋषि कपूर और नीतू सिंह के बेटे रणवीर कपूर, कपूर खानदान की चौथी पीढ़ी के अभिनेता हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें ज्यादा मौके इसलिए मिले क्योंकि वह फिल्मी परिवार से ताल्लुक रखते हैं।