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आपने यकीनन नहीं देखे होंगे हाथ से बने ये फिल्मी पोस्टर, बनाने वालों ने तो फिल्में भी न देखी होंगी

Tue, 26 Mar 2019 01:25 PM IST
विजय जैन बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: विजय जैन Updated Tue, 26 Mar 2019 01:25 PM IST
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फ़िल्मी पोस्टर - फोटो : KARUN THAKAR AND THE LATE MARK SHIVAS COLLECTION
लंदन में "अफ्रीकन गेज" नाम से घाना के फिल्मी पोस्टरों की प्रदर्शनी लगी, जिसमें 100 से ज़्यादा पोस्टर प्रदर्शित किए गए। ये पोस्टर 1970 के दशक के आखिर से लेकर 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों के हैं। अफ्रीकन गेज" के क्यूरेटर और पोस्टर संग्राहक करुण ठाकर कहते हैं, "वे सिर्फ फिल्मी पोस्टर नहीं हैं। वे दो-दो मीटर ऊंचे, हाथ से बनाए गए असली तैल-चित्र हैं।" हाथ से पेंट किए गए इन पोस्टरों को बिलबोर्ड पोस्टर की तरह सार्वजनिक स्थानों पर, जैसे सड़क किनारे और बाजारों में लगाया जाता था।


इन पोस्टरों से हॉलीवुड, बॉलीवुड, नॉलीवुड और घाना की फिल्मों के मोबाइल वीडियो क्लब स्क्रीनिंग का प्रचार किया जाता था। ये पोस्टर देखने में भयानक और चटख रंगों वाले हैं। यह जरूरी नहीं कि पोस्टर फिल्म की थीम पर ही बनाए गए हों। "जुरासिक पार्क" के पोस्टर में एक डायनासोर को एक व्यक्ति को निगलते हुए दिखाया गया है और दूसरा आदमी गोल्फ खेल रहा है। ऐसा लगता है कि इन पोस्टरों को बनाने वाले कलाकारों ने शायद फिल्म नहीं देखी होगी।
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- फोटो : KARUN THAKAR AND THE LATE MARK SHIVAS COLLECTION
इन पोस्टरों को लोगों का ध्यान खींचने के लिए बनाया जाता था, ताकि वे आएं और वीडियो क्लब की फिल्म देखें। घाना के जिन इलाकों में सिनेमाघर नहीं थे, वहां लोगों को नई फ़िल्में दिखाने के लिए ऐसे क्लब बनाए गए थे। इनमें प्रमुख थे- प्रिंसेस ओसू और पाल माल वीडियो क्लब। ये वीसीआर, डीजल जेनरेटर और प्रोजेक्टर को ट्रकों में भरकर ले जाते थे और फिल्में दिखाते थे। पोस्टरों को ध्यान से देखें तो पता चलता है कि ऐसी स्क्रीनिंग अक्सर रात के साढ़े आठ बजे होती थी और टिकट की कीमत होती थी 300 सेडी। ठाकर कहते हैं, "यह बिजनेस था। वीडियो क्लब के लोग चाहते थे कि उनके शो के सारे टिकट बिक जाएं।"
स्क्रीनिंग के बाद पोस्टरों को समेट लिया जाता था और दूसरे गांव में अगली स्क्रीनिंग के लिए लगा दिया जाता था। पोस्टर बनाने के लिए प्रिंसेस ओसू मोबाइल वीडियो क्लब अच्छे कलाकारों की सेवा लेता था और बाज़ार भाव से ज़्यादा भुगतान करता था। चूंकि इन पोस्टरों को बाहर लगाया जाता था, इसलिए इनको कागज पर नहीं बनाया जाता था। इसके लिए आटे की बोरियों को खोलकर उनको एक साथ सिल दिया जाता था और उनको तेल और एक्रिलिक पेंटिंग के लिए कैनवास बना दिया जाता था।
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- फोटो : KARUN THAKAR AND THE LATE MARK SHIVAS COLLECTION
ठाकर कहते हैं, "ध्यान से देखें तो पोस्टरों की पेंटिंग के नीचे आटे का ब्रांड और वजन 50 किलो का प्रिंट देख सकते हैं। " ये पोस्टर असल में एक विजुअल कैप्सूल हैं जो 20वीं सदी से 21वीं सदी में जाते घाना और पश्चिमी अफ्रीका के बारे में बहुत कुछ बताते हैं। नॉलीवुड और घाना की कुछ फिल्मों (जैसे- पावर टू पावर) के पोस्टर उपनिवेशवाद के साथ आए आधुनिक पश्चिमी ईसाई धर्म और स्थानीय आस्था और विश्वास के बीच तनाव को उजागर करते हैं। एक पोस्टर में ईसा मसीह एक दानवी शक्ल की महिला का उद्धार करते हुए दिखते हैं। बॉलीवुड की फिल्मों के पोस्टर घाना में हिंदी सिनेमा की लोकप्रियता के बारे में बताते हैं। ठाकर कहते हैं, "जब मैं घाना के बाज़ारों में घूमता था तो कई लोगों को बॉलीवुड के पॉपुलर गाने गाते देखकर हैरान रह जाता था।" "मैं बॉलीवुड के साथ बड़ा हुआ हूं। ये पोस्टर दिखाते हैं कि बॉलीवुड की पारिवारिक कहानियां, डांस, ड्रामा, ओवरएक्टिंग और मेलोड्रामा घाना के लोगों के बीच लोकप्रिय थे।" भुतहा फिल्में, जिनमें एक मां मर जाती है और उसकी आत्मा वापस आकर अपने बच्चे को एक जानवर के जरिये बचाती है भी यहां देखी जाती थीं। "नागिन और सुहागन" फिल्म में मां की आत्मा सांप के रूप में वापस आती है।"
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KARUN THAKAR AND THE LATE MARK SHIVAS COLLECTION
सांप और संपरे नॉलीवुड और घाना के फिल्मी पोस्टरों में खूब दिखते हैं। ठाकर कहते हैं, "हमें बहुत सचेत रहना पड़ा कि प्रदर्शनी में बहुत सारे सांप न दिखें।" ठाकर एक टेक्सटाइल कलेक्टर हैं। पहली बार उनका ध्यान इन पोस्टरों की तरफ 1990 के दशक के आखिर में गया था जब वह घाना की यात्रा पर थे। इसमें उनकी रुचि जगी तो अपने पार्टनर टीवी और फिल्म प्रोड्यूसर मार्क शिवास (अब दिवंगत) के साथ उन्होंने सैकड़ों पोस्टर इकट्ठा किए। ठाकर और शिवास विशेष रूप से हॉलीवुड फिल्मों के पोस्टरों से आकर्षित थे। उन फिल्मों के पोस्टरों से वे परिचित थे, लेकिन घाना में वे बिल्कुल अलग थे। दुनिया के इस हिस्से में डिजिटल क्रांति पहुंचने और आइकनोग्राफी के सुलभ होने से पहले के दौर में घाना के कलाकार उनमें अपनी कल्पना के रंग भर देते थे। ठाकर कहते हैं, "ये पोस्टर हॉलीवुड पोस्टरों की नकल भर नही हैं। मुझे यह बात सबसे ज़्यादा रोमांचित करती है कि इनमें हॉलीवुड फिल्मों से कोई पॉपुलर तस्वीर लेकर उन पर स्थानीय कल्पना डाली गई है।"
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इमेज कॉपीरइटKARUN THAKAR AND THE LATE MARK SHIVAS COLLECTION

स्टेपफादर-3 का असली पोस्टर गहरे रंग का है। उसकी पृष्ठभूमि काले रंग की है और एक आदमी दोधारी कुल्हाड़ी पकड़े हुए है। घाना के कलाकार न्येन कुमाह ने जो पोस्टर बनाया उसमें स्टेपफादर का आधा शरीर मिट्टी में धंसा हुआ है और वह वहां से निकलता हुआ दिख रहा है। जहरीले ट्रिफिड की बेलें उसे लपेटे हुए है। ठाकर कहते हैं, "न्येन कुमाह के पोस्टर में चटख रंगों का इस्तेमाल है और यह मूल पोस्टर से बहुत अलग है।" कुल्हाड़ी और खुरपी से खून टपकता दिखता है. जिस तरह से नसों और खून को दिखाया गया है उससे पश्चिमी ईसाई चित्रकला की याद ताजा होती है। न्येन कुमाह ऐसी पेंटिंग्स बनाने के लिए मशहूर हैं।
ठाकर कहते हैं, "हर पोस्टर कला का अद्भुत नमूना है। जब तक आप इनको करीब से नहीं देखते, तब तक आप इनको महसूस नहीं कर पाते।" जो मेन्सा अपनी विशिष्ट शैली के मशहूर कलाकार हैं। वह नजरों को बांध लेने वाले रंग संयोजन और कल्पनाओं का प्रयोग करते हैं। जो मेन्सा की पेंटिंग्स में फूली हुई मांशपेशियां और उभरी हुई नसें दिखती हैं, जो किसी बड़ी नदी की सहायक नदियों की तरह शरीर पर फैली हुई रहती हैं। "द सेवन वांडर्स ऑफ़ अली बाबा" में यह विशेष रूप से दिखता है। प्रतिभा के बावजूद इनमें से कई कलाकार कला से जीविका अर्जित करने में सफल नहीं हो पाए।

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