सुबह सुबह आप इंटरनेट खोलें और गूगल के पेज पर जोहरा सहगल कथक की मुद्रा में खुशनुमा एहसास लिए सामने दिखें तो बस मन कुछ देर के लिए ठिठक जाता है। तकलीफें जोहरा सहगल ने अपने जीवन में बेहिसाब सहीं लेकिन मजाल की कोई फोटो उनका आप पा सकें, गमगीन चेहरे वाला। छोटी सी थीं कि मां गुजर गईं। अम्मी का बड़ा मन था कि जोहरा लाहौर जाकर पढ़े तो अपनी बहन के साथ वह चली गईं क्वीन मेरी कॉलेज में दाखिला लेने। कॉलेज में सख्त पर्दा होता था। तमाम पर्दादारी के बाद भी शादी के बाद बहन की हालत देख जोहरा ने तय किया कि उन्हें पहले अपनी जिंदगी बसानी है फिर देखा जाएगा कि घर बसाना भी है कि नहीं। खैर, हमें तो बातें जोहरा की भी करनी हैं और उनकी फिल्म ‘नीचा नगर’ की भी क्योंकि हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म यही है। 29 सितंबर 1946 को ये फिल्म फ्रांस के मशहूर शहर कान में होने वाले फिल्मों के मेले में दिखाई गई। गांधी टोपी लगाने वाला और चरखा कातने वाला एक हीरो कैसे सर्वहारा समाज के लिए इलाके के सबसे बड़े दबंग से भिड़ जाता है, यही फिल्म की कहानी है।
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गोर्की की गलियों की कहानी
तो चलिए शुरू करते हैं आज के बाइस्कोप की फिल्म ‘नीचा नगर’ का किस्सा। रूसी साहित्य में जिनको जरा भी दिलचस्पी है उन्हें मैक्सिम गोर्की का नाम जरूर पता होगा। 19वीं सदी के आखिरी और 20वीं सदी के शुरूआती सालों में मैक्सिम गोर्की ने जो किया, उस पर पूरी दुनिया ने गौर किया। सन 1950 में किशन चंदर ने लिखा था कि हम सबको गोर्की के सुलगते अल्फाज याद रखने होंगे। हमें साम्राज्यवाद के भगवानों के खिलाफ संघर्ष जारी रखना होगा। हम इन भगवानों के आगे सिर झुकाने से इंकार करते हैं। भीष्म साहनी का कहना था कि गोर्की ने जो किया उसके बराबर की हलचल साहित्य के जरिए कोई दूसरा पैदा न कर सका। गूगल ने जो डूडल बनाया वो उसी फिल्म ‘नीचा नगर’ की याद में है जिसके जरिए तिलिस्मी फिल्म निर्देशक चेतन आनंद ने गोर्की के संसार की पहली झलक हिंदुस्तानियों को दिखाई थी। फिल्म ‘नीचा नगर’ गोर्की की 1902 की रचना ‘द लोअर डेप्थ्स’ पर आधारित है। फिल्म की कहानी ऐसी है कि इसके कांस फिल्मोत्सव में पहली बार प्रदर्शित होने के 74 साल बाद भी हालात कुछ खास बदले नहीं हैं।
समाज के ‘भगवानों’ का असली चेहरा
फिल्म ‘नीचा नगर’ की कहानी ये है कि गरीबों के एक इलाके में आने वाली साफ पानी की पाइप लाइन को वहां का एक दबंग बंद कर देता है। बस्ती में पानी को लेकर हाहाकार है। गंदा पानी पीने से लोग मर रहे हैं, बीमार हो रहे हैं। तो यही शख्स इन मरीजों के लिए एक चैरिटी अस्पताल खोल देता है और लोगों के लिए भगवान बन जाता है। इंसान की बेसिक जरूरतों पर कब्जा करके फिर उसमें फंसे लोगों को हल्की सी मदद करके भगवान बनने का ये सिलसिला पुराना है। ये किस्सा परदे तक कैसे पहुंचा और कैसे उस वक्त अंग्रेजों की नजर से बचकर फ्रांस तक जा पहुंचा, ये कहानी तो दिलचस्प रही। लेकिन, इसकी कहानी का दुखद पहलू ये रहा है कि ये फिल्म तब हिंदुस्तान में रिलीज ही नहीं हो सकी थी। 29 सितंबर 1946 को इसे कान फिल्म महोत्सव में जो पहली बार दिखाया गया, उसे ही इसकी रिलीज डेट माना गया और गूगल ने जोहरा सहगल का जो डूडल मंगलवार को बनाया है, उसके मायने तमाम हैं। इसे बनाने वाले भारत को ‘नीचा नगर’ याद दिलाना चाहता है, लेकिन अधिकतर लोगों को जोहरा सहगल से आगे कुछ खास दिखा नहीं। गोर्की और उनके समकालीन दूसरे रूसी साहित्यकारों को पढ़ने वालों से बातें करने पर पता चलता है कि उस दौर में जहां दूसरे साहित्यकारों का नजरिया थोड़ा निराशावादी था और उन्हें भविष्य अंधकारमय दिखता था, गोर्की ने हर बार अपने लेखन में उम्मीद की लौ जलाए रखी। उनके बेघर किरदारों को भी लगता था कि वो सुबह बस आने ही वाली है। देश में प्रोग्रेसिव राइटर्स की जो एसोसिएशन बनी उस पर गोर्की का गहरा असर रहा है।
अब्बास और अंसारी की जुगलबंदी
बात लेखकों की चल ही निकली है तो ये बताना यहीं पर ठीक रहेगा कि फिल्म ‘नीचा नगर’ को लिखने वाले रहे ख्वाजा अहमद अब्बास और हयातुल्लाह अंसारी। पहले बात उन ख्वाजा अहमद अब्बास की कर लेते हैं जिनके बाबा को 1857 के गदर में मौत की सजा सुनाए जाने के बाद तोप के मुंह में रखकर उड़ा दिया गया था। वालिद उनके गालिब को पढ़ते रहे। ख्वाजा अहमद अब्बास ने हिंदी सिनेमा को जो दिया है, उस पर पूरी बतकही फिर कभी करेंगे लेकिन ये जान लेना भर यहा जरूरी है कि 1941 में अपनी पहली फिल्म ‘नया संसार’ लिखने से लेकर राज कपूर की फिल्म कंपनी के लिए 1991 में ‘हिना’ लिखने तक 50 साल में वह कोई 45 फिल्मों में अपनी कारस्तानी दिखा चुके थे। उनकी लिखी हिंदी सिनेमा की पहली बायोपिक मानी जाने वाली फिल्म ‘डॉ. कोटनीस की अमर कहानी’ और ‘नीचा नगर’ एक ही साल दुनिया की नजरों में आईं। उसी साल उनकी लिखी एक और फिल्म ‘धरती के लाल’ भी रिलीज हुई। फिल्म ‘नीचा नगर’ में जिन हयातुल्ला अंसारी की कहानी पर अब्बास ने पटकथा लिखी, उसका मूल मैं पहले ही बता चुका है कि ‘द लोअर डेप्थ्स’ से लिया गया है। लेकिन, हयातुल्ला अंसारी ने इसमें जो धागे जोड़ें हैं, वे कमाल के हैं। लखनऊ के फिरंगी महल में जम्मे हयातुल्ला अंसारी की शोहरत अब्बास की तरह ही पत्रकार की रही है। कांग्रेस के उर्दू अखबार ‘कौमी आवाज’ के वह लंबे समय तक संपादक रहे। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य का कार्यकाल पूरा करने के बाद उन्होंने राज्यसभा में भी अपना कार्यकाल पूरा किया।
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कामिनी कौशल को गुस्सा क्यों आया?
अंसारी और अब्बास की लिखी ‘नीचा नगर’ के निर्माता थे राशिद अनवर और बंटवारे से पहले बनी इस फिल्म ने देश में समाजवादी और यथार्थवादी सिनेमा की बुनियाद डाली। यहां ये ध्यान देने वाली बात है कि साल 1946 में कान फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई इस फिल्म को इस फेस्टिवल का बेस्ट फिल्म का सबसे बड़ा पुरस्कार मिला, जिसे अब तक कोई दूसरी भारतीय फिल्म हासिल नहीं कर पाई है। फिल्म में रफीक अहमद के साथ चेतन आनंद की पत्नी उमा आनंद, कामिनी कौशल और जोहरा सहगल ने अदाकारी में कमाल किया। इनके अलाव रफी पीर और हामिद बट के किरदार भी लोगों ने खूब सराहे। अपने समय की इतनी कामयाब फिल्म का जिक्र सिनेमा के सौ साला जश्न में न पाकर कामिनी कौशल ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को खूब खरी खटी सुनाई थी। उनका कहना था, ‘मेरी ये डेब्यू फिल्म कान फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म का अवार्ड पाने वाली पहली भारतीय फिल्म रही, लेकिन अब जबकि केंद्र सरकार देश में सिनेमा के 100 साल पूरे होने का जश्न मना रही है तो इस फिल्म का कहीं जिक्र ही नहीं। मुझे बहुत दुख होता है ये देखकर। मैं समझ सकती हूं कि मैं बुजुर्ग हो चुकी हूं और लोगों की याददाश्त से उतर चुकी हूं।’ देश में ‘नीचा नगर’ को वाजिब सम्मान मिला कि नहीं, इस पर अक्सर फिल्म क्लबों में बहस होती रहती है। लेकिन, सच ये भी है कि इसी फिल्म की वजह से इस फिल्म के दिखाए जाने के चार साल बाद ही चेतन आनंद को ज्यूरी बनने का भी न्यौता आया लेकिन वह ये कहते हुए नहीं गए कि अभी मेरे सीखने के दिन हैं, दूसरों को जज करने के नहीं। ‘नीचा नगर’ के 10 साल बाद आई सत्यजीत रे की फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ का प्रचार प्रसार और ब्रांडिंग कितनी भी की गई हो लेकिन तथ्य यही है कि भारतीय सिनेमा को विश्व परिदृश्य पर चर्चा दिलाने का पहला काम चेतन आनंद ने ही किया।
