फिल्म माचिस और चांदनी बार के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और दर्जनों दूसरे पुरस्कार जीत चुकीं तबस्सुम फातिमा हाशमी यानी दर्शकों की चहेती तब्बू को हिंदी सिनेमा का कैटलिस्ट यानी उत्प्रेरक माना जाता है। भारत सरकार से पद्मश्री से सम्मानित हो चुकीं तब्बू ने अपनी पिछली फिल्म अंधाधुन के लिए गुरुवार की शाम मेलबर्न फिल्म फेस्टिवल में भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब जीता। शुक्रवार को निर्माता संजय राउतरे की फिल्म अंधाधुन ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म सहित तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीते। फिल्म अंधाधुन में सिमी का किरदार करने वाली तब्बू से अमर उजाला की एक खास बातचीत।
'अंधाधुन' सफलता मिलने पर तब्बू को नहीं आ रहा यकीन, इंटरव्यू में खोले निजी जिंदगी के राज
जिन लोगों ने भी आपकी पहली फिल्म हम नौजवान से लेकर पिछली फिल्म दे दे प्यार दे तक सारी फिल्में थिएटर में देखी हैं, वह इस बात पर हैरान रहते हैं कि तब्बू आखिर खुद को समय के साथ इतना कैसे बदल लेती है? कैसे चुनती हैं आप अपनी कहानियां?
किसी भी फिल्म की कहानी चुनते समय सबसे पहला जो असर आप पर होता है, वही किसी फिल्म को हां या ना करने के काम आता है। कहानी सुनते समय ही समझ में आ जाता है कि जो किरदार मुझे दिया जा रहा है उसकी ताकत क्या है। एक कलाकार के नाते मैं इसमें क्या जोड़ सकती हूं और ये किरदार मेरे करियर में क्या जोड़ पाएगा। किसी भी कहानी में किरदार ही सबसे अहम होता है।
फिल्म अंधाधुन ने भारत के अलावा चीन में भी कमाल का कारोबार किया, अब ऑस्ट्रेलिया में भी आप इसके लिए सम्मानित हुईं, कैसे चुना आपने सिमी का ये किरदार?
मैं हमेशा से श्रीराम राघवन के साथ काम करना चाहती थी। ये फिल्म और इसके सारे किरदार एक अच्छा संयोग बना। मैंने कभी सोचा नहीं था कि ये फिल्म इतनी कामयाब होगी। लोग कहते हैं कि यह हिंदी सिनेमा का टर्निंग प्वाइंट है, ये भी मैंने कभी नहीं सोचा था। अंधाधुन के निर्देशक श्रीराम का कहानी कहने का ढंग अलग है। ये बहुत ही ऑर्गेनिक फिल्म है। कहीं से नकली नहीं दिखती। कोई जबरदस्ती का घुमाव या साजिश नहीं है। थ्रिल या डराने के लिए कोई चीज जानबूझकर अलग से नहीं डाली गई। फिल्म का हर दृश्य अपने आप कहानी को आगे बढ़ाता जा रहा है। ध्यान से देखेंगे तो फिल्म के किरदारों को ये भी नहीं पता होता कि अगले पल क्या होने वाला है। फिल्म में पूरे समय सिमी खुद को हालात के हिसाब से बदलती रहती है। मेरे हिसाब से दर्शकों को यही बात पसंद आई।
हम नौजवान के बाद कादल देशम की बात करें, माचिस का जिक्र करें या मकबूल, चीनी कम से होते हुए अंधाधुन और दे दे प्यार दे तक आएं तो आपके किरदारों ने हिंदी सिनेमा में हीरोइन का चेहरा बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है, क्या कहेंगी इस बारे में?
आपने जो कहा वह मेरी मेहनत के बदले मुझे मिला बहुत बड़ा सम्मान है। मैंने कभी ये सब सोच के नहीं किया। मुझे किरदार अच्छे मिलते रहे। निर्देशक अच्छे मिलते रहे और सबसे अहम बात कि मुझे कहानियां अच्छी मिलती गईं। कुछ न कुछ अच्छा होता ही गया। सिनेमा में मेरी अदाकारी का ये रास्ता इन्हीं सबसे बना। दर्शकों के सिनेमा देखने के नजरिए में अगर मेरे इस सफर का कुछ असर पड़ा है तो मैं इसके लिए इन्ही सबको धन्यवाद देती हूं। दर्शकों ने मेरे किरदारों को अपने आसपास का महसूस किया, यह बड़ी बात है।
तो इस तरह के किरदारों में कितना विकास आपका हुआ और कितना हिंदी सिनेमा में एक अभिनेत्री के किरदारों का?
मैं जब भी कोई फिल्म करती हूं तो यह ख्याल मुझे रहता है कि हर फिल्म के साथ मेरा एक कलाकार के तौर पर विकास होना चाहिए। विकास न भी हो तो कम से कम कोई ऐसा किरदार तो न ही करूं जो मुझे चार कदम पीछे ले जाए। किसी भी फिल्म को करते समय मैं एक किरदार की जिंदगी जी रही होती हूं। एक अभिनेता के रूप में यह किरदार आपके जीवन का हिस्सा बन जाता है। तो जब अपना काम मैं अच्छे से करती हूं और वह लोगों को पसंद आता है तो खुद को भी बहुत संतुष्टि मिलती है। किसी किरदार को जीने की प्रक्रिया ही मेरे लिए सबसे अहम है।
