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Film Review: शहरी युवाओं के लिए बनीं 'कुछ भीगे अल्फाज', लेकिन रफ्तार सुस्त
Fri, 16 Feb 2018 02:51 PM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Updated Fri, 16 Feb 2018 02:51 PM IST
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कुछ भीगे अल्फाज
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निर्देशक ओनिर इस बार नए रंग में हैं और उन्होंने दिल के कोने में छुपे एहसासों के साथ कहानी रची है। फिल्म तेज रफ्तार संचार और संपर्कों की दुनिया में भावनाओं की बात करती प्यार भरी कविताओं, छोटे-छोटे नोट्स और प्रेम संदेशों को प्रमोट करती है। यहां नायक-नायिका का सामना फिल्म के आखिरी पलों में होता है। कोलकाता में हर रात एफएम रेडियो के कार्यक्रम में आरजे अल्फाज (जेन खान दुर्रानी) रोमांटिक शायरी और रोमांस में सलाह-मशविरे देता है।
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कुछ भीगे अल्फाज
टूटते-बिखरते रिश्तों को जोड़ता है। उसका कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय है। मगर रोमांस की बातों से लोगों का दिल जीतने वाला अल्फाज खुद अकेला है। उसका एक दर्दनाक अतीत है और वह लोगों से ज्यादा सड़क पर घूमने वाले कुत्तों के साथ वक्त बिताता है।
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कुछ भीगे अल्फाज
दूसरी तरफ है, अल्फाज को हर रोज सुनने वाली अर्चना (गीतांजली थापा)। वह अल्फाज से बिल्कुल विपरीत है। उससे मिले बगैर उसकी फैन। वह एक विज्ञापन एजेंसी में काम करती है। लेकिन वह चेहरे के सफेद दागों (ल्यूकोडर्मिया) से ग्रस्त है, इसलिए कमतरी की भावना से भी ग्रस्त है। नतीजा यह कि वह टिंडर के माध्यम से ब्लाइंड डेट्स पर जाती है।
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कुछ भीगे अल्फाज
विपरीत स्वभाव और हालात में पड़े अल्फाज और अर्चना बिना मिले भी प्रेम में पड़ते हैं और कहानी के नाजुक मोड़ पर मिलते हैं। फिर एक-दूसरे को उनके कठिन हालात से निकलने में मदद देते हैं। ओनिर ने फिल्म को नाजुक पलों से बुना है और इसलिए किसी को लग सकता है कि इसकी रफ्तार धीमी है।
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कुछ भीगे अल्फाज
परंतु कहानी का संतुलन रफ्तार में संभव भी नहीं था। निर्देशक के रूप में यहां आपको उनका दायरा विस्तृत नजर आता है। जेन खान दुर्रानी की यह पहली फिल्म है और उनका अभिनय अच्छा है। दर्द भरा अतीत उनके चेहरे और चाल-ढाल में झलकता है। गीतांजलि ने अपनी भूमिका को संवेदना के साथ निभाया है। फिल्म बताती है कि कोई इंसान संपूर्ण नहीं है, उसमें कोई न कोई कमी है। जरूरत इस बात की है कि कमियों के बावजूद लगातार कुछ खूबसूरत रचा जाए। नई पीढ़ी के महानगरीय युवा दर्शक फिल्म से कनेक्ट होंगे।
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