अपने बरसों के साथी जावेद अख्तर के साथ जोड़ी टूटने के बाद राइटरसलीम ख़ान ने जो पहली फ़िल्म लिखी थी, वह थी नाम। संजय दत्त और कुमार गौरव की सुपरहिट फ़िल्म। कम लोग ही जानते हैं कि जावेद अख्तर ने जिस दिन सलीम खान को साथ काम न करने का अपना फैसला सुनाया था उसी उसी रात अभिनेत्री हेलेन की मां का निधन हो गया। जावेद अख्तर ने अपने अकेले काम करने का इश्तेहार अगले शुक्रवार को छपवाया और मसरूफ हो गए। जावेद अख्तर के साथ जोड़ी टूटने के बाद सलीम खान ने जो पहली फिल्म लिखी थी, वह थी ‘नाम’। संजय दत्त और कुमार गौरव की सुपरहिट फिल्म। सलीम खान की सोलो राइटर के रूप में लिखी तीसरी फ़िल्म थी, कब्ज़ा। संजय दत्त, अमृता सिंह, परेश रावल, आलोक नाथ और डिंपल कपाड़िया स्टारर फ़िल्म कब्ज़ा ही हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है।
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नाम हिट हुई तो फिल्मफेयर अवार्ड्स नहीं हुए
राजेंद्र कुमार, सलीम खान और महेश भट्ट तीनों नाम की कामयाबी के बाद फिर मिले। साथ बैठे और तय हुआ कि एक और फ़िल्म सलीम खान लिखें जिसमें हीरो कुमार गौरव होंगे और जिसे निर्देशित महेश भट्ट करेंगे। फिल्म का नाम था, ‘नाराज’। फिल्म के लिए कुमार गौरव के अलावा राखी, माधुरी दीक्षित, नसीरुद्दीन शाह और अमरीश पुरी को साइन भी किया। सलीम खान तब तक एक फिल्म और लिख चुके थे, ‘फ़लक’। निर्देशक शशिलाल नायर की इस फ़िल्म में जैकी श्रॉफ हीरो थे। ये वही फिल्म है जिसमें सलीम खान की सिफारिश पर मशहूर विलेन जीवन के बेटे किरण कुमार को काम मिला और इसी फिल्म में सलमान खान ने बतौर सहायक निर्देशक काम भी किया। ‘फ़लक’ के बाद सलीम खान ने फिल्म ‘कब्ज़ा’ लिखी। सलीम खान के साथ उनके करियर का सबसे बड़ा हादसा ये हुआ कि फ़िल्म ‘नाम’ की जिस साल जबर्दस्त तारीफ हुई, उस साल के फिल्मफेयर पुरस्कार ही नहीं हुए।
नानाभाई भट्ट की अंतिम फिल्म
महेश भट्ट और मुकेश भट्ट के पिता नानाभाई भट्ट की बतौर प्रोड्यूसर आखिरी फ़िल्म ‘कब्ज़ा’ की कहानी दो भाइयों की वैसी ही कहानी है जैसी आपने अमिताभ बच्चन व शशि कपूर की फ़िल्म ‘दीवार’, आमिर खान और रजित कपूर की फिल्म ‘गुलाम’ या फिर जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर की फिल्म ‘परिंदा’ में देखी है। दरअसल ये सारी फिल्में एक ही अंग्रेजी फिल्म टऑन द वाटर फ्रंटट से प्रेरित हैं। 1954 में रिलीज हुई इस फिल्म में मर्लन ब्रांडो ने लीड रोल किया था। भट्ट भाइयों की फिल्म प्रोडक्शन कंपनी विशेष फिल्म्स का नाम ‘कब्ज़ा’ की ओपनिंग क्रेडिट्स में दिखता है और इसी कंपनी ने बाद में इसी कहानी पर 10 साल बाद ‘गुलाम’ भी बनाई। फिल्म की शुरूआत का सीन सलीम जावेद की ही लिखी फिल्म ‘दीवार’ के क्लाइमेक्स सीन से काफी मिलता जुलता है। वहां विजय गोली लगने के बाद पुरानी बंबई की गलियों में तड़प रहा होता है और यहां रवि।
सिनेमैटोग्राफर दानिश खान का दम
फिल्म ‘कब्ज़ा’ की कहानी कुछ यूं है कि रवि और रंजीत दो भाई हैं। रंजीत पेश से वकील है और भूमाफिया वेलजी भाई के लिए काम करता है। रवि की भी वेलजीभाई से जान पहचान हो जाती है तो वह उसे एक जमीन का टुकड़ा खाली कराने को भेज देता है। इस जमीन पर उस्ताद अली मोहम्मद बच्चों का पार्क बनाना चाहते हैं। इसी जमीन पर कब्जे को लेकर काफी ड्रामा होता है और उस्ताद अली मोहम्मद मरने से पहले पूरी जमीन की वसीयत रवि के नाम कर जाते हैं। अब रवि सीधे वेलजीभाई का मुकाबला करता है। उसकी माशूक रीता की जान भी खतरे में आती है लेकिन वह बदला लेकर ही मानता है। ‘जंजीर’ लिखने वाले सलीम ख़ान की ये एक कमजोर कहानी मानी जा सकती है। फ़िल्म में महेश भट्ट ने काफी मेहनत की है। एक एक सीन बहुत जमा कर शूट किया है। अपने सिनेमैटोग्राफर दानिश खान से भी उन्हें काफी मदद मिली। राजेश रोशन की धुनों पर लिखे गए आनंद बक्षी के गाने काफी हिट हुए थे। यहां इस गाने में किशोर कुमार का साथ दिया है गायिका अनुराधा देशपांडे ने।
...चलते चलते
‘नाम’, ‘फ़लक’ और ‘कब्ज़ा’ के बाद सलीम ख़ान ने तमाम फिल्में और भी लिखीं सोलो राइटर के तौर पर। इन फिल्मों में अमिताभ बच्चन की फिल्में ‘तूफ़ान’ और ‘अकेला’, विनोद खन्ना की फिल्म ‘ज़ुर्म’, धर्मेंद्र की फ़िल्म ‘मस्त कलंदर’, जुगल हंसराज व उर्मिला मातोंडकर की फिल्म ‘आ गले लग जा’ और उनके बेटे सलमान खान की फिल्में ‘पत्थर के फूल’ और ‘मझधार’ शामिल हैं। सलीम खान का नाम उनके बेटे सलमान खान की फिल्म ‘राधे: योर मोस्ट वांटेड भाई’ की ओपनिंग क्रेडिट्स में दिखता है। सलमान आज भी अपनी हर फिल्म ओके करने से पहले सलीम खान को जरूर दिखाते हैं। उधर, अपने बेटे विशेष के नाम से प्रोडक्शन हाउस खोलने वाले मुकेश भट्ट अब अपने भाई महेश भट्ट से अलग हो चुके हैं। महेश भट्ट और संजय दत्त की पिछली फिल्म ‘सड़क 2’ सुपर फ्लॉप हो चुकी हैं। अमृता सिंह की बिटिया सारा अली खान अब हिंदी फिल्मों में अपना भाग्य आजमा रही हैं। परेश रावल का बेटा आदित्य भी अब हीरो बन चुका है। वह खुद भी अपनी अगली फिल्म ‘हंगामा 2’ की रिलीज की राह देख रहे हैं।
(‘बाइस्कोप’ कॉलम में प्रकाशित यह आलेख बौद्धिक संपदा अधिकारों के तहत संरक्षित हैं।)