Movie Review: लूटकेस
कुणाल खेमू काफी सीनियर एक्टर हैं। 47 साल उनकी उम्र है और 37 साल का है उनका वर्क एक्सपीरियंस। गजराज राव, विजय राज और रणवीर शौरी जैसे कलाकारों के बीच उनके जैसे भले मानुस को देखकर आपको लग सकता है कि बेचारा कहां इन दिग्गजों के बीच आ फंसा लेकिन कॉमेडी का असली किंग कौन, पूछेंगे तो इस चौकड़ी में कुणाल खेमू का पलड़ा इन सबसे भारी है। प्रियदर्शन के साथ 'ढोल', उमेश शुक्ला के साथ 'ढूंढते रह जाओगे', रोहित शेट्टी के साथ 'गोलमाल 3 और गोलमाल अगेन' और राज एंड डीके के साथ 'गो गोवा गॉन' करने वाले कुणाल ने पिछली दो फिल्मों 'कलंक' और 'मलंग' में अपनी कलाकारी के कुछ नए खेल भी दिखाए हैं। लेकिन, दर्शकों को अब भी जो किरदार उनका याद है, वह है 'गोलमाल' का लक्ष्मण शर्मा। फिल्म 'लूटकेस' की कहानी में भले वह बने नंदन कुमार हैं लेकिन ये है विस्तार लक्ष्मण शर्मा का ही।
Lootcase Review: कोरोना काल में मुस्कुराने का ये पहला मौका है, दो घंटे का टाइम हो तो फटाफट देख डालिए
दर्जनों कमर्शियल्स बना चुके राजेश कृष्णन के विज्ञापनों की खूबी रही है कि वे आपके चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं। दो मिनट के कमर्शियल्स बनाते रहे राजेश ने इस बार दो घंटे 11 मिनट की पूरी फिल्म बनाई है। ये सही है कि डिज्नी प्लस हॉटस्टार की मार्केटिंग टीम ने उनकी इस फिल्म की मार्केटिंग अच्छे से नहीं की। छोटे शहरों और कस्बों के लोगों से बात करो तो उनको पता ही नहीं कि लूटकेस नाम की कोई फिल्म बनी भी है। मेट्रो शहरों में वैसे भी इन दिनों सबका 'दिल बेचारा' हुआ पड़ा है। वरुण धवन, आलिया भट्ट, अजय देवगन और अक्षय कुमार की जमात में शामिल होने लायक भी इस फिल्म के लोगों को डिज्नी प्लस हॉटस्टार ने नहीं समझा।
खैर, उनका काम वो जानें, हमारा काम है आपको ये बताना कि फिल्म 'लूटकेस' देखने के लिए आप अपने जीवन के दो घंटे निवेश करें कि नहीं और करेंगे तो रिटर्न क्या है? तो पहली बात तो ये कि लॉक डाउन के बाद से अगर आप अब तक किसी बात पर मुस्कुराए नहीं हैं या आपके मन में भी खुश होने की भावना नहीं जगी है तो ये फिल्म पहली फुर्सत में देख डालिए। कॉमेडी दो तरह की होती है एक उत्पल दत्त टाइप दूसरी कादर खान व शक्ति कपूर टाइप। यहां मामला ऋषिकेश मुखर्जी वाला ज्यादा है, डेविड धवन टाइम वाली कॉमेडी देखनी है तो थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा क्योंकि 'कुली नंबर वन' थिएटरों में रिलीज होने के इंतजार में हैं।
फिल्म 'लूटकेस' की कहानी इसके नवोदित निर्देशक राजेश कृष्णन ने कपिल सावंत के साथ मिलकर लिखी है। फिल्म में उत्तर भारत की संवेदनाएं समझ सकने वाले एक टीम मेंबर की कमी साफ दिखती है। कहानी फिल्म की लाइन भर की इतनी सी है कि दौलत उतनी ही अच्छी है जितनी आप खर्च कर सको। अथाह दौलत मिल जाना भी कितनी बड़ी मुसीबत है, ये यहां देखने को मिलता है। स्कूल से दूसरे की रबर ले आने पर मां की डांट खाने वाले बच्चे का बाप घर में ब्रीफकेस भर के नोट ले आता है। एक तरफ उसकी समस्या है इस दौलत को खपाने की दूसरी तरफ डर है सारा मामला बीवी के सामने खुल जाने की। कोरोना काल में सबके घरों में बन रही चाय की तरह यहां इसमें दालचीनी, तुलसी की पत्ती और काली मिर्च बनकर आते हैं, गजराज राव, रणवीर शौरी और विजय राज।
जानवरों के जीवन में भी दर्शन ढूंढ लेने वाले का किरदार करने में विजय राज ने फिर एक बार बाजी मारी है। रणवीर शौरी तो कैसा भी कथानक हो अपने लिए याद रह जाने लायक स्पेस बना ही लेते हैं और गजराज राव का पाटिल वाला किरदार मजेदार बन पड़ा है। लेकिन, ये फिल्म है कुणाल खेमू और रसिका दुग्गल की। चाल में रहने वाले के किरदार में बिल्कुल रंग जाने वाले कुणाल ने नंद कुमार का किरदार बेहतरीन तरीके से निभाया है। रसिका उनकी फिटमफिट वाली प्रियतमा हैं। फिल्म का हाइलाइट प्वाइंट है दोनों का बालक यानी आर्यन प्रजापति। वेब सीरीज पंचायत देखी है ना आपने। मुझे लगता है आत्माराम जब बड़ा होगा तो ऐसा ही कुछ कर दिखाएगा।
फिल्म 'लूटकेस' की गिनती कॉमेडी की क्लासिक फिल्मों में भले हिंदी सिनेमा के इतिहास में न हो, लेकिन फिलहाल कोरोना का लॉकडाउन काटने के लिए ये बढ़िया फिल्म है। फिल्म तकनीकी रूप से ठीक है। आनंद सुबाय की एडीटिंग फिल्म की काफी मदद करती है। फिल्म के गीत संगीत में थोड़ा पैन इंडियन स्वाद का भी ध्यान रखा जाना चाहिए था। फिल्म 'लूटकेस' को अमर उजाला मूवी रिव्यू में मिलते हैं तीन स्टार।
पढ़ें: जब किशोर कुमार के पैर पर पैर रखकर अशोक कुमार ने करवाई थी एक्टिंग, जानिए मजेदार किस्सा
