कोलकाता की फिजाओं में उस दिन अजब सी रवानगी देखी गई। हर तरफ से जवानी बस एक दिशा में भागती दिखी। मौका था आमिर खान को सुनने का जो पश्चिम बंगाल की राजधानी पहुंचे थे एक साहित्य उत्सव में भाग लेने। यहीं उन्होंने पहली बार अपने पुरखों में सबसे खास अबुल कलाम आजाद पर दिल खोलकर बातें कीं। आमिर के बेटे का नाम भी आजाद ही है और आमिर चाहते भी हैं कि एक दिन वह अपने पूर्वज अबुल कलाम पर एक फिल्म जरूर बनाएं। आमिर की दादी अबुल कलाम आजाद के परिवार की थीं और आमिर के पिता का जन्म हुआ हरदोई के शाहाबाद में, नाम ताहिर हुसैन। ताहिर हुसैन ने अपने सुपरस्टार बेटे आमिर की एक फिल्म भी निर्देशित की, 'तुम मेरे हो'। अपने दूसरे बेटे फैसल के लिए उन्होंने बनाई फिल्म 'मदहोश'। लेकिन, इससे पहले भी अपने बड़े भाई नासिर हुसैन की तरह उन्होंने एक अच्छा फिल्म निर्माता बनने का हर संभव प्रयास किया। आज के बाइस्कोप की जो फिल्म है, वह ताहिर हुसैन के करियर की बतौर निर्माता बनाई चौथी फिल्म है, 'जख्मी'।
बाइस्कोप: इस फिल्म ने रातोंरात बदल दी रीना रॉय की किस्मत, मिली 'नागिन' और 'कालीचरण' जैसी हिट फिल्में
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'जख्मी' साल 1975 में रिलीज हुई और हिंदी सिनेमा में साल 75 के जो मायने हैं वे तो आप जानते ही हैं। इस साल 'शोले' रिलीज हुई थी। इसके अलावा इस साल 'जय संतोषी मां', 'संन्यासी', 'दीवार' और 'प्रतिज्ञा' जैसी फिल्मों ने खूब धूम मचाई। 'रफू चक्कर', 'वारंट', 'चोरी मेरा काम', 'धर्मात्मा', 'खेल खेल में', 'जख्मी' और 'जूली' इस साल की दूसरी कामयाब फिल्में रहीं। हिंदी सिनेमा की इन मसाला फिल्मों को मसाला फिल्में इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें एक तय फॉर्मूला होता है दर्शकों को रिझाने का। इस फॉर्मूले को और पुख्ता किया था सलीम जावेद की जोड़ी ने जिन्होंने पुरानी फिल्मों के किस्से कहानियों को उठाकर उन्हें नए रंग रोगन के साथ परदे पर पेश करने की शुरूआत की थी फिल्म 'हाथी मेरे साथी' में। सलीम जावेद के दौर में 'जख्मी' जैसी फिल्म का बॉक्स ऑफिस पर अपनी लागत से दूनी कमाई कर ले जाना भी बड़ी कामयाबी मानी गई।
फिल्म के हीरो थे सुनील दत्त और उनके साथ नजर आए एक नए रंग ढंग में राकेश रोशन। फिल्म में तारिक भी हैं जो परदे पर इससे पहले सलीम जावेद की लिखी फिल्म 'यादों की बारात' से डेब्यू कर चुके थे। 'यादों की बारात' के निर्माता निर्देशक थे तारिक के बड़े मामू यानी नासिर हुसैन और 'जख्मी' के प्रोड्यूसर रहे उनके छोटे मामू यानी ताहिर हुसैन। नासिर और ताहिर की बहन के बेटे थे तारिक और उनके पिता का नाम था अजहर अली खान। तारिक का करियर भी अपने इन्हीं दोनों मामाओं की मोहब्बत से गुलजार रहा। तारिक को फिल्म 'हम किसी से कम नहीं' में बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के फिल्मफेयर अवार्ड का नॉमीनेशन भी मिला और जिस फिल्म 'जबर्दस्त' में आमिर खान जब अपने अंकल नासिर हुसैन के असिस्टेंट डायरेक्टर बने थे, उस फिल्म तक आते आते तारिक की ठीक- ठाक फैन फॉलोइंग भी बन चुकी थी।
फिल्म 'जख्मी' बनी थी सुनील दत्त की फैन फॉलोइंग कैश कराने के लिए। फिल्म में हीरोइन थीं आशा पारेख, जिनका नासिर हुसैन के साथ लंबा रिश्ता चला। ये फिल्म बप्पी लाहिड़ी के संगीत के लिए भी जानी जाती है। इसी फिल्म से हिंदी सिनेमा में बप्पी लहिरी को पहचान मिली। जैसे तारिक को प्रमोट करने में उनके दोनों मामा लगे रहते थे, वैसे ही बप्पी लहिरी को भी अपने मामा किशोर कुमार से मदद मिली। फिल्म नन्हा शिकारी से हिंदी सिनेमा में साल 1973 में बतौर संगीतकार डेब्यू करने वाले बप्पी को ये फिल्म किशोर मामा ने ही दिलाई और बड़े प्रोडक्शन हाउस की इस फिल्म का उन्होंने फायदा भी बड़ा उठाया। फिल्म में उन्हें लता मंगेशकर, आशा भोसले और किशोर कुमार के साथ बेहतरीन गाने बनाने का मौका मिला। आओ तुम्हें चांद पे ला जाएं, अभी अभी थी दुश्मनी अभी है दोस्ती के अलावा फिल्म का होली गीत भी बहुत हिट हुआ। लेकिन इस फिल्म का ऑल टाइम हिट नंबर है ये गाना, जलता है जिया मेरा भीगी भीगी रातों में..
फिल्म जख्मी की कहानी तीन भाइयों की कहानी है। शादी वाली रात आनंद अपने साझीदार की हत्या के आरोप में गिरफ्तार हो जाता है। अपनी सफाई में वह कुछ कहता नहीं है। अदालत उसे फैसला सुनाने वाली है तभी उसके दोनों छोटे भाई अमर और पवन जज गांगुली की इकलौती बेटी निशा का अपहरण कर लेते हैं। इसके बाद जो होता है वही कहानी का असली मजा है। फिल्म की कथा-पटकथा हुमायूं मिर्जा ने लिखी। हुमायूं मिर्जा ने एच एम मिर्जा के नाम से भी हिंदी सिनेमा में बहुत काम किया है। मारुख मिर्जा और शाहरुख मिर्जा उनके भाई रहे और तीनों ने मिर्जा ब्रदर्स के नाम से फिल्में प्रोड्यूस भी कीं और डायरेक्ट भी कीं। फिल्म सुनील दत्त ने अपने कंधे पर ढोने की पूरी कोशिश की है। आशा पारेख से भी जितना बन पड़ा उतना उन्होंने किया। राकेश रोशन और तारिक छोटे भाइयों जैसे ही हैं। हां, फिल्म में काबिले तारीफ काम रहा रीना रॉय का जिन्होंने सिर्फ समीक्षकों और दर्शकों का ही नहीं बल्कि हिंदी सिनेमा के तमाम निर्माताओं, निर्देशकों और उस वक्त धीरे धीरे ऊपर आ रहे हीरो शत्रुघ्न सिन्हा का भी ध्यान अपनी तरफ खींचा। नतीजा राजकुमार कोहली से उन्हें मिली फिल्म 'नागिन' और शत्रुघ्न सिन्हा की वह हीरोइन बनीं फिल्म 'कालीचरण' में। अगले ही साल इन दोनों फिल्मों की कामयाबी ने रीना रॉय की किस्मत बदल दी।