कभी इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में गिटार बजाकर पैसों का जुगाड़ करने वाले तिग्मांशु धूलिया ने सिनेमा में नाम और दाम दोनों कमाए हैं। सिनेमा में तिग्मांशु चौथाई सदी गुजार चुके हैं। इस यात्रा की कुछ यादें, कुछ बातें, तिग्मांशु ने अमर उजाला के लिए साझा कीं पंकज शुक्ल के साथ।
EXCLUSIVE: तिग्मांशु धूलिया ने छेड़े दोस्ती के राग, बोले, मैंने बहुतों को देखा है जमीन छोड़ते हुए
अच्छा हुआ कि मेरे पिता तब तक जज बने नहीं थे। तब वकील ही थे, नहीं तो बहुत ज्यादा बदनामी हो जाती। हमने तब अपने म्यूजिकल बैंड के लिए एक एम्प्लीफायर चुरा लिया था। मैं उन दिनों गिटार बजाया करता था। एक फंक्शन में बजाने के सौ डेढ़ सौ रुपये मिलते थे और वह बहुत होते थे। एक स्कूल के फंक्शन में हम लोगों ने ये हरकत की और फिर कुछ महीने बाद एक दोस्त की बहन की शादी में ही ये एम्प्लीफायर हमने बाहर निकाला। स्कूल के जो प्रिंसिपल थे, वे लगातार नजर रखे हुए। वे सीधे स्टेज पर आए, एम्प्लीफायर निकाला और चल दिए। उन्होंने फिर सबको बताया कि धूलिया साब के बेटे ने क्या किया। और, उसके बाद जो घर में पिटाई हुई, बाप रे बाप..!
किसी हुनरमंद के एक से ज्यादा कामों में सिद्धहस्त होने को आप किस तरह से देखते हैं?
बहुत सारे लोग कई काम करते हैं। अगर वो काम अच्छा हो रहा है, ठीक हो रहा है तो दिक्कत नहीं है। मैं भी फिल्म निर्देशक ही बनने आया था। लिखना बाद में शुरू हुआ लेकिन ड्रामा स्कूल में तो मैंने अभिनय में ही विशिष्टता हासिल की। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का वह पहला बैच था जिसमें सबने अभिनय में विशिष्टता सीखी। मैंने और एक मणिपुर के विद्यार्थी ने कहा भी कि हम निर्देशन सीखना चाहते हैं लेकिन कहा गया कि दो छात्रों के लिए फैकल्टी नहीं बन सकती थी। इंस्टीट्यूट ने बोला कि हम दो बच्चों के लिए फैकल्टी नहीं ला सकते कम से कम चार बच्चे होने चाहिए।
लेकिन, बड़े परदे पर अभिनय करने में इतनी देरी क्यों?
एक्टिंग की मैंने पढ़ाई की है लेकिन मैंने एक्टिंग कभी की नहीं। 20 साल बाद 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' में मैंने एक्टिंग की और अच्छा किया कि इतने सालों बाद की। एक्टर को थोड़ा बेशर्म होना पड़ता है। मैं बेशर्म नहीं हो पाता था मेरे अंदर एक हिचक रहती थी। निर्देशन करते समय किसी को अभिनय करके दिखा देना अलग बात है, लेकिन कोई निर्देशक एक्शन बोले और फिर एक्टिंग करना वह अलग बात है। शुरू में मैं बहुत शर्मीला था लेकिन इतने साल काम करने के बाद खुद पर भरोसा हो जाता है। हालांकि, इसमें मेरा इतना योगदान नहीं है जितना किस्मत और टाइमिंग का खेल है।
हिंदी सिनेमा में लेखन का पहला ब्रेक आपको अमिताभ बच्चन की बनाई फिल्म 'तेरे मेरे सपने' में मिला। तब महसूस हुआ था क्या कि एबीसीएल की फिल्म लिखने को मिली?
मैंने इतना सोचा नहीं इस तरह से। तब मैं एक सीरियल बना रहा था बीआई टीवी के लिए। उसका जो वीडियो एडीटर था वही 'तेरे मेरे सपने' का भी एडीटर था। 'तेरे मेरे सपने' आधी बन चुकी थी, शायद आधी से भी थोड़ा कम और वो बंद सी पड़ी हुई थी। स्क्रिप्ट से वह खुश नहीं थे। पुराने लेखक भी उनको तंग कर रहे थे। तो मेरे वीडियो एडीटर ने जॉय को मेरे नाम की सिफारिश की। जॉय ने बुलाया मुझको और मैं लिखने लगा लेकिन इतना नहीं सोचा था कि ये एबीसीएल की फिल्म है या कि अमिताभ बच्चन इलाहाबाद के हैं।
'बुलेट राजा' की विफलता से आपने क्या सीखा? क्या बॉक्स ऑफिस का दबाव किसी निर्देशक को पथभ्रष्ट करता है?
इसका पैसे से कोई मतलब नहीं है लेकिन ये सबके साथ होता है। जब आप पहली पिक्चर बनाते हैं तो आपको खुद पता नहीं होता कि ये अधपका सा क्या है। लेकिन जब आपने दो चार फिल्में बना लीं और आपको ये समझ आने लगता है कि कहां क्या होता है तो निर्देशक थोड़ा ठंडा पड़ जाता है। इसे भरे पेट का सिनेमा और खाली पेट का सिनेमा की तरह भी समझ सकते हैं। 'बुलेट राजा' पर मुझे बहुत भरोसा था। मैं अब भी मानता हूं कि इस फिल्म की मार्केटिंग और रिलीज अगर सैफ अली खान की नियमित फिल्म की बजाय हिंदी पट्टी की फिल्म समझकर की जाती तो नतीजा कुछ और होता। इसके मेकर्स ने इसकी मार्केटिंग 'कॉकटेल' जैसी कर दी। उनको लगा होगा कि वो लोग देखेंगे ये फिल्म और उन्हीं लोगों ने फिल्म रिजेक्ट कर दी।
एक आखिरी सवाल, इरफान को लेकर। उनकी ऐसी कौन सी खूबी है जिसे आप चाहेंगे कि हर नया अभिनेता जरूर सीखे?
इरफान में मैंने कभी कोई बदलाव नहीं देखा जैसा कि स्टार बनने के बाद लोगों में हो जाता है। वो वैसा ही था जैसा पहले था। बहुत कम होता है हम लोगों में, जो बाहर के लोग हैं यहां पर, उनमें कि कामयाबी मिले और फिर भी पैर जमीन पर हों। इरफान के पैर हमेशा जमीन पर ही रहे। 'बैंडिट क्वीन' बनने के बाद बहुत सारे लोग दिल्ली से और तमाम दूसरे शहरों से बंबई आ गए और मैंने बहुतों को देखा है जमीन छोड़ते हुए। इरफान के वही शौक रहे जैसे पतंग उड़ाना। शूटिंग में देर हो रही हो तो उसे पतंग पकड़ा दो, वह पूरा दिन उड़ाता रहेगा। कहीं किसी गांव वाले ने रोटी बना दी तो उसको वही खाना है।
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