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कालाकांडी रिव्यूः अधकचरी स्क्रिप्ट के साथ सैफ की कॉमेडी जंची नहीं

Sat, 13 Jan 2018 08:09 AM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Sat, 13 Jan 2018 08:09 AM IST
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saif ali khan film kaalakandi review
कालाकांडी

-निर्माताः रोहित खट्टर/अशी दुआ सारा


-निर्देशकः अक्षत वर्मा
-सितारेः सैफ अली खान, अक्षय ओबेराय, कुणाल रॉय कपूर, दीपक डोबरियाल, विजय राज, शोभिता धूलीपाला
रेटिंग *1/2

साल की शुरुआत खराब फिल्म से। कभी चौथे खान की कुर्सी के दावेदार सैफ अली खान के लिए कालाकांडी बुरी खबर है। प्रयोग के नाम पर खराब कहानियां चुनने में सैफ अव्वल रहे हैं। कालाकांडी उसी कड़ी का अगला हिस्सा है। कहानी के नाम पर शून्य और स्क्रिप्ट के नाम पर अध-कचरे दृश्य। फिल्म किसी लिहाज से हिंदी के दर्शकों के लिए नहीं है। इसकी अस्सी फीसदी भाषा अंग्रेजी है। कालाकांडी जली हुई दाल जैसी है जो जलते-जलते काली हो गई। सैफ का करिअर पहले ही डूबा हुआ है। कालाकांडी और डुबा देगी। अक्षय ओबेराय, कुणाल कपूर और शोभिता धूलीपाला का करिअर भी ऐसी फिल्मों से धुआं हो जाएगा।

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saif ali khan

अक्षत वर्मा ने कुछ साल पहले 'डेल्ही बैली' लिखी थी जिसे महानगरों के ठेठ मल्टीप्लेक्स संवेदनाओं वाले दर्शकों ने सराहा था। कालाकांडी उसी श्रेणी की फिल्म है लेकिन इसमें डेल्ही बैली वाली बात नहीं। फिल्म मुंबई में एक रात की कहानी है। कालाकांडी मराठी में आम-बोलचाल का शब्द है, जिसका मतलब है चीजों का बुरी तरह गड़बड़ा जाना। इस डार्क कॉमेडी में तीन किरदार अलग-अलग परिस्थितियों में फंसते और उबरते हैं। शेयरमार्केट एक्सपर्ट रिलीन (सैफ) को डॉक्टर पहले ही सीन में पेट का कैंसर बता देता है। कहता है कि एक से छह महीने का समय उसके पास है। रिलीन, जी ले अपनी जिंदगी। जबकि रिलीन ने जीवन में कभी सिगरेट-शराब नहीं पी।

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कालाकांडी

बटर से तक तौबा किए रहा। घर में रिलीन के भाई अंगद (अक्षय) की शादी है और सब तैयारी में व्यस्त हैं। पार्टी में रिलीन एक ड्रग लेता है और उसके बाद उसकी दुनिया रंग-बिरंगी हो जाती है। अंगद शादी से पहले पुरानी गर्लफ्रेंड के साथ मस्ती के लिए निकलता है। कुणाल-शोभिता की अलग कहानी है, जिसमें वे एक हादसे के शिकार होते हैं। वहीं एक डॉन के लिए काम करने वाले विजय राज-दीपक डोबरियाल का ट्रेक सबसे अलग है, जहां वे डॉन को ठगने का प्लान बनाते हैं। असल में फिल्म जीवन-मृत्यु और कर्म के दर्शन को सामने लाना चाहती है लेकिन बेहद सतही अंदाज में। सब कुछ औंधे मुंह गिरता है।

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कोई अगर प्रयोग के नाम पर ढेर सारा पैसा लगा कर सिर्फ खुद के देखने-समझने योग्य फिल्म बना सकता है, अक्षत वर्मा और उनकी टीम की कालाकांडी अच्छा नमूना है। यह विषय किसी वेबसीरीज के लिए ज्यादा मुफीद साबित होता। खैर, यह फिल्म तभी देखी जा सकती है जब आपके पास कहीं से काला पैसा आया हो या फिर अपने वक्त को आप अंधेरे में ढकेलना चाहते हों। सैफ का अभिनय भले ही सधा हुआ है लेकिन वह फिल्म देखने की वजह नहीं बनता। बाकी कलाकार औसत हैं और कोई प्रभाव नहीं छोड़ते। गीत-संगीत कहने भर को है। फिल्म तकनीकी नजरिये से अच्छी है और इसे ढंग से शूट किया गया है।

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