तीन सौ से ज्यादा हिंदी फिल्मों में काम करने वाले कॉमेडी अभिनेता जॉनी लीवर का बेशक कोई ताल्लुक फिल्म इंडस्ट्री से नहीं रहा। लेकिन, फिर भी वह कभी किसी सिफारिश के मोहताज नहीं रहे हैं। पर्दे पर उनकी उपस्थिति ही काफी थी लोगों को पर्दे से चिपकाने के लिए। किरदार तो उन्होंने कुछ गंभीर भी किए लेकिन उनकी पहचान और सही मायनों में उन्हें सफलता कॉमिक किरदारों में ही मिली। उनकी खास बात यह रही कि उनकी तारीफ अपने समय में सबसे बड़े कॉमेडियन रहे जगदीप, महमूद और जॉनी वॉकर भी दिल से करते थे। आज उनके जन्मदिन के अवसर पर हम आपको उनसे जुड़े कुछ रोचक किस्से सुनाते हैं।
जन्मदिन विशेष: पिता को ऑपरेशन टेबल पर छोड़ शूटिंग पर आ जाने वाले जॉनी की ये हैं अनसुनी कहानियां
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मिमिक्री करके रेलगाड़ियों में पेन बेचे
फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने से पहले जॉनी का नाम जॉन राव हुआ करता था। वह अपने एक दोस्त केदार के साथ कुछ बनने के लिए पुणे चले गए। वहां उन्हें काम तो मिला नहीं इसलिए वह ट्रेनों में पेन बेचने लगे। जॉनी ने खुद एक बातचीत में बताया कि पेन बेचने का विचार उनके एक सिंधी दोस्त ने उन्हें दिया था। जॉनी अपने सिंधी दोस्त और केदार के साथ ट्रेनों में पेन बेचते थे। जब लोग पेन लेते नहीं थे तो जॉनी के दिमाग में विचार आया है कि क्यों न अभिनेताओं की मिमिक्री करके पेन बेचा जाए। तब से जॉनी अशोक कुमार और जीवन कुमार जैसे अभिनेताओं की मिमिक्री करने लगे और उनकी पेन की बिक्री तीन से चार गुना बढ़ गई।
किन्नरों से कम्पटीशन
जॉनी बचपन से ही बहुत शरारती थे। जब उनके मोहल्ले में किसी बच्चे का जन्मदिन या फिर कोई भी समारोह हुआ करता था तो अक्सर उस समारोह को करवाने वाले लोग उन्हें बुलाया करते थे। जो नहीं बुलाता था तो जॉनी अपने दोस्त केदार के साथ उस समारोह में घुस जाया करते थे। उनका सिर्फ एक ही मकसद था कि जो प्रोग्राम हो रहा है उसमें स्टेज पर माइक पकड़कर लोगों का मनोरंजन करना था। एक किस्सा याद करते हुए जॉनी के दोस्त केदार कहते हैं, 'एक बार एक समारोह में कुछ किन्नर आ गए और वह अपना राग गाते हुए पैसे मांगने लगे। जॉनी भाई ने उनके साथ जमकर कंपटीशन किया। अंत में किन्नर बोले कि जॉनी आप हमारे ग्रुप में आ जाओ। जॉनी ने इस कंपटीशन में काफी पैसे इकट्ठे कर लिए थे। वहीं सारे पैसे झाड़े और बोले कि यह रहे तुम्हारे पैसे। तुम रखो। और मैं चला।'
अपने मोहल्ले में ही बनाए गुरु
जॉनी उस वक्त कुछ 15 से 16 साल के रहे होंगे तब उन्होंने अपने मोहल्ले में ही कुछ कार्यक्रम करना शुरू कर दिए थे। इसके लिए उन्होंने अपने मोहल्ले के ही प्रताप जानी नाम के अपने से बड़े शख्स को गुरु बनाया था। प्रताप से मिलने से पहले जॉनी उत्पल दत्त जैसे कलाकारों की मिमिक्री करते थे। उनकी इस प्रतिभा को देखकर ही प्रताप ने जॉनी को अपना शिष्य बनाया। जॉनी के सामने भाषा की बड़ी दिक्कत थी। वह सिर्फ टपोरी भाषा जानते थे। वह प्रताप जानी ही थे जिन्होंने जॉनी को सभ्य भाषा का ज्ञान दिया। प्रताप के ही कुछ कार्यक्रम करके जॉनी को अपने मोहल्ले में पहचान मिलना शुरू हो गई थी। जॉनी अभी भी प्रताप को अपना उस्ताद मानते हैं।
जॉन राव से जॉनी लीवर बनने का किस्सा
अपने शुरुआती दिनों में जॉनी लीवर हिंदुस्तान लीवर कंपनी में काम करते थे। एक बार कंपनी में एक समारोह का आयोजन किया गया। जॉनी कंपनी में काम करते हुए अपनी मिमिक्री के लिए भी मशहूर थे। उन्होंने उस समारोह में अपने साथ काम करने वाले अपने वरिष्ठ अधिकारियों की मिमिक्री करके वहां काम कर रहे सभी लोगों का खूब मनोरंजन किया। इस बात से खुश होकर जॉनी के यूनियन लीडर ने स्टेज पर चढ़कर बोला, 'जिस आदमी ने पूरी लीवर की ऐसी तैसी कर डाली। आज से इसका नाम लीवर होगा।' जब जॉनी ने सिनेमा में कदम रखा तो उन्होंने अपना नाम जॉनी लीवर ही रखा।