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बाइस्कोप: इस वजह से पहेली को नहीं मिला ऑस्कर में नॉमीनेशन, अमोल पालेकर के दामन पर लगा 'दाग'

Wed, 24 Jun 2020 09:55 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Wed, 24 Jun 2020 09:55 PM IST
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paheli this day that year series by pankaj shukla 24 june 2005 bioscope shahrukh khan rani mukherjee
पहेली - फोटो : Social Media

ये फिल्म तो ज्यादा पुरानी नहीं है और न ही इसकी मेकिंग के किस्से अब तक लोग भूले होंगे। बाइस्कोप में वैसे तो मैं पिछली सदी के आठवें, नौवें और आखिरी दशक की हिंदी फिल्मों के बारे में ही बात करता हूं लेकिन इस दैनिक कॉलम में कई बार दिक्कत ये भी आती है कि पुरानी फिल्म कोई ढंग की होती नहीं और नई फिल्मों में कोई फिल्म पहेली जैसी सामने आ जाती है। बतौर एक्टर तीन बैक टू बैक सुपरहिट फिल्मों से डेब्यू करने वाले अमोल पालेकर डायरेक्टर भी कमाल के रहे हैं। पहेली उन्हीं की निर्देशित फिल्म है। अमोल पालेकर ने शाहरुख को बहुत सकुचाते हुए इस फिल्म की कहानी सुनाई और शाहरुख ने उनसे पूछा था कि क्या वह इस फिल्म में अभिनय करने के साथ साथ इसे प्रोड्यूस भी कर सकते हैं।



शाहरुख उन दिनों नए निर्देशकों की तलाश में थे, जिनके साथ वह यश चोपड़ा, आदित्य चोपड़ा और करण जौहर से आगे का सिनेमा बना सकें। ये उन दिनों की बात है जब शाहरुख अपने पुराने दोस्तों अजीज मिर्जा और जूही चावला की पार्टनरशिप वाली कंपनी ड्रीम्ज अनलिमिटेड बंद कर चुके थे। अपनी नई कंपनी रेडचिलीज एंटरटेनमेंट शुरू कर चुके थे और फराह खान की बतौर निर्देशक पहली फिल्म मैं हूं ना से करोड़ों का मुनाफा बटोर चुके थे। फिल्म पहेली ही हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है। आगे बढ़ने से पहले एक झलक फिल्म की :

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पहेली - फोटो : Social Media

पहेली पर चर्चा करने के यहां तमाम कारक भी हैं और कारण भी। इस फिल्म को फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया ने भारत की तरफ से ऑस्कर पुरस्कारों में भेजा था। ऑस्कर के लिए कौन सी फिल्म भारत से भेजी जाएगी, इसका फैसला पूरे देश के फिल्म निर्माताओं की अलग अलग संस्थाओं के महासंघ यानी फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया को ही करना होता है। हर साल इसकी एक ज्यूरी चुनी जाती है। और, यही ज्यूरी तय करती है भारत की ऑफीशियल एंट्री। दिक्कत यहां ये है कि इस ज्यूरी ने अधिकतर मौकों पर इस बात को तवज्जो नहीं दी कि ऑस्कर पुरस्कार किन मूलभूत कसौटी पर कसे जाने के बाद ही नामांकन की प्रक्रिया पूरी कर पाते हैं। इसकी पहली कसौटी है फिल्म के कथानक का एकदम सच्चा यानी कि ओरिजनल होना। अगर कहीं से भी ऑस्कर की समिति को ये भनक लग जाए कि किसी देश की तरफ से भेजी गई फिल्म पहले से बन चुकी किसी फिल्म से जरा सा भी मिलती जुलती है तो उसका ऑस्कर के लिए नॉमीनेट हो पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाता है बिल्कुल डॉन को गिरफ्तार करने की कोशिश की तरह।

शाहरुख खान 15 साल पहले तक भी सिनेमा के मंजे हुए खिलाड़ी बन चुके थे। लेकिन, तब भी उनके आसपास ऐसे लोगों की भरमार थी जिनके सिनेमा ज्ञान पर पूरी एक फिल्म बन सकती है। अब भी शाहरुख ऐसे लोगों से घिरे रहते हैं जो उनसे जीरो जैसी फिल्में करवा देते हैं और ये वही लोग हैं जो उन तक कभी कोई बात ढंग की पहुंचने नहीं देते। शाहरुख ठहरे बातों के पुजारी लेकिन सिनेमा की पूजा उन्हें इन्हीं लोगों ने कायदे से करने नहीं दी। अमोल पालेकर ने फिल्म पहेली जब बनाई उससे पहले वह बतौर अभिनेता और बतौर निर्देशक भी सिनेमा में एक अलग प्रतिष्ठा हासिल कर चुके थे। उनके निर्देशन में बनी पहली हिंदी फिल्म कमलेश पांडे ने लिखी थी अनकही नाम से साल 1985 में। ये फिल्म एक मराठी नाटक कालाय तस्मै नम: पर आधारित थी। पहेली को भी उन्होंने विजयदान देठा की एक राजस्थानी कहानी दुविधा का फिल्मी रूपांतरण बताया।

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पहेली - फोटो : Social Media

लेकिन इसी कहानी पर निर्देशक मणि कौल दुविधा नाम से ही 1973 में ही फिल्म बना चुके थे और बेस्ट डायरेक्टर का नेशनल फिल्म अवार्ड भी जीत चुके थे। रायल पद्मसी और रवि मेनन अभिनीत फिल्म दुविधा को भारत सरकार की संस्था राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम ने ही प्रोड्यूस किया था। ये जानकारी शाहरुख खान को उनकी टीम ने दी कि नहीं ये तो पता नहीं लेकिन बस इसी वजह से पहेली को ऑस्कर समिति ने बेस्ट फॉरेन फिल्म कैटेगरी में उस साल नामित होने वाली अंतिम पांच फिल्मों में जगह नहीं दी। ये कम लोगों को ही पता होगा कि इन 79वें ऑस्कर पुरस्कार समारोहों में एक हिंदी फिल्म ने अंतिम पांच फिल्मों में जगह बनाई थी। ये फिल्म थी दीपा मेहता निर्देशित वॉटर, लेकिन इसकी एंट्री कनाडा की तरफ से भेजी गई थी और इसे कनाडा की ही आधिकारिक प्रविष्टि माना गया। उस साल बेस्ट फॉरेन फिल्म का ऑस्कर अवार्ड जीता था जर्मन फिल्म द लाइव्स ऑफ अदर्स ने।

पहेली की कहानी साधारण सी है। अमोल पालेकर ने इसे बनाया संजय लीला भंसाली की फिल्म हम दिल दे चुके सनम स्टाइल में। वैसे ही हवेली, वैसे ही रंग बिरंगे कपड़े। वैसा ही कुदरत का विशाल कैनवास और वैसे ही दमदार कलाकार। बस भंसाली की कहानी गुजरात में घटती है और पालेकर की राजस्थान में। गलती यहां ये हुई कि फिल्म को सजाने के चक्कर में पालेकर की पकड़ सिनेमा के कथ्य पर ढीली हो गई। और, शाहरुख खान को निर्देशित करने वाले तमाम ऐसे फिल्मकारों में पालेकर का नाम भी शामिल हो गया जो उनकी फिल्म निर्देशित करने से पहले तक एक काबिल निर्देशक कहलाए, फिर शाहरुख के आभामंडल में उन्हें खान साब कहने वाली जमात में शामिल हुए और फिर... ।

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पहेली - फोटो : Social Media

अनुभव सिन्हा जैसे बिरले निर्देशक ही हुए हैं जो अपने करियर के इस शाहरुख शॉक से उबरने में कामयाब रहे। नहीं तो, शाहरुख को निर्देशित करने के बाद अपने करियर की पटरी भूल जाने वालों में आनंद एल राय, इम्तियाज अली, राहुल ढोलकिया जैसे तमाम निर्देशक शामिल रहे हैं। शाहरुख को इन दिनों अपने खुद के बनाए इसी मिथ से बाहर आने की जरूरत है, तभी शायद वह अपने करियर में फिर से वापसी कर सकेंगे और अपने फैंस को वाकई कुछ नया कर दिखाने में कामयाब रहेंगे।

खैर, हम लौटते हैं शाहरुख खान की 15 साल पहले बनी फिल्म पहेली की कहानी की तरफ। परदे पर ये कहानियां दो कठपुतलियां सुनाती हैं। एक की आवाज बनते हैं नसीरुद्दीन शाह और दूसरे की रत्ना पाठक शाह। रीयल लाइफ पति पत्नी परदे पर कठपुतली का जोड़ा बनकर जो कहानी सुनाते हैं उसमें लाछी नाम की लड़की की शादी के अगले दिन उसका पति परदेस चला जाता है कारोबार करने। नवविवाहिता के सारे अरमान उसी के साथ हवा हो जाते हैं। उसके मन और तन के तानेबाने में अटकी चाहतों को धीरे से आकर उसके पति का हमशक्ल सहला देता है। लाछी लाल हो उठती है। दोनों तमाम रंग अपनी अपनी जिंदगी के कोरे कागज में भरते हैं और जब तक लाछी समझ पाए कि उसके पति का हमशक्ल उसका पति नहीं बल्कि एक भूत है तब तक देर हो चुकी होती है। पति लौटता है। असल और नकल की परीक्षा शुरू होती है। और कहानी अपने आखिरी अध्याय तक कुछ न कुछ टोटका करके दर्शकों को अटकाए रखने की कोशिश करती है।

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पहेली - फोटो : Social Media

पहेली की मेकिंग अमोल पालेकर ने मणि कौल की दुविधा के ठीक उलट रखी। वहां पूरा जोर कहानी की सादगी पर था। यहां पूरा जोर फिल्म में ज्यादा से ज्यादा रंग भरने और स्पेशल इफेक्ट्स पर था। अमोल पालेकर को कहानी का मर्म समझ नहीं आया या फिर वह शाहरुख की हर बात पर हां करते गए, वही जाने लेकिन पहेली को मैं शाहरुख खान के करियर का टर्निंग प्वाइंट इस लिहाज से मानता हूं कि इसके पहले तक वह डायरेक्टर्स एक्टर रहे। फिर वह अपने हिसाब के एक्टर्स डायरेक्टर तलाशने लगे। पिछले 15 साल में शाहरुख ने अपने आसपास के तिलिस्म को और गहरा करने की तमाम कोशिश कीं, लेकिन रेड चिलीज ने शाहरुख के तिलिस्म के आगे की बात अब तक नहीं सोची है। वह दूसरों की बनाई पुरानी फिल्में तो रिलीज कर रहे हैं लेकिन अपनी बनाई पुरानी फिल्मों जैसी नई फिल्में नहीं बना रहे हैं।

फिल्म पहेली में शाहरुख तो पूरी फिल्म में शाहरुख खान लगते रहे। एक पल को भी दर्शक नहीं भूल पाता कि परदे पर जो दिख रहा है वह शाहरुख नहीं है। उसे किशन लाल लगना था और धीरे जलना था। लेकिन इस फिल्म में जो धीरे जला भी और धीरे सुलगा भी वह हैं रानी मुखर्जी। रानी मुखर्जी से बातें करते हुए अगर आप शाहरुख खान का नाम अब भी छेड़ दो तो उनकी बांछें खिल जाती है। चेहरे से नूर टपकने लगता है। दोनों की ये केमिस्ट्री आपको इस फिल्म के हर उस फ्रेम में नजर आएगी जहां दोनों साथ हैं। उघारे बैठे शाहरुख को गुदगुदाने वाला सीन तो लाजवाब है। रानी मुखर्जी ने इस फिल्म में अपने लिए खुद ही एक चुनौती रखी थी, और वह उस पर सौ फीसदी पास भी रहीं।

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