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Stree Movie Review: क्यों पुरुषों के लिए खतरनाक है चुड़ैल, हर सवाल का जवाब देगी 'स्त्री'

Mon, 03 Sep 2018 11:15 AM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Mon, 03 Sep 2018 11:15 AM IST
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film review stree and the story of a woman

निर्माताः दिनेश विजन


निर्देशकः अमर कौशिक
सितारेः राजकुमार राव, श्रद्धा कपूर, त्रिपाठी
रेटिंग **


वह हर साल चार दिनों के लिए आती है और फिर गायब हो जाती है। इन चार दिनों में शहर के पुरुष गायब होने लगते हैं। सिर्फ उनके वस्त्र मिलते हैं। वह पुरुषों को उठा कर न ले जाए इसलिए लोग अपने घर की दीवार पर कौवे और चमगादाड़ के खून से लिखा रखते हैं, ओ स्त्री कल आना। वह पढ़ना जानती है लेकिन भोली है।
सोचती है कि ठीक है आज यहां कोई नहीं है, कल आएगी। वह लौट जाती है। इस बार भी वह आई है और एक ही रात में बीस पुरुषों को उठा लिया है। हर तरफ डर पसरा है। वह ऐसा क्यों करती है? आगे क्या होगा? दुनिया में भूत-प्रेत-चुड़ैल का अस्तित्व हो न हो लेकिन उनकी कहानियां अवश्य हैं। 

film review stree and the story of a woman

इन कहानियों में बेसिर-पैर की बातें पंख लगाती हैं। स्त्री में भी उल्टी-सीधी बातों के पंख हैं। जो डराने की कोशिश करते हैं परंतु एकाध जगह को छोड़ कर कहानी को हास्यास्पद मोड़ों पर ले जाते हैं। फिल्म के लेखन और निर्देशन में यह भारी कमी है कि वह अंत में कई बातों को स्पष्ट नहीं कर पाती। चुड़ैल होती है या नहीं जैसे अनसुलझे सवाल की तरह फिल्म के निर्णायक क्षण असमंजस में डाल जाते हैं। बाहर निकल कर आप बहस करते रहिए। स्त्री हल्की-फुल्की हॉरर और थोड़ी-बहुत कॉमेडी फिल्म है। राजकुमार राव कहानी को आगे बढ़ाते हैं परंतु इसमें जान डाली है पंकज त्रिपाठी ने। दूसरे हाफ में जब वह अपनी पारी खेलते हैं तो फिल्म का ग्राफ उठता है। 

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राजकुमार यहां लेडीज टेलर हैं, जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है कि वह देख कर ही सही माप ले लेते हैं। स्त्री भी उनसे लहंगा सिलवाती है और अंत में वही पहन कर लौटती है। स्त्री का हॉरर बहुत कुछ टीवी शोज के जैसा है और इसकी कथा-बुनावट, दृश्य तथा रंग संयोजन पिछले दिनों आल्ट बालाजी (एकता कपूर) की वेब सीरीज गंदी बात से मेल खाता है। अतः स्त्री के फिल्म होने पर विश्वास कठिनाई और देर से होता है। राजकुमार राव ने चंदेरी (मध्य प्रदेश) में रहने वाले विक्की का रोल किया है जो कस्बाई लड़का है। उसके सपने ऊंचे नहीं लेकिन वह इतना जानता है कि कोई खास काम करने के लिए पैदा हुआ है। 

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क्या है वह खास काम? राजकुमार शुरू से अंत तक एक टोन बनाए रखने में कामयाब रहे। आप उनके फैन हैं तो फिल्म देख सकते हैं। श्रद्धा कपूर की भूमिका विशेष नहीं है। न लंबाई और न किरदार के लिहाज से। उन्हें बेहतर भूमिकाओं की जरूरत है। पहले हिस्से में दृश्यों/बातों के दोहराव हैं। यहां फिल्म की गति धीमी है। दूसरा हिस्सा जरूर कुछ घटनाओं से भरा है परंतु विशेष रोचक नहीं। अंत में फिल्म यही स्थापित करती है कि स्त्री को लेकर सदियों पुरानी पिछड़ी सोच को बदलने की जरूरत है। वह जान लेने वाली नहीं, जीवन देने वाली है। अंत में स्त्री ही स्त्री से बचाती है।

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