Movie Review: काली खुही
ओटीटी सामग्री का रिव्यू लिखने के लिए इन दिनों इतना कुछ कचरा इन दिनों देखना पड़ता है कि इस हफ्ते रिलीज हुई दोनों फिल्मों ‘तैश’ और ‘काली खुही’ किसी दूसरी दुनिया की फिल्में लगती हैं। दोनों की पृष्ठभूमि पंजाबी है। दोनों में पंजाबी परिवारों के बीच मचे कोलाहल की कहानियां हैं और दोनों अनावश्यक गालियों और कामुक दृश्यों से परहेज करती हैं। ‘तैश’ में तो फिर भी ब्रिटेन की जेल में संभोग का एक प्रतीकात्मक दृश्य और कुछ जगह गालियां हैं भी, ‘काली खुही’ को देखकर ‘सैक्रेड गेम्स’, ‘मिर्जापुर’ और ‘आश्रम’ के रचयिता गश खाकर गिर सकते हैं। ये नए जमाने का सिनेमा है। नए तकनीशियनों का सिनेमा है। सिनेमा यहां निर्देशक का दृष्टिकोण है। हताशा से जूझते लेखकों की खाली जेबों में खनकती गालियां नहीं। हैलोवीन से एक दिन पहले नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई ‘काली खुही’ देसी सिनेमा में हॉरर की एक नई दस्तक है, इसे सुनना जरूरी है।
Kaali Khuhi Review: ये प्रेतात्मा कुछ कहना चाहती है, अब नहीं समझे तो सदियां बनी रहेंगी ‘काली खुही’
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फिल्म ‘काली खुही’ की कहानी स्कूल में पढ़ने वाली शिवानी की कहानी है। उसके माता पिता की आपस में पटती नहीं। दादी की तबीयत खराब है तो सबको गांव जाना है। गांव जाने से पहले ही शिवानी को एहसास होने लगता है कि कुछ ठीक नहीं है। उधर, गांव में कोई वीराने में बने सूखे कुएं की छत तोड़ देता है। कोई रास्ते में साइकिल वाले को मिलता है। दादी को जो दिखता है, वह जानलेवा है। उनकी बहन पड़ोस में रहती हैं। सारे राज बरसों से सीने में दबाए। दुख इतना है कि चेहरे पर दिखता है। चेहरा ऐसा कि शीशे में उन्होंने बरसों से नहीं देखा। दोनों भौहों के बीच भी बाल उग आए हैं और दोनों भौहें मिलकर एक हो गई हैं। खूबसूरती रही नहीं पर दर्द भी नहीं जाता। शिवानी के माता पिता का गांव पहुंचना, शिवानी का बचपन की सहेली से मिलना, गांव, तालाब, नदी, नाले, बरसात, मेंढक, भैंस, कीचड़ और घना कोहरा। सब कुछ मिलाकर इसकी निर्देशक ने हॉरर का पूरा माहौल बना दिया है।
लेकिन, टेरी समुंद्रा की हॉरर फिल्म ‘काली खुही’ महज एक और आम हॉरर फिल्म भर नहीं है। ये एक ऐसी फिल्म है जिसमें दुनिया के इस कोने में अब भी लड़कियों को जन्मते ही मार देने की सदियों से चली आ प्रथा को लेकर कुछ कहने की कोशिश हो रही है। पैदा होते ही मांओं के हाथों से बच्चियां ले लेने और फिर उन्हें जहर चटा देने की घटनाएं सिर्फ कबीलों और गांवों में ही नहीं बल्कि शहरों में भी खूब होती हैं। ‘काली खुही’ का भय यहीं से अमृत पाता है। इसके रक्तबीज का असर काले खून की उल्टियां कराता है। गांव की पृष्ठभूमि पर बनी डरावनी फिल्में हिंदी सिनेमा में कम ही दिखती है, इस मामले में टेरी की कोशिश सराहनीय है। असहज परिस्थितियों में शहरी कलाकारों को ले जाकर उन्होंने एक अच्छी कहानी बनाने में कामयाबी पाई है। सर्दियों में गांवों के बाहर खेतों में और गांव के भीतर की मुंडेरों पर जमने वाले कोहरे ने भी यहां किसी किरदार की तरह ही तमाशा जमाया है।
अदाकारी के मामले में शबाना आजमी अव्वल नंबर हैं ही। दाद उनकी इसलिए भी देनी बनती है कि परदे पर जो रूप उन्होंने बिना प्रोस्थेटिक के धरा, वह फिल्म में भयानक और वीभत्स दोनों रस के बीज बोता है। रिश्ते निभाते समय वह करुणा भी ले आतीं हैं। कुछ दृश्यों में वीर व रौद्र रस भी झलकते हैं और अद्भुत व शांत तो वह है हीं। बीते महीने ही 70 साल की हुईं शबाना की परदे पर ये सक्रियता ही फिल्म ‘काली खुही’ की असली अंतर्धारा है। सत्यदेव मिश्र ने भी फिल्म में हॉरर के लिए जरूरी हड़बड़ाहट वाला हिस्सा बखूबी संभाला है। लेकिन, फिल्म में नोटिस करने लायक काम है रीवा और संजीदा शेख का।
फिल्म ‘काली खुही’ में अभिनेत्री संजीदा शेख के पास संवाद कम हैं। स्क्रीन टाइम भी बहुत नहीं मिला उनको। लेकिन, उनकी आंखें बोलती हैं। फिल्म ‘तैश’ के रिव्यू में मैंने लिखा था कि वह हिंदी सिनेमा की चोटी की नायिकाओं में शुमार होने के सारे गुण रखती हैं। इस फिल्म में उन्होंने अपनी अदाकारी में नया आयाम चुप रहकर अपने भाव कह जाने का जोड़ा है। ये दृश्य देख आपको मीना कुमारी का दर्द सहने और आंखों में झांक सकने वाले को बिना कुछ कहे अपनी बात समझा देने का हुनर याद आ सकता है। उनकी जोड़ीदार रीवा का काम भी अच्छा है। उनके अभिनय में हिंदी सिनेमा के पुराने बाल कलाकारों जैसी संपूर्णता भले न हो पर मेहनत उन्होंने की है। रीवा के साथ साथ हेतवी और रोज की मौजूदगी भी फिल्म को अच्छा सहारा देती है।