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Review: कुछ मीठी कुछ फीकी है 'बरेली की बर्फी'
Sat, 19 Aug 2017 07:22 AM IST
रवि बुले
रवि बुले
Updated Sat, 19 Aug 2017 07:22 AM IST
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'बरेली की बर्फी' फिल्म रिव्यू
- फोटो : Twitter/BareillyKiBarfi
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बरेली के मिश्रा सदन में रहने वाली बिट्टी मिश्रा (कृति सैनन) को पिता ने बेटे की तरह पाला है। वह पिता के पैकेट से सिगरेट निकाल कर पीती है, शराब से उसे परहेज नहीं, बड़ों का सम्मान करना उसने सीखा नहीं, आधी रात तक घर से बाहर रहती है, सारे शहर में डीजे की कमी पूरी करती है और खुली छत पर डांस करती है।
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'बरेली की बर्फी' फिल्म रिव्यू
लड़के वाले बार-बार आते हैं और उसके ये गुण देख कर रिश्ता रिजेक्ट कर देते हैं। मां परेशान है। पिता को लगता है कि लड़की जब तक रहती है तब तक लगता है कब विदा होगी और जब जाने लगती है तो सोचते हैं कि उसके बिना कैसे रहेंगे। बिट्टी की सोच है कि आखिर उसमें क्या कमी है? उसमें जो बातें हैं, अगर वह किसी लड़के में हों तो क्या कोई गलत समझेगा? पिता समझाते हैं कि यह समाज है, भले ही हम इसे न मानें मगर रहना तो इसी के बीच है। मुद्दा यह कि क्या बिट्टी के लायक कोई लड़का मिलेगा?
बगल में छोरा, गांव में ढिंढोरा वाली कहावत कहानी में चरितार्थ होती है। प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाले चिराग दुबे (आयुष्मान खुराना) का दिल एक बार टूट चुका है और उस गम में वह नॉवेल लिख चुका हैः बरेली की बर्फी। नॉवेल की बर्फी बिल्कुल बिट्टी टाइप की है। चिराग ने अपनी पहचान छुपाते हुए यह किताब बचपन के दोस्त प्रीतम विद्रोही (राजकुमार राव) के नाम से छापी।
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'बरेली की बर्फी' फिल्म रिव्यू
बिंदास लड़की के बारे में लिखा नॉवेल पढ़ कर लोग पीटेंगे इस डर से विद्रोही ने बरेली छोड़ दिया। विद्रोही को बिट्टी ढूंढ रही है और चिराग मदद कर रहा है। क्या होगा जब बिट्टी बर्फी के राइटर से मिलेगी? चिराग का प्यार रोशन होगा या बुझ जाएगा? बिट्टी की शादी क्या कभी हो पाएगी? 'बरेली की बर्फी' इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढती है।
फिल्म की अच्छी बात यह कि कहीं-कहीं रोचक है। कुछ संवाद आकर्षक और गुदगुदाते हैं। रोमांस-कॉमडी का संतुलन है। कृति सैनन किरदार में फिट हैं। संवाद अदायगी और हाव-भाव से वह भरोसा दिलाती हैं कि आने वाले दिनों में दीपिका पादुकोण की जगह ले सकती हैं।
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