हिंदी सिनेमा के कई ऐसे गाने हैं, जो जब भी बजते हैं एक सुरसुरी सी बदन में दौड़ जाती है। कभी इन गानों के बोल ऐसे होते हैं कि सुनने वाला चौकन्ना हो ही जाता है। तो, कभी इनका संगीत किन्हीं पुरानी यादों में लेकर चला जाता है। और, अधिकतर होता यही है कि ये आवाज किसी महिला की होती है। अंग्रेजी में इन्हें ‘हॉन्टिंग सॉन्ग’ कहते हैं यानी कि वे गाने जो बार बार याद आते हैं। श्रोताओं को भी और कहानी के किरदारों को भी। वैसे तो ऐसे गानों की लंबी फेहरिस्त है लेकिन फौरी तौर पर याद करें तो भी फिल्म महल का गाना ‘आएगा आएगा आएगा आना वाला’, फिल्म ‘बीस साल बाद’ का गीत ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’, फिल्म ‘कोहरा’ का ‘झूम झूम ढलती रात’, फिल्म ‘गुमनाम’ का ‘गुमनाम है कोई’, फिल्म ‘राज’ का ‘अकेले हैं चले आओ’, फिल्म ‘वो कौन थी’ का गाना ‘लग जा गले के फिर ये हंसी रात हो न हो’ और फिल्म ‘मेरा साया’ का गाना ‘मेरा साया साथ होगा’, ये ऐसे गाने हैं जो बने तो सुनने वालो को सिहरा देने के लिए हैं, लेकिन इन्हें सुनने का मन भी बार बार करता ही है। हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म ‘मिलाप’ में भी ऐसा ही एक गाना है।
बाइस्कोप: ये है पहला ‘मिलाप’ शत्रुघ्न सिन्हा और रीना रॉय का और गाना बजा, ‘आजा के अधूरा है अपना मिलन’
मुकेश ने गाया ये कालजयी गाना
फिल्मों में महिला स्वरों में तो ऐसे गाने तमाम हैं, जिन्हें हम हॉन्टिंग सॉन्ग्स कह सकते हैं। लेकिन, पुरुष स्वरों में सुनाई देने वाले हॉन्टिंग सॉन्ग्स में ऐसा एक गाना है मोहम्मद रफी की आवाज में फिल्म ‘नीलकमल’ का गाना ‘आजा तुझको पुकारे मेरा प्यार’ और दूसरा है मुकेश का गाया फिल्म ‘मिलाप’ का गाना ये गाना,
कई सदियों से कई जनमों से
तेरे प्यार को तरसे मेरा मन
आ जा, आ जा के अधूरा है अपना मिलन...
राहों में कहीं नजर आया
अपने ही ख्यालों का साया
कुछ देर मेरा मन लहराया
फिर डूब गई आशा की किरण...
नक्श लायलपुरी के बोल और बृज भूषण का संगीत। पहले देखिए ये गाना और फिर बात करते हैं कि क्या है इस गाने में शत्रुघ्न सिन्हा के एकदम से प्रकट हो जाने का संदेश? याद है ना हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म ‘मिलाप’ ही है।
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शत्रुघ्न सिन्हा का उदय
फिल्म ‘मिलाप’ के निर्देशक हैं बी आर इशारा। वही बी आर इशारा जिन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी धमक ही ऐसी फिल्मों के चलते बनाई जिनके विषय अपने दौर की फिल्मों से बिल्कुल अलग हुआ करते थे। फिल्म ‘मिलाप’ जब रिलीज हुई तब जमाना राजेश खन्ना और धर्मेंद्र जैसे सितारों के गीत गाया करता था। अमिताभ बच्चन की ‘जंजीर’ को रिलीज होने में अभी वक्त बाकी था। और, कम लोगों को ही पता होगा कि तब तक शत्रुघ्न सिन्हा का नाम हिंदी सिनेमा में हर तरफ चर्चा में आ चुका था। अमिताभ बच्चन की ही तरह शत्रुघ्न सिन्हा ने भी 1969 में ही अपना फिल्मी करियर शुरू किया। अमिताभ बच्चन को स्टार बनने के लिए चार साल तक इंतजार करना पड़ा। शत्रुघ्न सिन्हा उनसे दो साल पहले गुलजार की फिल्म ‘मेरे अपने’ के छैनू बनकर छा चुके थे। ‘मेरे अपने’ को मिलाकर साल 1971 में शत्रुघ्न सिन्हा की 10 फिल्में रिलीज हुईं और सन 1972 में कुल 12 फिल्में, इनमें से दो फिल्में दिग्गज निर्माता निर्देशक मनमोहन देसाई की फिल्में हैं। जी हां, मनमोहन देसाई ने अमिताभ बच्चन से पहले अपनी फिल्मों मे शत्रुघ्न सिन्हा का हो बड़े मौके दिए थे।
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‘मिलाप’ शत्रुघ्न सिन्हा और रीना रॉय का
साल 1972 की मनमोहन देसाई की दोनों हिट फिल्मों ‘भाई हो तो ऐसा’ और ‘रामपुर का लक्ष्मण’ में शत्रुघ्न सिन्हा ने काम किया। लेकिन, शत्रुघ्न सिन्हा को हीरो बनने के लिए जिस फिल्म ने सही रास्ता दिखाया, वह फिल्म थी ‘मिलाप’। जिसमें मुकेश का गाया गाना ‘कई सदियों से कई जनमों से’ शत्रुघ्न सिन्हा पर फिल्माए जाते ही उनकी इमेज दर्शकों के जेहन में बदल गई। बी आर इशारा को कलाकारों की असली प्रतिभा पहचानने में महारत हासिल थी। शत्रुघ्न सिन्हा को वह इससे पहले अपनी फिल्म ‘चेतना’ में भी मौका दे चुके थे। फिल्म ‘मिलाप’ में शत्रुघ्न सिन्हा के साथी कलाकारों में से रीना रॉय के साथ उनका रिश्ता खूब लंबा चला। फिल्म में डैनी भी एक अहम भूमिका में हैं, जिन्हें बी आर इशारा ने रीना रॉय के साथ फिल्म ‘जरूरत’ में लॉन्च किया था।
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रीना रॉय की पहली हिट
फिल्म ‘मिलाप’ में बी आर इशारा ने डैनी और शत्रुघ्न सिन्हा को एक साथ लेकर बड़ा रिस्क भले लिया हो लेकिन सच ये भी था कि दोनों ने बतौर निर्देशक गुलजार की फिल्म ‘मेरे अपने’ में काम भी बहुत बढ़िया किया था। रीना रॉय के करियर की ये सिर्फ दूसरी ही फिल्म है। इससे पहले वह बी आर इशारा की ही फिल्म ‘जरूरत’ में दिखीं। वैसे देखा जाए तो बी आर इशारा ने डैनी और रीना को उनकी पहली फिल्म के लिए ‘नई दुनिया नए लोग’ में साइन किया था लेकिन दोनों को लेकर इसके बाद शुरू हुई इशारा की फिल्म ‘जरूरत’ पहले रिलीज हो गई। इसके बाद आई फिल्म ‘मिलाप’ की कहानी ऐसी थी कि आमतौर पर उन दिनों की कोई हीरोइन खुशी खुशी इसे कर लेती, लेकिन इशारा ने रीना रॉय की काबिलियत में भरोसा किया और उन्हें ये रोल दिया। इसी फिल्म ने बाद में राजकुमार कोहली को अपनी मल्टीस्टारर फिल्म ‘नागिन’ का आइडिया दिया और उस फिल्म में भी रीना रॉय को ही लिया गया। ‘मिलाप’ से ‘नागिन’ तक का सफर ही रीना रॉय का असली सफर है, इस सफर में रीना रॉय ने तमाम फिल्में अलग अलग किरदारों कीं और इंडस्ट्री में अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। ‘नागिन’ ने साल 1976 की जनवरी में धमाका किया और अगले ही महीने वैलेंटाइंस डे से ठीक हफ्ता भर पहले रिलीज हुई फिल्म ‘कालीचरण’। सुभाष घई की बतौर निर्देशक इस पहली ही फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ताबड़तोड़ कमाई की और शत्रुघ्न सिन्हा व रीना रॉय की जोड़ी हिट जोड़ी करार दे दी गई।
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